Yuva Najariya: ज्यादा कर्ज के कारण धुंधली हो रही देश की अर्थव्यवस्था... पढ़ें कर्ज पर युवाओं के विचार
प्रतिभागी विद्यार्थियों के लिए अमर उजाला की ओर से शुरू ‘युवा नजरिया’ कॉलम के लिए कई आलेख प्राप्त हुए। ‘बढ़ता कर्ज अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती’ विषय पर मिले आलेखों का मूल्यांकन डीएन कॉलेज की अर्थशास्त्र विभाग की अध्यक्ष डॉ. सुरुचि शर्मा ने किया। उन्होंने हिसार की अमर विहार कॉलानी निवासी जया रोहिल्ला के आलेख को बेहतर माना है।
विस्तार
जया रोहिल्ला का कहना है कि जैसा कि हमें हर दुकान पर देखने को मिलता है, “ कृपया उधार मांगकर शर्मिंदा न करें ”। परंतु क्या वास्तव में व्यक्ति अपनी दिनचर्या में इस पर अमल कर रहा है? क्या इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह कर्ज लेता है या नहीं ? यहां बात केवल एक व्यक्ति की नहीं, एक राज्य की नहीं, बल्कि संपूर्ण देश की है। हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत पर करीब 205 लाख करोड़ रुपये कर्ज हो गया है। अधिक ऋण से न केवल व्यक्ति के लिए समस्याएं खड़ी हो रही हैं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पूरे देश को अपने साथ लेकर चलने वाली अर्थव्यवस्था भी धुंधली हो रही है। हालांकि, इस पर कोई संदेह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति मजबूरी में ही कर्ज लेता है। वर्तमान समय में आर्थिक और विकास संबंधी कार्य पहले से काफी हद तक बढ़ गए हैं।
इन कार्यों में वृद्धि होने के कारण सार्वजनिक व्यय में भी काफी वृद्धि हुई है। इसके लिए सरकार को कई साधनों से धन प्राप्त करना अर्थात ऋण लेना पड़ता है। बीते वर्ष के आंकड़े देखें तो ज्ञात होता है कि भारत विकासशील देश के रूप में तेजी से प्रगति की ओर अग्रसर है। ये भी सच है कि वैश्विक महामारी, वैश्विक मंदी, सूखा, बाढ़ और जलवायु परिवर्तन के कुप्रभावों के बाद कई विकासशील देश तंग बजट पर काम कर रहे हैं। ये देश कर्ज के दलदल में फंसते जा रहे हैं और ऋण चुकाना मुश्किल हो रहा है।
ऋण विकासशील देशों के लिए भले ही दिन-प्रतिदिन एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है, लेकिन यह स्वाभाविक रूप से बुरा नहीं है। अर्थव्यवस्था में गिरावट की वजह से बेरोजगारी दर उच्च स्तर पर है। लेबर फोर्स सर्वे के मुताबिक, देश में 2023 के दौरान बेरोजगारी दर 13.4 फीसदी है। इसके अलावा असमानता भी बढ़ रही है। ऐसे कई लोग हैं, जिन्हें विकास प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जा रहा है, इसके चलते गुणवत्तापूर्ण नौकरियों का अभाव हो रहा है। अगर इसी भांति कर्ज में बढ़ोतरी होती रही तो देश को भारी महंगाई का भी सामना करना पड़ सकता है।
इस लेख की भाषा शैली में प्रवाह है। साथ ही लेख को पढ़ने से अच्छा महसूस होता है। लेख में निरंतरता के कारण इसे चयन किया। लेख में तथ्यों का भी समावेश है। भारत में जीडीपी का ज्यादातर हिस्सा ऋण चुकाने में खर्च हो रहा है। आईएमएफ ने कहा है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो जीडीपी का यह ऋण अनुपात 100 प्रतिशत हो जाएगा। अब प्रश्न यह है कि क्या यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है? पूरा देश इस बात से चिंतित दिखाई दे रहा है कि देश पर कर्जा बढ़ गया है। एक नजर विकसित अन्य देशों पर भी डालिए, जापान का ऋण जीडीपी का 255 प्रतिशत है और लगातार 2 दशकों से 100 प्रतिशत से ऊपर है। सिंगापुर का 168 प्रतिशत है।
