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कृषि: लगातार फसल उत्पादन के कारण मिट्टी में पोषक तत्वों की हो रही कमी, मृदा परीक्षण से जान सकते हैं पोषक तत्वों की मात्रा

Sun, 16 Jan 2022 07:49 PM IST
भूपेंद्र सिंह अमन कौशिक, संवाद न्यूज एजेंसी, जींद (हरियाणा)
अमन कौशिक, संवाद न्यूज एजेंसी, जींद (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Sun, 16 Jan 2022 07:49 PM IST
सार

मिट्टी की उर्वरा शक्ति कमजोर हो रही है। किसान मिट्टी की जांच करवाकर फसलों को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व दे सकते हैं।

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Farmers can know the amount of nutrients in the soil by soil test
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Istock

विस्तार

कृषि में मृदा परीक्षण या भूमि की जांच एक रासायनिक प्रक्रिया है। जिससे भूमि में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा के बारे में सही जानकारी मिलती है। इस परीक्षण का उद्देश्य भूमि की उर्वरकता मापना तथा यह पता करना है कि उस भूमि में कौन से तत्वों की कमी है। मिट्टी पोषक तत्वों का भंडार है, जो पौधों के पोषण के लिए सहारा देती है। 

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पौधों को अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए 16 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इसमें मुख्य रूप से कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नत्रजन, फॉस्फोरस, पोटाश, कैल्सिशयम, मैग्नीशियम, मैग्नीज, तांबा, लौह व क्लोरीन शामिल हैं। इन सभी तत्वों का संतुलित मात्रा में प्रयोग करने से ही उपयुक्त पैदावार ली जा सकती है। लगातार फसल उत्पादन में बढ़ोतरी के परिणाम स्वरूप पोषक तत्वों का ह्रास भी बढ़ रहा है।
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उर्वरकों एवं रासायनिक खादों द्वारा उनकी पूर्ति पूरी तरह से नहीं हो पा रही है। इससे हमारी भूमि की उर्वरा शक्ति कमजोर होती जा रही है। ऐेसे में हमें मिट्टी की जांच करवानी चाहिए। इससे हम सही तरीके व पर्याप्त मात्रा में फसल का उत्पादन कर सके। 
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कृषि विभाग के खंड कृषि अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र ने कहा कि मृदा परीक्षण के लिए सबसे पहले मृदा का नमूना लिया जाता है। इसके लिए जरूरी है कि मृदा का नमूना पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करें। यदि मृदा का नमूना ठीक ढंग से नहीं लिया गया हो और वह मृदा का सही प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा हो तो भले ही मृदा परीक्षण में कितनी ही सावधानियां क्यों न बरती जाएं, उसकी सिफारिश सही नहीं हो सकती।

इसलिए खेत की मृदा का नमूना पूरी सावधानी से लेना चाहिए। नमूना लेने के लिए सभी सामान साफ होने चाहिए। इससे मृदा दूषित नहीं हो। खुरपी, फावड़ा, लकड़ी या प्लास्टिक की खुरचनी ट्रे या प्लास्टिक की थैली सभी साफ होने चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस जमीन का नमूना लेना हो उस क्षेत्र पर 10-15 जगहों पर निशान लगा लें। चुनी गई जगह की ऊपरी सतह पर यदि कूड़ा करकट या घास  हो तो उसे हटा दें। 

खुरपी या फावड़े से 15 सेंटीमीटर गहरा गड्डा बनाएं। इसके एक तरफ  से दो से तीन सेंटीमीटर मोटी परत ऊपर से नीचे तक उतार कर साफ बाल्टी या ट्रे में डाल दें। इसी प्रकार शेष चुनी गई 10 से 15 जगहों से भी उप नमूने इकट्ठा कर लें। अब पूरी मृदा को अच्छी तरह हाथ से मिला लें तथा साफ कपड़े या टब में डालकर डेर बनालें।

अंगुली से इस डेर को चार बराबर भागों में बांट दें। आमने सामने के दो बराबर भागों को वापस अच्छी तरह से मिला लें। यह प्रक्रिया तब तक दोहराएं जब तक लगभग आधा किलो मृदा नहीं रह जाए। इस प्रकार से एकत्र किया गया नमूना पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेगा।


नमूने को साफ प्लास्टिक की थैली में डाल दें। अगर मृदा गीली हो तो इसे छाया में सूखा लें। इस नमूने के साथ नमूना सूचना पत्र, जिसमें किसान का नाम व पूरा पता, खेत की पहचान, नमूना लेने कि तिथि, जमीन का ढलान, सिंचाई का उपलब्ध स्रोत, पानी निकास, अगली ली जाने वाली फसल का नाम, पिछले तीन साल की फसलों का ब्योरा व कोई अन्य समस्या का विवरण, कपड़े की थैली में रखकर इसका मुंह बांधकर कृषि विभाग की प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए भिजवा दें।

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