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Jind: पिंड तारक तीर्थ में श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी, पौष अमावस्या पर दान से पितरों को मिलता है मोक्ष
Thu, 11 Jan 2024 01:34 PM IST
नवीन दलाल
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद (हरियाणा)
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद (हरियाणा)
Published by: नवीन दलाल
Updated Thu, 11 Jan 2024 01:34 PM IST
सार
पिंडतारक तीर्थ के संबंध में किदवंती है कि महाभारत युद्ध के बाद पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पांडवों ने यहां 12 वर्ष तक सोमवती अमावस्या की प्रतीक्षा में तपस्या की। बाद में सोमवती अमावस के आने पर युद्ध में मारे गए परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया।
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पिंड दान करते लोग
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जींद के गांव पांडु पिंडारा स्थित पिंड तारक तीर्थ में वीरवार सुबह पौष अमावस्या के मौके पर हजारों श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई। मान्यता है कि पौष अमावस्या पर इस तीर्थ में स्नान करने तथा पिंड दान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है तथा उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। इसलिए हजारों श्रद्धालुओं ने सुबह कड़कड़ाती ठंड के बावजूद इस तीर्थ में डुबकी लगाई।
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पौष अमावस्या का विशेष महत्व है। पौष अमावस्या के समय यहां पिंड दान करने से जहां पितरों को शांति मिलती है, वहीं यह सुख एवं समृद्धि भी लाती है। इसके अलावा यहां स्नान से काल सर्प दोष भी दूर किया जा सकता है। कुशा घास की अंगूठी पहन कर श्राद्ध कर्म करना बहुत ही उपयोगी होता है। दान व स्नान से पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है।
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पिंडतारक तीर्थ के संबंध में किदवंती है कि महाभारत युद्ध के बाद पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पांडवों ने यहां 12 वर्ष तक सोमवती अमावस्या की प्रतीक्षा में तपस्या की। बाद में सोमवती अमावस के आने पर युद्ध में मारे गए परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया। तभी से यह माना जाता है कि पांडु पिंडारा स्थित पिंडतारक तीर्थ पर पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है। महाभारत काल से ही पितृ विसर्जन की अमावस्या, विशेषकर सोमवती अमावस्या पर यहां पिंडदान करने का विशेष महत्व है।
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हर अमावस्या को लगता है मेला
पिंडारा गांव के इस पिंड तारक तीर्थ पर वैसे तो हर अमावस्या को मेला लगता है। यदि अमावस्या सोमवार को आए तो इसका महत्व और ज्यादा होता है। इसके अलावा पौष माह की अमावस्या का विशेष महत्व होता है। इस अमावस्या में पिंड दान करना, पक्षियों को भोजन करवाना, स्नान करना, ब्राह्मणों को भोजन करवाना, गाय को रोटी खिलाना तथा पूजा-पाठ करने का विशेष फल मिलता है। इसी कारण इस दिन हजारों की संख्या में दूर-दराज से श्रद्धालु यहां आते हैं।