यूएसए का 123 प्रतिशत व कनाडा का 106 प्रतिशत और चीन का पिछले लंबे समय से 100 प्रतिशत से ऊपर है। ये सभी देश निरंतर विकास कर रहे हैं परंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि भारत पर बढ़ता कर्ज का बोझ चिंता का विषय नहीं है। विश्व बैंक सर्वेक्षण के अनुसार यदि किसी देश का ऋण जीडीपी अनुपात 100 प्रतिशत लगातार बना रहता है तो देश की समृद्धि दर नहीं बढ़ सकती है। वर्तमान में भारत की स्थिति अधिक चिंता का विषय नहीं है, क्योंकि उत्पादकीय गतिविधियां बढ़ाकर इस ऋण जीडीपी अनुपात को कम किया जा सकता है। परंतु कर्जा लेकर सिर्फ अनुत्पादकीय गतिविधियों में लगाया गया तो भविष्य में यह चिंता का विषय बन सकता है।
एक तरफ जहां भारतीय अर्थव्यवस्था शानदार प्रदर्शन करते हुए 3 ट्रिलियन के आंकड़े को पार करते हुए अमेरिका, चीन, जर्मनी व जापान के बाद विश्व की 5वें स्थान पर पहुंच गई हैं, वहीं दूसरी तरफ देश की जीडीपी पर बढ़ता कर्ज एक चुनौती के रूप में सामने खड़ा है। हाल में प्रकाशित आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार देश पर करीब 205 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) ने भी आगाह किया है कि इसी तरह से भारत कर्ज लेता रहा तो यह देश की जीडीपी का 100 प्रतिशत हो सकता है।
दरअसल, देश का कर्ज लेना कोई बड़ी बात नहीं है, अमेरिका व जापान जैसी विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश भी भारत से बड़े कर्जदार हैं। कोई भी देश प्रमुख रूप से निवेश, आर्थिक संतुलन व समाज कल्याण के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए ऋण लेता है। भारत के मामले में स्थिति थोड़ी इस लिए अलग है कि हमारे पास उन देशों की तुलना में रिजर्व मनी कम है और आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार हमारी अर्थव्यवस्था में आपातकालीन स्थिति में इस कर्ज को मैनेज करने की क्षमताएं ज्यादा मजबूत नहीं हैं, क्योंकि देश की जीडीपी में ज्यादातर पैसा एफडीआई से आता है।
इसके बावजूद भारत के पक्ष में कई चीजें हैं जो इस कर्ज से दबी जीडीपी जैसे हालात में एक उम्मीद की राह दिखाते हैं। भारतीय जीडीपी का ग्रोथ रेट विश्व की टॉप 4 जीडीपी में सबसे अधिक है। इसके अलावा यहां युवाओं की आबादी अधिक है जिस कौशल प्रदान करके अर्थव्यवस्था में पैसे का फ्लो बढ़ाते हुए आय अर्जित की जा सकती है। कर्ज की व्यवस्था असंतुलित उस स्थिति में होती है जब ऋण का पैसे ऐसी कार्य में ना लगाया जाए, जिससे अर्थव्यवस्था को गति प्रदान होती हो या लोगों की परचेजिंग पावर बढ़े।
अगर कर्ज के पैसे को एक बेहतर प्लानिंग के साथ खर्च किया जाए तो कर्ज के इस खेल में बेहतर प्रदर्शन करते हुए इकोनॉमी के फ्रंट पर अग्रणी रहना मुश्किल कार्य नहीं है। भारत का कर्ज उसकी जीडीपी का करीब 90 प्रतिशत हो चुका है। जबकि जापान का 256 व अमेरिका का 133 प्रतिशत है। कर्ज के मामले में विकसित देशों का हाल देखते हुए भारत को इतना घबराने की जरूरत तो नहीं है, लेकिन अलर्ट हो जाने का वक्त जरूरत आ गया है। कर्ज के पैसों से सरकार अपने देश में अनेक तरह की वेलफेयर की योजनाओं के अलावा इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करके देश की तरक्की के दरवाजे भी खोल सकती है और अपने कर्ज से मुक्ति भी पा सकती है।
लेकिन इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आर्थिक विशेषज्ञों की टीम को शानदार व बुलेट प्रुफ योजना तैयार कर धरातल पर सख्ती से लागू करनी होगी। एक फुलप्रूफ प्लानिंग के साथ कर्ज के पैसे को इस्तेमाल करते हुए इस चुनौती को अवसर में तब्दील किया जा सकता है। कर्ज के पैसे को फ्री बीज योजनाओं में कम से कम इस्तेमाल करते हुए इसे अन्य सेक्टर में निवेश करना चाहिए। इसके अर्थ ये नहीं है कि सरकार वंचित तबकों के कल्याण के लिए योजनाओं में कटौती करें। दरअसल, कई बार सत्ता में काबिज राजनीतिक पार्टियां राजनीतिक स्वार्थ के लिए फ्री बीज योजनाएं लागू करती हैं, जिससे