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उच्च न्यायपालिका में ओबीसी, एसी-एसटी को नहीं मिला समुचित प्रतिनिधित्व : द्रविड़
Mon, 28 Oct 2024 12:27 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Mon, 28 Oct 2024 12:27 AM IST
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27जेएनडी14: बामसेफ हरियाणा राज्य इकाई की बैठक में मौजूद पदाधिकारी व कार्यकर्ता। संवाद
जींद। बामसेफ हरियाणा राज्य इकाई का सफीदों रोड पर स्थित गुरु रविदास धर्मशाला में 29वां राज्य अधिवेशन रविवार को वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुरेश द्रविड़ की अध्यक्षता में हुआ।
द्रविड़ ने कहा कि संविधान ने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद न्यायपालिका और विधायिका में मूल निवासी बहुजनों का प्रतिनिधित्व बढ़ा है। उच्च न्यायपालिका की तरफ से निरंतर अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विषय पर चर्चा की गई है। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायपालिका में आज भी ओबीसी, एससी-एसटी को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इसका लोकतांत्रिकीकरण नहीं हो सका है। इसका सामंती चरित्र आज भी बरकरार है। 1990 के दशक में जब इस देश के पिछड़ा वर्ग में सामाजिक, राजनीतिक चेतना विकसित हो रही थी, उस समय से उच्च न्यायपालिका ने अपने स्वयं के फैसले से कॉलेजियम सिस्टम का गठन पर न्यायाधीशों की नियुक्ति अपने हाथ में ले ली है। उसके बाद न्यायाधीशों की नियुक्ति में अपारदर्शिता, परिवारवाद और जातिवाद के आरोप लगे हैं। देश की आजादी के बाद से ही न्यायपालिका का दृष्टिकोण हमेशा सामाजिक न्याय, सामाजिक परिवर्तन, ओबीसी, एससी-एसटी के अधिकारों के विरुद्ध रहा है। इस अवसर पर मोहन राम पाल, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉॅ. केएस चौहान, सीआर नरवाल, एडवोकेट सुमन, एडवोकेट पूनम बेदी व डॉ. राजपाल मौजूद रहे।
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द्रविड़ ने कहा कि संविधान ने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद न्यायपालिका और विधायिका में मूल निवासी बहुजनों का प्रतिनिधित्व बढ़ा है। उच्च न्यायपालिका की तरफ से निरंतर अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विषय पर चर्चा की गई है। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायपालिका में आज भी ओबीसी, एससी-एसटी को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इसका लोकतांत्रिकीकरण नहीं हो सका है। इसका सामंती चरित्र आज भी बरकरार है। 1990 के दशक में जब इस देश के पिछड़ा वर्ग में सामाजिक, राजनीतिक चेतना विकसित हो रही थी, उस समय से उच्च न्यायपालिका ने अपने स्वयं के फैसले से कॉलेजियम सिस्टम का गठन पर न्यायाधीशों की नियुक्ति अपने हाथ में ले ली है। उसके बाद न्यायाधीशों की नियुक्ति में अपारदर्शिता, परिवारवाद और जातिवाद के आरोप लगे हैं। देश की आजादी के बाद से ही न्यायपालिका का दृष्टिकोण हमेशा सामाजिक न्याय, सामाजिक परिवर्तन, ओबीसी, एससी-एसटी के अधिकारों के विरुद्ध रहा है। इस अवसर पर मोहन राम पाल, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉॅ. केएस चौहान, सीआर नरवाल, एडवोकेट सुमन, एडवोकेट पूनम बेदी व डॉ. राजपाल मौजूद रहे।

27जेएनडी14: बामसेफ हरियाणा राज्य इकाई की बैठक में मौजूद पदाधिकारी व कार्यकर्ता। संवाद
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