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अंतरराष्ट्रीय टेराकोटा शिल्पी हरकिशन प्रजापति का निधन
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शील भारद्वाज
बहादुरगढ़। अंतरराष्ट्रीय टेराकोटा शिल्पी हरकिशन प्रजापति का बुधवार को दिल्ली के उत्तमनगर में निधन हो गया। वह बहादुरगढ़ के गांव मांडोठी के थे। अपनी श्रेष्ठ मृदा कला की बदौलत उन्हें 1990 में राष्ट्रपति से राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और देश-दुनिया के हजारों लोगों को सिखाने के लिए 2014 में राष्ट्रपति ने शिल्प गुरु के सम्मान से नवाजा।
हरकिशन प्रजापति की अनूठी टेराकोटा कला का देश में कोई सानी नहीं था। बर्तनों के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए 1988 में संस्कृति पुरस्कार मिला। 2006 में इंडिया क्राफ्ट काउंसिल द्वारा शांता प्रसाद पुरस्कार, 1988 में कला निधि सूरजकुंड और ऑल इंडिया फाइन आर्ट एंड क्राफ्ट पुरस्कार भी मिला। 1990 में राष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा 2012 का शिल्प गुरु सम्मान 2014 में राष्ट्रपति से प्राप्त किया। उन्होंने दुनियाभर में सैकड़ों प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं में भाग लिया। उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कारों की चयन समिति में शामिल किया गया। दुनिया के 16 देशों में उन्होंने टेराकोटा शिल्प का प्रशिक्षण दिया। कपड़ा मंत्री रहे अजय टम्टा और स्मृति ईरानी ने उनके निवास का दौरा किया और टेराकोटा शिल्प व टेराकोटा ग्लेज्ड पॉटरी की प्रशंसा की। हरकिशन के परिवार में उनकी पत्नी और छह बेटियां हैं। दो बेटियों का विवाह हो चुका है। काष्ठ शिल्प के गुरु राजेंद्र प्रसाद बौंदवाल और माटी के चितेरे चित्रकार महेश दलाल ने हरकिशन के निधन को शिल्पकला क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।
नए-नए प्रयोग किए
हरकिशन प्रजापति का जन्म 26 अक्टूबर 1956 को बहादुरगढ़ के गांव मांडोठी में हुआ। वह एक पारंपरिक कुम्हार परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने बहुत कम उम्र में माता-पिता से मिट्टी के बर्तन बनाने का बुनियादी कौशल सीखा। स्कूली शिक्षा गांव में की। कक्षा 9वीं में पढ़ते हुए एक कुम्हार के रूप में अपना जीवन शुरू किया। गांव में विपणन की कमी के कारण वह 1976 में दिल्ली चले गए और 1980 तक ग्रामीण मिट्टी के बर्तनों का निर्माण किया। वह अपने उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार के लिए मिट्टी के बर्तनों के क्षेत्र में कुछ अलग करना चाहते थे, इसलिए अपने काम में प्रयोग करना शुरू कर दिया और आवश्यक परिवर्तन किए।
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हरकिशन ने 1983 से कुम्हारों को पॉटरी व्हील थ्रोइंग पॉटरी और भट्ठा फायरिंग तकनीक बनाने के सभी अलग-अलग तरीके सिखाकर उन्हें सशक्त बनाने के लिए कड़ी मेहनत की। विदेशियों के संपर्क में आने पर उन्होंने मिट्टी के बर्तनों के लिए डिजाइन विकास शुरू किया और मिट्टी के बर्तनों को लेकर विभिन्न उपयोगी खोज की।
हजारों को सिखाया
उन्होंने 1987 में कुम्हारों के साथ मिलकर मिट्टी के बर्तनों के लिए एक सहकारी समिति बनाई और शिल्प मेलों में काम का प्रदर्शन शुरू किया। बाद में एक कार्यशाला की स्थापना की, जहां कारीगरों और शुरुआती लोगों को पहिया फेंकने और फायरिंग तकनीक का प्रशिक्षण दिया गया। उनकी महत्वाकांक्षा टेराकोटा मिट्टी के बर्तनों को अगले स्तर तक ले जाने की थी, इसलिए टेराकोटा को अधिक टिकाऊ, धोने योग्य और खाद्य सुरक्षित बनाने के तरीके पर शोध करना शुरू किया। उन्होंने इसके लिए सामग्री को मजबूत किया और मिट्टी के व्यंजनों और ग्लेजिंग में विभिन्न प्रयोग किए। उन्होंने मिट्टी के ढांचों को विकसित करने में अपना बहुत समय लगाया।
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-फोटो 1 : वर्ष 2012 का शिल्प गुरु सम्मान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से प्राप्त करते हरकिशन प्रजापति।
