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थनैला रोग में अपनाएं पारंपरिक पशु चिकित्सा : डॉ. सुरेंद्र आर्य
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24जेएनडी13: डॉ. सुरेंद्र आर्य।
जींद। दुधारू पशुओं में होने वाला थनैला रोग पशुपालकों के लिए बड़ी समस्या बनता जा रहा है। समय पर इलाज न होने पर संक्रमण बढ़ने का खतरा रहता है। इससे दूध उत्पादन भी प्रभावित होता है।
पशुपालन एवं डेयरी विभाग के उप मंडल अधिकारी डॉ. सुरेंद्र आर्य ने पशुपालक जागरूकता अभियान के तहत पशुपालकों को पारंपरिक पशु चिकित्सा अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि घरेलू स्तर पर उपलब्ध सामग्री से इस रोग का सस्ता और प्रभावी उपचार किया जा सकता है।
डॉ. आर्य ने बताया कि पारंपरिक उपचार के लिए 250 ग्राम ग्वारपाठा (एलोवेरा), 50 ग्राम हल्दी पाउडर और 15 ग्राम चुने की आवश्यकता होती है। सबसे पहले एलोवेरा के कांटे हटाकर उसका पेस्ट तैयार करें। इसके बाद उसमें हल्दी और चुना मिलाकर गाढ़ा लाल रंग का मिश्रण तैयार करें। फिर करीब 200 मिलीलीटर पानी मिलाकर लेप बना लें।
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प्रभावित थन और लेवटी को अच्छी तरह साफ करने के बाद यह लेप लगाएं। कुछ समय बाद पशु के थनों में दूध उतर आएगा। दूध निकालकर दोबारा लेप लगाना चाहिए। उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया दिन में आठ से 10 बार दोहरानी चाहिए और हर बार लेप लगाने से पहले थनों को खाली करना जरूरी है। लगातार तीन से पांच दिन तक ऐसा करने से पशु को काफी राहत मिलती है।
पशु को प्रतिदिन दो नींबू खिलाने की भी सलाह दी गई है। यदि दूध का रंग लाल हो जाए तो पशु को करी पत्ता और गुड़ खिलाना लाभकारी रहेगा। डॉ. आर्य ने पशुपालकों को साफ-सफाई और बेहतर प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी। उ
न्होंने कहा कि पशु के थनों को गर्म पानी से न धोएं तथा दूध निकालने से पहले और बाद में थन की अच्छी तरह सफाई करें। पशु आवास को साफ-सुथरा रखें और गोबर व पानी निकासी की उचित व्यवस्था करें। उन्होंने कहा कि उचित देखभाल और स्वच्छता से पशुओं को थनैला रोग से काफी हद तक बचाया जा सकता है।
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पशुपालन एवं डेयरी विभाग के उप मंडल अधिकारी डॉ. सुरेंद्र आर्य ने पशुपालक जागरूकता अभियान के तहत पशुपालकों को पारंपरिक पशु चिकित्सा अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि घरेलू स्तर पर उपलब्ध सामग्री से इस रोग का सस्ता और प्रभावी उपचार किया जा सकता है।
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डॉ. आर्य ने बताया कि पारंपरिक उपचार के लिए 250 ग्राम ग्वारपाठा (एलोवेरा), 50 ग्राम हल्दी पाउडर और 15 ग्राम चुने की आवश्यकता होती है। सबसे पहले एलोवेरा के कांटे हटाकर उसका पेस्ट तैयार करें। इसके बाद उसमें हल्दी और चुना मिलाकर गाढ़ा लाल रंग का मिश्रण तैयार करें। फिर करीब 200 मिलीलीटर पानी मिलाकर लेप बना लें।
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प्रभावित थन और लेवटी को अच्छी तरह साफ करने के बाद यह लेप लगाएं। कुछ समय बाद पशु के थनों में दूध उतर आएगा। दूध निकालकर दोबारा लेप लगाना चाहिए। उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया दिन में आठ से 10 बार दोहरानी चाहिए और हर बार लेप लगाने से पहले थनों को खाली करना जरूरी है। लगातार तीन से पांच दिन तक ऐसा करने से पशु को काफी राहत मिलती है।
पशु को प्रतिदिन दो नींबू खिलाने की भी सलाह दी गई है। यदि दूध का रंग लाल हो जाए तो पशु को करी पत्ता और गुड़ खिलाना लाभकारी रहेगा। डॉ. आर्य ने पशुपालकों को साफ-सफाई और बेहतर प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी। उ
न्होंने कहा कि पशु के थनों को गर्म पानी से न धोएं तथा दूध निकालने से पहले और बाद में थन की अच्छी तरह सफाई करें। पशु आवास को साफ-सुथरा रखें और गोबर व पानी निकासी की उचित व्यवस्था करें। उन्होंने कहा कि उचित देखभाल और स्वच्छता से पशुओं को थनैला रोग से काफी हद तक बचाया जा सकता है।