अर्थव्यवस्था कर्ज के मार में पिसती चली जाती है। कर्ज बढ़ने से देश अंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थानों जैसे आईएमएफ आदि की नीतियों को मानने पर मजबूर होता है और वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्वतंत्रता व निष्पक्षता से अपने निर्णय नहीं ले पाता। देश पर बढ़ता हुआ कर्ज आत्मनिर्भर भारत बनाने के मार्ग में बड़ा रोड़ा है। वर्तमान सरकार विकसित भारत 2047 के सपने को पूरा करना चाहती है तो कर्ज के बढ़ते बोझ को कम करने के लिए बड़े कदम उठाने होंगे।
- मनप्रीत सिंह, शोधार्थी, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, सीडीएलयू, सिरसा
अर्थव्यवस्था के मुकाबले विदेशी कर्ज बढ़ता है तो देश की सॉवरेन रेटिंग पर असर पड़ता है : प्रियंका सौरभ
सरकार का कर्ज इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी आमदनी कितनी है और खर्चे कितने हैं। अगर खर्चा आमदनी से ज्यादा है तो सरकार को उधार या कर्ज लेना पड़ता है। इसका सीधा असर सरकार के राजकोषीय घाटे पर पड़ता है। आज जो इतना कर्ज लिया जा रहा है इसका बोझ सिर्फ हमारे और आपके ऊपर नहीं आएगा।
भविष्य में इसका बोझ हमारी संतानों पर भी आएगा। अगर अर्थव्यवस्था में उत्पादन नहीं बढ़ेगा, रोजगार नहीं बढ़ेगा और हमारे देश में अमीर-गरीब के बीच असमानता कम नहीं होगी तो आपको कर्ज लेना ही पड़ेगा। और ये दुर्भाग्यपूर्ण है। भविष्य में अगर सरकार का कर्ज कम नहीं हुआ तो निजी कंपनियां ज्यादा ब्याज चुकाने के लिए मजबूर होंगी। तब निवेश और कम हो जाएगा।
इसे यूं समझिए अगर अर्थव्यवस्था के मुकाबले विदेशी कर्ज बढ़ता है तो देश की सॉवरेन रेटिंग पर असर पड़ता है। खासतौर से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर इसका ज्यादा असर पड़ सकता है। कर्ज को चुकाने में अगर डिफॉल्ट किया गया तो न सिर्फ देश की सॉवरेन रेटिंग पर असर पड़ेगा, बल्कि विदेशी निवेशकों में भी नकारात्मक संदेश जाएगा और निवेश गिर सकता है।
इसका असर उद्योगों और प्रोजेक्ट पर भी पड़ेगा, जिससे रोजगार के अवसर कम हो जाएंगे। यह संकट या बड़े पैमाने पर ऋण आवश्यकताओं के लिए भविष्य में उपयोगी उधार लेने की संभावना को बर्बाद करना और खतरे में डालना है। समस्या यह है कि ये सभी बढ़ते खर्च वास्तव में उच्च विकास की ओर ले जा रहे हैं और मानव पूंजी विकास के लिए आवश्यक सामाजिक/कल्याण व्यय की कीमत पर आ रहे हैं। राजकोषीय घाटे से उत्पन्न होने वाले 'छिपे हुए ऋण' की संभावना हमेशा बनी रहती है जिसे आधिकारिक आंकड़ों में 'चुपचाप छिपाया जाता है' और 'जिसका हिसाब नहीं दिया जाता है।' संकट के समय में, 'छिपे हुए ऋण' के आंकड़े किसी अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर सकते हैं।
भविष्य में इसका बोझ हमारी संतानों पर भी आएगा : डॉ. सत्यवान सौरभ
दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का खिताब अपने नाम लिए भारत सरकार और इसके राज्यों पर बहुत ज्यादा कर्ज हो गया है। अगर इसे कम नहीं किया गया, तो हमें इस अच्छे मौके का पूरा फायदा नहीं उठा पाएंगे। 2019-20 में महामारी से पहले ही ये कर्ज बढ़ने लगा था जो तब से कम नहीं हुआ है।
इस कर्ज के ज्यादा होने का एक कारण ये है कि निजी कंपनियां मुट्ठी ठीक से खोल नहीं रही हैं। वो अर्थव्यवस्था में कम पैसा लगा रही हैं। बैंकों और कंपनियों ने अपने लोन कम कर दिए, जिससे निजी निवेश कम हो गया है। इसी वजह से सरकार ने ज्यादा पैसा लगाकर अर्थव्यवस्था को बढ़ाने की कोशिश की और कर्ज बढ़ता गया। भविष्य में अगर सरकार का कर्ज कम नहीं हुआ तो निजी कंपनियां ज्यादा ब्याज चुकाने के लिए मजबूर होंगी। तब निवेश और कम हो जाएगा। इसे यूं समझिए अगर अर्थव्यवस्था के मुकाबले विदेशी कर्ज बढ़ता है तो देश की सॉवरेन रेटिंग पर असर पड़ता है।
