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Jind News: आषाढ़ माह की अमावस्या पर श्रद्धालुओं ने लगाई पिंडारा तीर्थ पर डुबकी
Sun, 18 Jun 2023 11:53 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Sun, 18 Jun 2023 11:53 PM IST
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18जेएनडी02 : पांडु पिंडारा के पिंडतारक तीर्थ में सूर्य को अर्घ्य देते एवं स्नान करते श्रद्धालु
संवाद न्यूज एजेंसी
जींद। आषाढ़ माह की अमावस्या पर रविवार को पांडू पिंडारा स्थित पिंडतारक तीर्थ स्थित सरोवर में श्रद्धालुओं ने स्नान कर पिंडदान किया। इस दौरान तर्पण भी किया और पितरों से सुखद भविष्य की कामना की। अमावस्या के दिन यहां सरोवर में स्नान के बाद पिंडदान का विशेष महात्म्य है।
पौराणिक पिंडतारक तीर्थ स्थल पर शनिवार शाम से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था। शनिवार की पूरी रात धर्मशालाओं में सत्संग तथा कीर्तन आदि का आयोजन चलता रहा। रविवार को सुबह से ही श्रद्धालुओं ने सरोवर में स्नान तथा पिंडदान शुरू कर दिया जो मध्याह्न के बाद तक चलता रहा। इस मौके पर दूर दराज से आएं श्रद्धालुओं ने अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया तथा सूर्यदेव को जलार्पण करके सुख समृद्धि की कामना की।
पिंडतारक तीर्थ के संबंध में कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पांडवों ने यहां 12 वर्ष तक सोमवती अमावस्या की प्रतीक्षा में तपस्या की। बाद में सोमवती अमावस्या पर युद्ध में मारे गए परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया। तभी से यह माना जाता है कि पांडू पिंडारा स्थित पिंडतारक तीर्थ पर पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है। महाभारत काल से ही पितृ विसर्जन की अमावस्या, विशेषकर सोमवती अमावस्या पर यहां पिंडदान करने का विशेष महत्व है। यहां पिंडदान करने के लिए विभिन्न प्रांतों के लोग श्रद्धालु आते हैं। श्रद्धालुओं ने यहां खरीदारी भी की।
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जयंती देवी मंदिर के पुजारी नवीन शास्त्री ने बताया कि आषाढ़ अमावस्या पर श्रद्धालुओं ने सूर्य देव की पूजा की और पितरों के लिए तर्पण किया। पितृ दोष से मुक्ति के लिए आषाढ़ अमावस्या को महत्वपूर्ण माना गया है। आषाढ़ माह की अमावस्या आषाढ़ी अमावस्या या हल हलहारिणी अमावस्या कहलाती है। इस तिथि को बेहद खास माना जाता है। कृष्ण पक्ष की चौदहवीं तिथि के बाद चंद्रमा, सूर्य मंडल में प्रवेश करता है और सूर्य अमा नाम की किरण में रहता है। इसलिए ये तिथि अमावस्या कहलाती है। आषाढ़ अमावस्या के दिन स्नान, दान, पितरों का तर्पण करने से जीवन में खुशहाली बनी रहती है।
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जींद। आषाढ़ माह की अमावस्या पर रविवार को पांडू पिंडारा स्थित पिंडतारक तीर्थ स्थित सरोवर में श्रद्धालुओं ने स्नान कर पिंडदान किया। इस दौरान तर्पण भी किया और पितरों से सुखद भविष्य की कामना की। अमावस्या के दिन यहां सरोवर में स्नान के बाद पिंडदान का विशेष महात्म्य है।
पौराणिक पिंडतारक तीर्थ स्थल पर शनिवार शाम से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था। शनिवार की पूरी रात धर्मशालाओं में सत्संग तथा कीर्तन आदि का आयोजन चलता रहा। रविवार को सुबह से ही श्रद्धालुओं ने सरोवर में स्नान तथा पिंडदान शुरू कर दिया जो मध्याह्न के बाद तक चलता रहा। इस मौके पर दूर दराज से आएं श्रद्धालुओं ने अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया तथा सूर्यदेव को जलार्पण करके सुख समृद्धि की कामना की।
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पिंडतारक तीर्थ के संबंध में कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पांडवों ने यहां 12 वर्ष तक सोमवती अमावस्या की प्रतीक्षा में तपस्या की। बाद में सोमवती अमावस्या पर युद्ध में मारे गए परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया। तभी से यह माना जाता है कि पांडू पिंडारा स्थित पिंडतारक तीर्थ पर पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है। महाभारत काल से ही पितृ विसर्जन की अमावस्या, विशेषकर सोमवती अमावस्या पर यहां पिंडदान करने का विशेष महत्व है। यहां पिंडदान करने के लिए विभिन्न प्रांतों के लोग श्रद्धालु आते हैं। श्रद्धालुओं ने यहां खरीदारी भी की।
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जयंती देवी मंदिर के पुजारी नवीन शास्त्री ने बताया कि आषाढ़ अमावस्या पर श्रद्धालुओं ने सूर्य देव की पूजा की और पितरों के लिए तर्पण किया। पितृ दोष से मुक्ति के लिए आषाढ़ अमावस्या को महत्वपूर्ण माना गया है। आषाढ़ माह की अमावस्या आषाढ़ी अमावस्या या हल हलहारिणी अमावस्या कहलाती है। इस तिथि को बेहद खास माना जाता है। कृष्ण पक्ष की चौदहवीं तिथि के बाद चंद्रमा, सूर्य मंडल में प्रवेश करता है और सूर्य अमा नाम की किरण में रहता है। इसलिए ये तिथि अमावस्या कहलाती है। आषाढ़ अमावस्या के दिन स्नान, दान, पितरों का तर्पण करने से जीवन में खुशहाली बनी रहती है।