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Jhajjar-Bahadurgarh News: बंटवारे के दर्द से बहादुरगढ़ की पहचान बने ‘सरदार जी पकौड़े वाले’

Fri, 29 May 2026 12:52 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, झज्जर/बहादुरगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, झज्जर/बहादुरगढ़ Updated Fri, 29 May 2026 12:52 AM IST
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Due to the pain of partition, 'Sardar ji pakoda wala' became the identity of Bahadurgarh.
फोटो 81: बिल्लू पकौड़े की दुकान पर कढ़ाई में पकते पकौड़े। संवाद
पंकज रोहिल्ला
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बहादुरगढ़। शहर के लाल चौक पर स्थित ‘सरदार जी पकौड़े वाले’ केवल एक दुकान नहीं बल्कि संघर्ष, मेहनत और स्वाद की ऐसी कहानी है जिसने बंटवारे का दर्द झेलकर भी अपनी अलग पहचान बनाई। वर्ष 1950 से शुरू हुआ यह सफर आज बहादुरगढ़ की पहचान बन चुका है। यहां के पकौड़ों का स्वाद मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक चख चुके है। प्रतिदिन सैकड़ों लोग इस स्वाद का आनंद लेने पहुंचते हैं।
इस कहानी की शुरुआत पाकिस्तान के करोड़ जिले से हुई थी। वर्ष 1947 में देश के बंटवारे के दौरान सरदार मान सिंह दुआ का परिवार सबकुछ छोड़कर भारत आ गया। शुरुआती दिनों में परिवार हिसार में रहा लेकिन दो साल बाद उनके भाई सरदार अजीत सिंह, जिन्हें लोग ‘सरदार बर्फी वाले’ के नाम से जानते थे उन्हें बहादुरगढ़ ले आए।
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यहीं से परिवार ने नए जीवन की शुरुआत की। उस दौर में हालात आसान नहीं थे। परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट था। सरदार मान सिंह दुआ घर पर पकौड़े तैयार करवाते और फिर रेहड़ी लगाकर लाल चौक पर बेचते थे। मेहनत, ईमानदारी और स्वाद ने धीरे-धीरे लोगों के दिल जीतने शुरू कर दिए। उस समय पकौड़ों का दाम केवल आठ रुपये किलो था, लेकिन स्वाद ऐसा था कि लोगों की भीड़ जुटने लगी।
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वर्ष 1971 में उनके बेटे बिल्लू दुआ ने इस काम को नए तरीके से आगे बढ़ाया। उन्होंने अपने नाम से पकौड़ों का व्यवसाय शुरू किया और गुणवत्ता को सबसे बड़ी पहचान बनाया। आज तीसरी पीढ़ी के रूप में उनके पौत्र अमित दुआ और सचिन दुआ वर्ष 2006 से इस कारोबार को संभाल रहे हैं।
दुकान पर 12 कर्मचारी काम करते हैं। परिवार के अनुसार प्रतिदिन 400 से अधिक ग्राहक दुकान पर पहुंचते हैं। वर्तमान में पकौड़ों का रेट 480 रुपये किलो तक पहुंच चुका है लेकिन स्वाद और गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आने दी गई। दुकान की खास बात यह भी है कि 40 वर्षों से अजीत सिंह पकौड़े तैयार कर रहे हैं। ग्राहक सुनील शर्मा, परमजीत, सुधीर कुमार का कहना है कि यहां के पकौड़ों में आज भी वही पुराना स्वाद मिलता है, जिसने दशकों पहले लोगों को आकर्षित किया था।

परिवार के अनुसार आज कारोबार का सालाना टर्नओवर करीब सवा करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। यह केवल व्यापार की सफलता नहीं बल्कि उस संघर्ष की जीत है, जिसने बंटवारे की पीड़ा को मेहनत और विश्वास के दम पर पहचान में बदल दिया। बहादुरगढ़ आने वाला शायद ही कोई व्यक्ति हो, जिसने ‘सरदार जी बिल्लू पकौड़े वाले’ का नाम न सुना हो।
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