खासतौर से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर इसका ज्यादा असर पड़ सकता है। कर्ज को चुकाने में अगर डिफॉल्ट किया गया तो न सिर्फ देश की सॉवरेन रेटिंग पर असर पड़ेगा, बल्कि विदेशी निवेशकों में भी निगेटिव संदेश जाएगा और निवेश गिर सकता है। इसका असर उद्योगों और प्रोजेक्ट पर भी पड़ेगा, जिससे रोजगार के अवसर कम हो जाएंगे।
इसके अलावा कर्ज डिफॉल्ट होने पर उसे चुकाना महंगा हो जाएगा, जिससे सरकारी खजाने पर भी असर पड़ सकता है और सरकार आम आदमी के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं में कटौती को मजबूर हो सकती है। सरकार का कर्ज इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी आमदनी कितनी है और खर्चे कितने हैं। अगर खर्चा आमदनी से ज्यादा है तो सरकार को उधार या कर्ज लेना पड़ता है। इसका सीधा असर सरकार के राजकोषीय घाटे पर पड़ता है।
1980 के बाद हमें बजट में राजस्व घाटा हो रहा है। राजस्व घाटे का मतलब है जो आपका वर्तमान खर्च है वो आपके राजस्व से ज्यादा है। इसलिए मौजूदा खर्च को चलाने के लिए के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है। राजस्व घाटे का मतलब है कि जिसके लिए आप उधार ले रहे हैं उस पर रिटर्न नहीं आएगा। जैसे- सब्सिडी या डिफेंस पर होने वाला खर्च। बजट का एक बड़ा हिस्सा इन पर खर्च होता है और फिर हमारा कर्ज बढ़ता चला जाता है। आज जो इतना कर्ज लिया जा रहा है इसका बोझ सिर्फ हमारे और आपके ऊपर नहीं आएगा। भविष्य में इसका बोझ हमारी संतानों पर भी आएगा। अगर अर्थव्यवस्था में उत्पादन नहीं बढ़ेगा, रोजगार नहीं बढ़ेगा और हमारे देश में अमीर-गरीब के बीच असमानता कम नहीं होगी, तो आपको कर्ज लेना ही पड़ेगा। और ये दुर्भाग्यपूर्ण है।
कर्ज किसी भी देश के लिए घातक साबित हो सकता है : पवन कुमार
पैसों के अभाव में जरूरी काम करने के लिए कर्ज लिया जाता है। लेकिन हद से ज्यादा कर्ज परेशानी का सबब बन जाता है।सभी देशों को कर्ज की आवश्यकता होती है, चाहे वो विकसित देश हो या विकसित देश। कर्ज देने वाले संस्थानों में मुख्यत: विश्व बैंक और एशिया बैंक है। किसी देश से कर्ज चाहिए तो इनसे ले सकता है। कोई एक देश दूसरे देश को कर्ज देता है, लेकिन इस देश को कर्ज देने वाले के हिसाब से नीतियां बनानी पड़ती है। इसे हर साल चुकाना पड़ता है।
इससे देश का बहुत सारा पैसा कर्ज चुकाने में चला जाता है। इससे उसे और कर्ज लेने की जरूरत पड़ती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण पाकिस्तान और श्रीलंका है। जिन्होंने चीन से कर्ज लिया और इस जाल में फंस गए कि इससे बाहर निकलना मुश्किल होता जा रहा है। पाकिस्तान में तो लोगों को जरूरी चीजें खरीदने में भी बहुत ज्यादा परेशानी हो रही है। इससे वह देश कंगाल होने की कगार पर है। इसलिए हम कह सकते हैं कि कर्ज किसी भी देश के लिए घातक साबित हो सकता है। वह उस देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बर्बाद कर देगा। इसलिए हमें कर्ज लेते समय ध्यान रखना चाहिए कि हम कर्ज आसानी चुका सकें।
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केंद्र सरकार की तरफ से जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत पर 31 मार्च 2023 तक 155.77 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था। यह कर्ज जीडीपी का 57.1 प्रतिशत है। हालांकि 2020-21 में आंतरिक और बाहरी कर्ज जीडीपी का 61.5 प्रतिशत था। आंकड़ों के अनुसार इस प्रतिशत में कमी आई है। वहीं, 31 मार्च 2024 तक यह कर्ज 172.50 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है।
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