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समय रहते कपास की फसल का रखें ध्यान
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जींद। नकदी फसलों में कपास का महत्वपूर्ण स्थान है। वहीं कपास में लगने वाले रोग इसकी गुणवत्ता व पैदावार को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। कपास की फसल में समय रहते बीमारियां का पता लगने व समय पर निदान करने से किसान अच्छा उत्पादन ले सकते हैं। कपास में लगने वाले प्रमुख रोग एवं उनका प्रबंधन करने की किसानों को जानकारी होना अति आवश्यक है।
खंड कृषि अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र ने कहा कि जीवाणु अंगमारी या कोनेदार धब्बे वाले रोग से कपास की फसल को काफी नुकसान होता है। यह चार प्रकार से पौधों को नुकसान करता है। इसमें पौध गलन से जीवाणु कपास के बीज के रेशे में व बीज के अंदर रहता है। शुरूआत में यह छोटे पौधों के तनों पर गोल धब्बे बनाता है और तना गल कर नीचे गिर जाता है। कोनेदार रोग से पौध गलन के बाद यह जीवाणु कपास के पत्तों पर असर करता है। इसके बाद टहनी मार रोग से धब्बे बनाता है। जो गहरे भूरे या काले रंग के होते हैं। इन धब्बों से टहनियां कमजोर हो जाती हैं। इससे जब भी हवा चलती है तो पौधे की टहनी टूट कर नीचे गिर जाती है। वहीं टिंडा गलन रोग से कपास के टिंडों पर धब्बे बनते हैं। जहां धब्बा बनता है, वहां कई फफूंदियां, कीड़े व जीवाणु मिलकर टिंडों को गिरा देते हैं। कपास की फसल में पौधे की किसी भी अवस्था में एंथ्रैक्नोज रोग आ सकता है। इस रोग में शिशु पौधे पर लाल-लाल धब्बे बनते हैं और सारे तने पर छा जाते हैं। इससे शिशु पौधे मर जाते हैं। टिंडा गलन रोग कई फफूंदियां के कारण होता है। यदि बारिश ज्यादा होती है, तो इस रोग का प्रकोप अधिक हो जाता है। इस रोग के कारण टिंडे पूरे या आंशिक तौर पर सड़ जाते हैं। इससे न केवल कपास की उपज ही कम होती है बल्कि गुणवत्ता में भी कमी आती है। जड़ गलन रोग से पौधे मुरझा जाते हैं। पौधे की ऊपर वाली पत्तियों पहले मुरझाती है। हरा दिखने वाला पौधा अचानक ही 24 घंटे में मुरझा जाता है व मर जाता है। डॉ. सुभाष चंद्र ने कहा कि गुलाबी सूंडी एक तरह का कीट है। यह अपने जीवनकाल के दौरान अलग-अलग चार अवस्थाओं से गुजरता है। समान्यत फसल में कलियां व फूल आने के बाद ही इस कीट का उपद्रव शुरू होता है। कई बार कीटग्रसत फूलों की पंखुड़ियां आपस में मिल जाती हैं। दूर से देखने पर गुलाब के सामान दिखाई देती हैं। अंडे में निकली छोटी-छोटी सुंडियां फूल में सूक्ष्म छिद्र बनाकर उनके अंदर प्रवेश कर जाती हैं। इससे फूल गिर जाते हैं। इससे फसल को काफी नुकसान होता है।
इन दवाइयों का किसान करें छिड़काव
कपास की फसल में जब भी रोगों के धब्बे नजर आए तक एक एकड़ में 600 से 800 ग्राम कॉपर आक्सीक्लोराइड व छह से आठ ग्राम स्ट्रैप्टोसाइकलिन को 150 से 200 लीटर पानी में घोल बनाकर 15-20 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार छिड़काव करें। टिंडा गलन रोग पर नियंत्रण के लिए कॉपर आक्सीक्लोराइड दो ग्राम प्रति लीटर पानी या कार्बननडाजिम दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर आवश्यकतानुसार छिड़काव करें। खेत के आस पास खरपतवार को नष्ट करें। कपास की फसल के पास भिंडी की खेती नहीं करें। किसान कपास की फसल में रोग पर समय रहते ध्यान दें। इससे रोग आगे नहीं बढ़ेगा। अगर कपास की फसल में कोई रोग नहीं होगा तो गुणवत्ता व फसल का उत्पादन अच्छा होगा।