-फोटो 2 : परंपरागत चाख पर मिट्टी के बर्तन बनाते हरकिशन।
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बहादुरगढ़। अंतरराष्ट्रीय टेराकोटा शिल्पी हरकिशन प्रजापति का बुधवार को दिल्ली के उत्तमनगर में निधन हो गया। वह बहादुरगढ़ के गांव मांडोठी के थे। अपनी श्रेष्ठ मृदा कला की बदौलत उन्हें 1990 में राष्ट्रपति से राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और देश-दुनिया के हजारों लोगों को सिखाने के लिए 2014 में राष्ट्रपति ने शिल्प गुरु के सम्मान से नवाजा।
हरकिशन प्रजापति की अनूठी टेराकोटा कला का देश में कोई सानी नहीं था। बर्तनों के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए 1988 में संस्कृति पुरस्कार मिला। 2006 में इंडिया क्राफ्ट काउंसिल द्वारा शांता प्रसाद पुरस्कार, 1988 में कला निधि सूरजकुंड और ऑल इंडिया फाइन आर्ट एंड क्राफ्ट पुरस्कार भी मिला। 1990 में राष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा 2012 का शिल्प गुरु सम्मान 2014 में राष्ट्रपति से प्राप्त किया। उन्होंने दुनियाभर में सैकड़ों प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं में भाग लिया। उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कारों की चयन समिति में शामिल किया गया। दुनिया के 16 देशों में उन्होंने टेराकोटा शिल्प का प्रशिक्षण दिया। कपड़ा मंत्री रहे अजय टम्टा और स्मृति ईरानी ने उनके निवास का दौरा किया और टेराकोटा शिल्प व टेराकोटा ग्लेज्ड पॉटरी की प्रशंसा की। हरकिशन के परिवार में उनकी पत्नी और छह बेटियां हैं। दो बेटियों का विवाह हो चुका है। काष्ठ शिल्प के गुरु राजेंद्र प्रसाद बौंदवाल और माटी के चितेरे चित्रकार महेश दलाल ने हरकिशन के निधन को शिल्पकला क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।
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नए-नए प्रयोग किए
हरकिशन प्रजापति का जन्म 26 अक्टूबर 1956 को बहादुरगढ़ के गांव मांडोठी में हुआ। वह एक पारंपरिक कुम्हार परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने बहुत कम उम्र में माता-पिता से मिट्टी के बर्तन बनाने का बुनियादी कौशल सीखा। स्कूली शिक्षा गांव में की। कक्षा 9वीं में पढ़ते हुए एक कुम्हार के रूप में अपना जीवन शुरू किया। गांव में विपणन की कमी के कारण वह 1976 में दिल्ली चले गए और 1980 तक ग्रामीण मिट्टी के बर्तनों का निर्माण किया। वह अपने उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार के लिए मिट्टी के बर्तनों के क्षेत्र में कुछ अलग करना चाहते थे, इसलिए अपने काम में प्रयोग करना शुरू कर दिया और आवश्यक परिवर्तन किए।
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हरकिशन ने 1983 से कुम्हारों को पॉटरी व्हील थ्रोइंग पॉटरी और भट्ठा फायरिंग तकनीक बनाने के सभी अलग-अलग तरीके सिखाकर उन्हें सशक्त बनाने के लिए कड़ी मेहनत की। विदेशियों के संपर्क में आने पर उन्होंने मिट्टी के बर्तनों के लिए डिजाइन विकास शुरू किया और मिट्टी के बर्तनों को लेकर विभिन्न उपयोगी खोज की।
हजारों को सिखाया
उन्होंने 1987 में कुम्हारों के साथ मिलकर मिट्टी के बर्तनों के लिए एक सहकारी समिति बनाई और शिल्प मेलों में काम का प्रदर्शन शुरू किया। बाद में एक कार्यशाला की स्थापना की, जहां कारीगरों और शुरुआती लोगों को पहिया फेंकने और फायरिंग तकनीक का प्रशिक्षण दिया गया। उनकी महत्वाकांक्षा टेराकोटा मिट्टी के बर्तनों को अगले स्तर तक ले जाने की थी, इसलिए टेराकोटा को अधिक टिकाऊ, धोने योग्य और खाद्य सुरक्षित बनाने के तरीके पर शोध करना शुरू किया। उन्होंने इसके लिए सामग्री को मजबूत किया और मिट्टी के व्यंजनों और ग्लेजिंग में विभिन्न प्रयोग किए। उन्होंने मिट्टी के ढांचों को विकसित करने में अपना बहुत समय लगाया।
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-फोटो 1 : वर्ष 2012 का शिल्प गुरु सम्मान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से प्राप्त करते हरकिशन प्रजापति।
-फोटो 2 : परंपरागत चाख पर मिट्टी के बर्तन बनाते हरकिशन।