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किसानों ने मनाया खुदीराम बोस का शहीदी दिवस

Thu, 12 Aug 2021 01:39 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Thu, 12 Aug 2021 01:39 AM IST
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jhajjar bahadurgarh news,Farmers celebrated the martyrdom day of Khudiram Bose
खुदीराम बोस अमर रहें, के नारे लगाते किसान। - फोटो : Bahadurgarh
किसान आंदोलनकारियों ने बुधवार को टीकरी बॉर्डर पर महान देशभक्त, इंकलाबी योद्धा, अमर शहीद खुदीराम बोस का 113वां शहीदी दिवस बड़े आदर व श्रद्धा से मनाया। उनके फोटो पर माल्यार्पण किया और क्रांतिकारी सलाम किया।
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इस अवसर पर किसान नेता जयकरण मांडोठी ने बताया कि 11 अगस्त 1908 को मात्र 19 साल की उम्र में इस महान देशभक्त को फांसी दी गई। फांसी से पहले उन्होंने ऊंची आवाज में ब्रिटिश साम्राज्यवाद मुर्दाबाद का नारा लगाया और हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।
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क्रांतिकारियों का बनाया था गुप्त संगठन
जयकरण ने बताया कि जब खुदीराम बोस जब मात्र 13-14 साल के थे, उन दिनों देश के लोग भूख, गरीबी, बीमारी और गुलामी से त्रस्त थे। अंग्रेजों ने धर्म के आधार पर बंगाल के दो टुकड़े कर दिए थे, जिस कारण अंग्रेजों के खिलाफ लोगों के दिल में आग लगी हुई थी। देश के, विशेषकर बंगाल के नौजवान दुनिया भर के क्रांतिकारियों से सीख लेकर गुप्त संगठन बना रहे थे और अंग्रेजों पर सशस्त्र हमले कर रहे थे। उन्होंने समझ लिया था कि मात्र हाथ जोडने से आजादी नहीं मिलेगी। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना होगा और इन्हें देश से भगाना होगा। तीन दिसंबर 1889 को उनका जन्म एक छोटे से गांव हबीबपुर मोहाबनी, जिला मिदनापुर (प. बंगाल) में हुआ। अपनी छोटी सी किशोरावस्था व युवावस्था में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ चढ़कर भाग लिया। क्रांतिकारियों के गुप्त संगठन के लिए 1907 में उन्होंने हॉट गाछिया के डाकघर के खजाने को लूटा। अंग्रेजी अदालत ने राजद्रोह के आरोप में फांसी की सुजाई। 11 अगस्त 1908 को हंसते-हंसते मात्र 19 साल की आयु में फांसी के फंदे को चूम कर सदा के लिए अमर हो गए और आने वाली पीढ़ियों के लिए शोषण, उत्पीड़न-अन्याय से मुक्ति पाने का रास्ता दिखा गए।
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शोषण के खिलाफ उठो : लालजी
संगठन के नेता लालजी ने कहा कि खुदीराम बोस एक सच्चे देशभक्त, ईमानदार, लगन के पक्के व चरित्रवान योद्धा थे। उनमें देश प्रेम कूट-कूट कर भरा था। वे सब देशवासियों के दुख तकलीफों को अपना समझते थे। सांप्रदायिक एकता के प्रतीक थे और युवाओं के लिए एक आदर्श थे। हमारे देश में विदेशी लुटेरों से तो 1947 में निजात पा ली किंतु खुदीराम बोस और उन जैसे हजारों शहीदों के सुनहले खुशहाल व शोषण-उत्पीड़न से मुक्त जनजीवन के सपने अभी तक सपने ही बने हुए हैं, देश से शोषण, उत्पीड़न तथा दमन खत्म नहीं हुआ है। हम सभी को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। इस अवसर पर सरदार बख्शीश सिंह, सुरजीत सिंह खालसा, प्रदीप सिंह और अन्य किसान उपस्थित रहे।
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