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खंड कृषि अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र ने कहा कि जीवाणु अंगमारी या कोनेदार धब्बे वाले रोग से कपास की फसल को काफी नुकसान होता है। यह चार प्रकार से पौधों को नुकसान करता है। इसमें पौध गलन से जीवाणु कपास के बीज के रेशे में व बीज के अंदर रहता है। शुरूआत में यह छोटे पौधों के तनों पर गोल धब्बे बनाता है और तना गल कर नीचे गिर जाता है। कोनेदार रोग से पौध गलन के बाद यह जीवाणु कपास के पत्तों पर असर करता है। इसके बाद टहनी मार रोग से धब्बे बनाता है। जो गहरे भूरे या काले रंग के होते हैं। इन धब्बों से टहनियां कमजोर हो जाती हैं। इससे जब भी हवा चलती है तो पौधे की टहनी टूट कर नीचे गिर जाती है। वहीं टिंडा गलन रोग से कपास के टिंडों पर धब्बे बनते हैं। जहां धब्बा बनता है, वहां कई फफूंदियां, कीड़े व जीवाणु मिलकर टिंडों को गिरा देते हैं। कपास की फसल में पौधे की किसी भी अवस्था में एंथ्रैक्नोज रोग आ सकता है। इस रोग में शिशु पौधे पर लाल-लाल धब्बे बनते हैं और सारे तने पर छा जाते हैं। इससे शिशु पौधे मर जाते हैं। टिंडा गलन रोग कई फफूंदियां के कारण होता है। यदि बारिश ज्यादा होती है, तो इस रोग का प्रकोप अधिक हो जाता है। इस रोग के कारण टिंडे पूरे या आंशिक तौर पर सड़ जाते हैं। इससे न केवल कपास की उपज ही कम होती है बल्कि गुणवत्ता में भी कमी आती है। जड़ गलन रोग से पौधे मुरझा जाते हैं। पौधे की ऊपर वाली पत्तियों पहले मुरझाती है। हरा दिखने वाला पौधा अचानक ही 24 घंटे में मुरझा जाता है व मर जाता है। डॉ. सुभाष चंद्र ने कहा कि गुलाबी सूंडी एक तरह का कीट है। यह अपने जीवनकाल के दौरान अलग-अलग चार अवस्थाओं से गुजरता है। समान्यत फसल में कलियां व फूल आने के बाद ही इस कीट का उपद्रव शुरू होता है। कई बार कीटग्रसत फूलों की पंखुड़ियां आपस में मिल जाती हैं। दूर से देखने पर गुलाब के सामान दिखाई देती हैं। अंडे में निकली छोटी-छोटी सुंडियां फूल में सूक्ष्म छिद्र बनाकर उनके अंदर प्रवेश कर जाती हैं। इससे फूल गिर जाते हैं। इससे फसल को काफी नुकसान होता है।
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इन दवाइयों का किसान करें छिड़काव
कपास की फसल में जब भी रोगों के धब्बे नजर आए तक एक एकड़ में 600 से 800 ग्राम कॉपर आक्सीक्लोराइड व छह से आठ ग्राम स्ट्रैप्टोसाइकलिन को 150 से 200 लीटर पानी में घोल बनाकर 15-20 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार छिड़काव करें। टिंडा गलन रोग पर नियंत्रण के लिए कॉपर आक्सीक्लोराइड दो ग्राम प्रति लीटर पानी या कार्बननडाजिम दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर आवश्यकतानुसार छिड़काव करें। खेत के आस पास खरपतवार को नष्ट करें। कपास की फसल के पास भिंडी की खेती नहीं करें। किसान कपास की फसल में रोग पर समय रहते ध्यान दें। इससे रोग आगे नहीं बढ़ेगा। अगर कपास की फसल में कोई रोग नहीं होगा तो गुणवत्ता व फसल का उत्पादन अच्छा होगा।
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