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40 साल पहले महज दस साल की उम्र में गांव छोड़ कर दिल्ली शिफ्ट हुए सुशील गुप्ता का आज भी है गांव की मिट्टी से लगाव
Updated Fri, 05 Jan 2018 12:21 AM IST
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धर्मवीर निडाना
जींद।
आम आदमी पार्टी द्वारा राज्यसभा में भेजे जाने के फैसले से चर्चा में आए सुशील गुप्ता 40 साल पहले महज दस साल की उम्र में परिवार के साथ अपने पैतृक गांव शामलो कलां से दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। इसके बावजूद सुशील गुप्ता आज तक अपने गांव की मिट्टी को नहीं भूले हैं। सुशील गुप्ता का गांव में पैतृक घर आज भी बरकरार है, जहां वह स्वयं या उसके परिवार के सदस्य साल में एक या दो बार आते हैं। जब भी वे गांव आते हैं, गांव में हो रहे सामाजिक कार्यों के लिए चंदा देना नहीं भूलते। देश के बड़े व्यवसायी और राजनेता सुशील गुप्त को बचपन में बाजरे की रोटी और गुड़ बहुत पसंद था।
सुशील गुप्ता का पुश्तैनी मकान आज भी शामलो कलां गांव के बीचोंबीच बनियों वाली गली में है। पहले गांव में अग्रवाल समुदाय के करीब 40 घर थे, जो अब गांव से जा चुके हैं। सभी लोग बाहर व्यापार करते हैं। सुशील गुप्ता की बुआ बोहती देवी के अनुसार पहले से ही सुशील गुप्ता के पिता सेठ कलीराम का गांव में अच्छा कारोबार था। गांव में पकड़े की दुकान के अलावा सेठ कलीराम आटा चक्की भी चलाते थे। पूरा गांव उनकी चक्की पर ही गेहूं पिसवाता था। सुशील गुप्ता की बुआ व उनके फूफा रामकुमार के अनुसार जिस समय उनकी शादी हुई, सुशील महज चार-पांच साल के थे। बोहती देवी के अनुसार सुशील दस भाई बहनों में छठे नंबर के हैं। वे सात भाई हैं और तीन बहने हैं। उनका पूरा परिवार अब दिल्ली में ही रहता है।
पढ़ाई में थे होशियार
सुशील हमारे साथ ही गांव में तीसरी कक्षा तक पढ़े। चौथी कक्षा में उनका परिवार दिल्ली शिफ्ट हो गया था। सुशील पढ़ाई में बहुत होशियार थे। आज भी वे गांव में आते हैं तो अपने पुराने दोस्तों से मिलना नहीं भूलते। गांव के तमाम सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
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सूरजीत, पूर्व सरपंच व सुशील गुप्ता के सहपाठी।
खेल में भी लेते थे हिस्सा
पढ़ाई के साथ-साथ सुशील शाम को कभी भी दोस्तों के साथ खेलना नहीं भूलते थे। दिन में बित्ती डंडा, कंचे व शाम को लुकम छिपाई खेलते थे। बचपन में वे बहुत ही शांत स्वभाव के थे। गांव में किसी भी जाति में अपने दोस्तों के घर आते-जाते थे।
बलवान, सुशील गुप्ता के सहपाठी।
राजीव गांधी के रहे करीब
सुशील गुप्ता शुरू से ही होनहार हैं। वे एक जमाने में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बहुत करीब रहे। उन्होंने दिल्ली से ही चुनाव भी लड़ा। करीब आठ महीने पहले अपने ताऊ के निधन पर शोक जताने के लिए वे जींद आए थे, तब उनसे मुलाकात हुई थी।
रामकुमार, सुशील गुप्ता के फूफा।
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जींद।
आम आदमी पार्टी द्वारा राज्यसभा में भेजे जाने के फैसले से चर्चा में आए सुशील गुप्ता 40 साल पहले महज दस साल की उम्र में परिवार के साथ अपने पैतृक गांव शामलो कलां से दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। इसके बावजूद सुशील गुप्ता आज तक अपने गांव की मिट्टी को नहीं भूले हैं। सुशील गुप्ता का गांव में पैतृक घर आज भी बरकरार है, जहां वह स्वयं या उसके परिवार के सदस्य साल में एक या दो बार आते हैं। जब भी वे गांव आते हैं, गांव में हो रहे सामाजिक कार्यों के लिए चंदा देना नहीं भूलते। देश के बड़े व्यवसायी और राजनेता सुशील गुप्त को बचपन में बाजरे की रोटी और गुड़ बहुत पसंद था।
सुशील गुप्ता का पुश्तैनी मकान आज भी शामलो कलां गांव के बीचोंबीच बनियों वाली गली में है। पहले गांव में अग्रवाल समुदाय के करीब 40 घर थे, जो अब गांव से जा चुके हैं। सभी लोग बाहर व्यापार करते हैं। सुशील गुप्ता की बुआ बोहती देवी के अनुसार पहले से ही सुशील गुप्ता के पिता सेठ कलीराम का गांव में अच्छा कारोबार था। गांव में पकड़े की दुकान के अलावा सेठ कलीराम आटा चक्की भी चलाते थे। पूरा गांव उनकी चक्की पर ही गेहूं पिसवाता था। सुशील गुप्ता की बुआ व उनके फूफा रामकुमार के अनुसार जिस समय उनकी शादी हुई, सुशील महज चार-पांच साल के थे। बोहती देवी के अनुसार सुशील दस भाई बहनों में छठे नंबर के हैं। वे सात भाई हैं और तीन बहने हैं। उनका पूरा परिवार अब दिल्ली में ही रहता है।
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पढ़ाई में थे होशियार
सुशील हमारे साथ ही गांव में तीसरी कक्षा तक पढ़े। चौथी कक्षा में उनका परिवार दिल्ली शिफ्ट हो गया था। सुशील पढ़ाई में बहुत होशियार थे। आज भी वे गांव में आते हैं तो अपने पुराने दोस्तों से मिलना नहीं भूलते। गांव के तमाम सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
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सूरजीत, पूर्व सरपंच व सुशील गुप्ता के सहपाठी।
खेल में भी लेते थे हिस्सा
पढ़ाई के साथ-साथ सुशील शाम को कभी भी दोस्तों के साथ खेलना नहीं भूलते थे। दिन में बित्ती डंडा, कंचे व शाम को लुकम छिपाई खेलते थे। बचपन में वे बहुत ही शांत स्वभाव के थे। गांव में किसी भी जाति में अपने दोस्तों के घर आते-जाते थे।
बलवान, सुशील गुप्ता के सहपाठी।
राजीव गांधी के रहे करीब
सुशील गुप्ता शुरू से ही होनहार हैं। वे एक जमाने में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बहुत करीब रहे। उन्होंने दिल्ली से ही चुनाव भी लड़ा। करीब आठ महीने पहले अपने ताऊ के निधन पर शोक जताने के लिए वे जींद आए थे, तब उनसे मुलाकात हुई थी।
रामकुमार, सुशील गुप्ता के फूफा।