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Jind News: अंग्रेजों के जमाने के ग्रामोफोन और रेडियो से आज भी सुनते हैं गाने

Sat, 21 Jun 2025 12:22 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद Updated Sat, 21 Jun 2025 12:22 AM IST
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Even today we listen to songs from British era gramophones and radios
20जेएनडी14-बलबीर सैनी अपनी दुकान पर ग्रामोफोन चलाते हुए, साथ में उनका बेटा और पौत्र। संवाद
जींद। शौक बड़ी चीज है। इसका चलता फिरता उदाहरण जींद के भिवानी रोड बाईपास निवासी बलबीर सैनी हैं, जो पिछले 60 सालों से संगीत से जुड़ी चीजें संजोए हुए हैं। वह संगीत के इतने शौकीन हैं कि 80 साल पुराने ग्रामोफोन और रेडियो से आज भी गाने सुनते हैं।
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76 वर्षीय बलबीर सैनी को बचपन से ही संगीत सुनने में रूचि है। वह शिक्षा विभाग में दफ्तरी से वर्ष 2009 में सेवानिवृत हो गए थे, लेकिन उसका संगीत के प्रति प्रेम कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा था। उसका बेटा वीरेंद्र सैनी और पौत्र जश्न सैनी भी संगीत के शौकीन हैं और काफी समय दुकान में ही गुजारते हैं।
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करीब 40 साल पहले उसने कैसेट्स व रेडियो की दुकान खोल ली। उसमें उसने संगीत से जुड़े पुराने उपकरणों को संजोना शुरू कर दिया। उनके पास अंग्रेजों के जमाने का 80 साल पुराने तीन ग्रामोफोन है, जिनमें एक ग्रामोफोन तो हाथ से चलता है।
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उनके पास 100 से भी ज्यादा रील पत्थर की हैं। एक रील में केवल दो ही गाने रिकॉर्ड हैं। इस रील की कीमत उस समय दो रुपये थी। वहीं 150 से ज्यादा प्लास्टिक की रील भी हैं, जिनमें एक में दस गाने रिकॉर्ड हैं।
इसके अलावा 62 साल पुराना रेडियो जो बिजली से चलता है, वह आज भी चालू हालत में है। उनके पास तीन हजार से पुराने दुर्लभ डीवीडी कैसेट, दो हजार से ज्यादा टेप की आडियो कैसेट हैं। वहीं वीसीआर की कैसेट भी रखी हुई हैं।
अंग्रेजी हुकूमत ने बैन गाने बलबीर ने संजोए
इन रीलों में वर्ष 1945 के आसपास राजकुमार फिल्मों के गाने जैसे जाने वाले जरा होशियार, हम हैं यहां के राजकुमार है। वहीं कलाकार प्रदीप का गाया गाना आज हिमालय की चोटी से फिर ललकारा है, दूर हट जाओ ए दुनिया वालो, ये हिंदूस्तान हमारा है। हालांकि इन गाने को अंग्रेजी हुकूमत ने बैन कर दिया था, लेकिन इस गाने को बलबीर सैनी आज भी संजोए हुए है।


1962 में भैंस बेचकर खरीदा था रेडियो

बलबीर सैनी बताते हैं कि उसे बचपन से ही संगीत सुनने का शौक रहा है। उसके परिवार ने वर्ष 1962 में 600 रुपये की भैंस बेची थी। उसके बाद वह रेडियो खरीदने के लिए दिल्ली चले गए। जींद में उस समय बड़ा रेडियो नहीं मिलता था। उन्होंने फिर 500 रुपये का रेडियो खरीदा जो कि बिजली से चलता है। जब मन करे वह इस रेडियो पर आज भी गाने सुन लेते हैं।

20जेएनडी14-बलबीर सैनी अपनी दुकान पर ग्रामोफोन चलाते हुए, साथ में उनका बेटा और पौत्र। संवाद

20जेएनडी14-बलबीर सैनी अपनी दुकान पर ग्रामोफोन चलाते हुए, साथ में उनका बेटा और पौत्र। संवाद

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