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Jind News: किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण का दिया संदेश
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जींद। कृषि विज्ञान केंद्र पांडू पिंडारा की तरफ से गांव अकालगढ़ में खेत बचाओ अभियान के तहत जागरूकता कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम का नेतृत्व जिला विस्तार विशेषज्ञ मृदा विज्ञान डॉ. धीरज पंघाल ने किया।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक एवं असंतुलित प्रयोग तथा जैविक स्रोतों के कम उपयोग के कारण मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की कमी सूक्ष्म पोषक तत्वों का असंतुलन तथा मृदा की उर्वरता में गिरावट जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। उन्होंने किसानों को बताया कि स्वस्थ मिट्टी ही टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि की आधारशिला है।
उन्होंने किसानों को मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रयोग अपनाने की सलाह देते हुए कहा कि बिना मिट्टी की जांच किए उर्वरकों का प्रयोग करने से न केवल उत्पादन लागत बढ़ती है] बल्कि भूमि की उत्पादकता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने बताया कि गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट तथा फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाई जा सकती है।
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इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता, पोषक तत्वों की उपलब्धता तथा लाभकारी सूक्ष्म जीवों की सक्रियता में वृद्धि होती है, जिससे फसल उत्पादन अधिक टिकाऊ बनता है। उन्होंने बताया कि ढैंचा सनई जैसी हरित खाद वाली फसलों को खेत में पलटने से मिट्टी में नाइट्रोजन एवं कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है। इससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है उत्पादन लागत घटती है और मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है। उन्होंने कहा कि हरित खाद का नियमित प्रयोग भूमि की दीर्घकालीन उर्वरता बनाए रखने का एक प्रभावी उपाय है।
किसानों ने मृदा परीक्षण संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक खेती हरित खाद तथा मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन से संबंधित विषयों पर विशेषज्ञों से चर्चा की। वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की कि वे खेत बचाओ अभियान के उद्देश्यों को अपनाते हुए मिट्टी के स्वास्थ्य की रक्षा करें तथा वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों के माध्यम से टिकाऊ कृषि को बढ़ावा दें। संवाद
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उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक एवं असंतुलित प्रयोग तथा जैविक स्रोतों के कम उपयोग के कारण मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की कमी सूक्ष्म पोषक तत्वों का असंतुलन तथा मृदा की उर्वरता में गिरावट जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। उन्होंने किसानों को बताया कि स्वस्थ मिट्टी ही टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि की आधारशिला है।
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उन्होंने किसानों को मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रयोग अपनाने की सलाह देते हुए कहा कि बिना मिट्टी की जांच किए उर्वरकों का प्रयोग करने से न केवल उत्पादन लागत बढ़ती है] बल्कि भूमि की उत्पादकता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने बताया कि गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट तथा फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाई जा सकती है।
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इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता, पोषक तत्वों की उपलब्धता तथा लाभकारी सूक्ष्म जीवों की सक्रियता में वृद्धि होती है, जिससे फसल उत्पादन अधिक टिकाऊ बनता है। उन्होंने बताया कि ढैंचा सनई जैसी हरित खाद वाली फसलों को खेत में पलटने से मिट्टी में नाइट्रोजन एवं कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है। इससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है उत्पादन लागत घटती है और मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है। उन्होंने कहा कि हरित खाद का नियमित प्रयोग भूमि की दीर्घकालीन उर्वरता बनाए रखने का एक प्रभावी उपाय है।
किसानों ने मृदा परीक्षण संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक खेती हरित खाद तथा मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन से संबंधित विषयों पर विशेषज्ञों से चर्चा की। वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की कि वे खेत बचाओ अभियान के उद्देश्यों को अपनाते हुए मिट्टी के स्वास्थ्य की रक्षा करें तथा वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों के माध्यम से टिकाऊ कृषि को बढ़ावा दें। संवाद