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सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल, मुस्लिम समाज के लोग बना रहे रावण के पुतले

Tue, 04 Oct 2022 01:39 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Tue, 04 Oct 2022 01:39 AM IST
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Muslim family preparing effigies of Ravana and Medhnad
जींद। दशहरे का त्यौहार सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल लेकर आता है। दशहरे पर शहर में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के जिन पुतलों का दहन किया जाता है। वह पुतले मुस्लिम समाज के लोग तैयार करते हैं। 10 साल से यूपी के मुजफ्फरनगर के आरिफ का परिवार इन पुतलों को तैयार कर रहा है। आरिफ का कहना है कि ये काम उन्हें विरासत में मिला है और इसी से उसका घर चलता है।
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बकौल आरिफ इस बार जिले में 60 फुट ऊंचा रावण व 40-40 फुट ऊंचे मेघनाद व कुंभकर्ण के पुतले बनाए जा रहे हैं। इन पुतलों को बनाने का कार्य नहर के पास स्वर्ग आश्रम में किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर निवासी आरिफ और उनके परिवार के पांच लोग 10 साल से जींद में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले बनाने के लिए आते हैं। यह लोग 22 दिन में यह पुतले तैयार करते हैं। आरिफ ने बताया कि रोजगार और परिवार की रोजी रोटी से बढ़कर कुछ नही है। इन पुतलों से ही उनके परिवार चलता है। ये सब धर्म जाति सबसे ऊपर है। उनके परिवार के काफी लोग हरियाणा के अलग अलग शहरों में इसी प्रकार हर वर्ष रावण परिवार के पुतले बनाने के लिए आते हैं। उन्होंने यह कार्य अपने पूर्वजों से सीखा था। इसके अलावा वह मुजफ्फरनगर में अपनी दुकान चलाते हैं, जिसमें हुक्का तथा उसका तंबाकू बेचते हैं। उनका पुतले बनाने का पुश्तैनी काम है। वह बेशक मुस्लिम समाज से संबंध रखते हों लेकिन आज तक उन्हें अपने धर्म या समाज के कारण कोई परेशानी महसूस नहीं हुई। हिंदू भाई भी उनका पूरा सम्मान करते हैं और रामलीला शुरू होने से पहले खुद ही पुतले बनाने का ऑर्डर देते हैं। उनके एक फोन पर ही वह पुतले बनाने आ जाते हैं। यहां के लोग उन्हें इतना प्यार देते हैं कि वे पुतले बनाने के लिए रुपये भी तय नहीं करते। यहां के लोग उन्हें अपने परिवार की तरह ही मानते हैं। वे रामलीला कमेटी वालों से केवल आने जाने और यहां रहने खाने की व्यवस्था का खर्चा ही लेते हैं।
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कई जिलों में बनाते हैं पुतले
आरीफ ने कहा कि पिछले वर्ष उन्होंने जींद के अलावा रोहतक, झज्जर और बहादुरगढ़ में भी रावण परिवार के पुतले बनाए थे। जींद में वह 12 दिन पहले आए थे। इसी बीच वह करनाल में भी इस बार पुतले बनाकर आए हैं। अब जींद में दोबारा आकर इन पुतलों को अंतिम रूप दिया गया है। इसी प्रकार तीन-चार स्थानों पर वह पुतले बनाते हैं। इन पुतलों को दशहरा से एक-दो दिन पहले ही अंतिम रूप दिया जाता है। दशहरे से पहले ही पूरा ढांचा तैयार करके खड़ा कर दिया जाता है।
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