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Jhajjar-Bahadurgarh News: अष्टमी पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, आस्था के दीप जले

Tue, 21 Nov 2023 01:46 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, झज्जर/बहादुरगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, झज्जर/बहादुरगढ़ Updated Tue, 21 Nov 2023 01:46 AM IST
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Crowd of devotees gathered on Ashtami, lamps of faith lit
बेरी में माता भीमेश्वरी देवी मंदिर। संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
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बेरी। माता भीमेश्वरी देवी मंदिर में अष्टमी के दिन श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। श्रद्धालु माता के दरबार में नवरात्र के अलावा हर माह की अष्टमी पर पूजा-अर्चना करने के लिए आते हैं। मां के दरबार में अलसुबह से भक्तों की लाइन में लगनी शुरू हो गई थी। सुबह करीब साढ़े 5 बजे मां को अंदर वाले दरबार से बाहर वाले भवन में लाया गया, जहां पुजारी ने मंत्रोच्चारण के साथ स्नान करवाया और मंगला आरती करने के बाद भक्तों के दर्शन के लिए कपाट खोल दिए।
पंडित कुलदीप वशिष्ठ ने बताया कि हर माह की अष्टमी के दिन मां के दरबार भक्तों की भीड़ उमड़ती है। महिलाओं ने मां के मंदिर में पीपल के पेड़ पर धागा बांधकर मन्नत मांगी। मां के दरबार में भक्तों को किसी प्रकार की परेशानी न हो, इसको लेकर पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी।
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बेरी शहर चौकी प्रभारी प्रदीप दलाल का कहना है कि माता भीमेश्वरी देवी मंदिर में हर माह की अष्टमी के दिन हरियाणा, दिल्ली समेत कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं, वहीं सूर्यनाथ सोहटी धाम के नेतृत्व में अंदर वाले भवन से बाहर वाले भवन तक ध्वजा यात्रा निकाली गई। भक्त सुरेश अग्रवाल व सुरेंद्र अग्रवाल ने बताया कि सूर्यनाथ सोहटी धाम के सानिध्य से सुबह ध्वजा यात्रा निकाली गई और शाम को भव्य सर्व प्रथम मंगल पाठ का भी आयोजन करवाया गया है, जिसमें पाठ वाचक डिंपल मुंबई से भजन गायक नरेश कुमार नरसी भजनों का गुणगान करेंगे।
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अति प्राचीन है मां भीमेश्वरी देवी मंदिर का इतिहास

मां भीमेवरी देवी मंदिर का इतिहास अति प्राचीन है। विद्वानों के अनुसार मां की मूर्ति को पांडु पुत्र भीम पाकिस्तान के हिंगजाल पर्वत से लेकर आए थे। भीम ने मां को अपने साथ चलने के लिए कहा तो मां ने पांडु पुत्र से कहा कि मैं तुम्हारे साथ तो चलूंगी, लेकिन तुम मुझे अपनी गोद में रखोगे। रास्ते में जहां भी उतारोगे, मैं उस स्थान से आगे नहीं जाऊंगी।

भीम ने मां का कहना माना और गोद में उठाकर युद्ध भूमि की तरफ चल पड़ा। जब भीम मां को लेकर बेरी कस्बे से गुजर रहा था तो भीम को लघुशंका के लिए उन्हें अपने कंधे से उतार दिया। बाद में माता को वापस चलने के लिए अपनी गोद में उठाने लगा तो वह नहीं उठ पाई। तभी मां भीमेश्वरी की यहां स्थापना हुई और महाभारत के युद्ध के बाद यहां मंदिर की स्थापना कर दी गई।
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