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महिला समानता दिवस : सोच में बदलाव की दरकार, घर से होगी शुरुआत
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हिसार। महिला-पुरुष समानता की सोच के बाद देश ने महिला को प्रधानमंत्री के पद पर, मुख्यमंत्री के पद पर, मंत्री, विधायक, सांसद, आईएएस, आईपीएस अधिकारी के तौर पर देखा, लेकिन इससे भी अच्छी बात यह है कि आज महिलाएं उन जगह भी देखी जाती हैं, जिनको सिर्फ पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। आज महिलाएं ट्रक चालक, ऑटो रिक्शा चालक के तौर पर भी दिखाई दे रही हैं, जिसका मतलब है कि हर वर्ग के परिवारों से महिलाएं घर से बाहर कमाने के लिए निकल रही हैं, लेकिन आज भी इस मामले में जितना काम होना चाहिए था, उतना नहीं हो पाया है। लोगों की सोच नहीं बदली जा सकी है जिसको हमें अपने घरों से ही बदलना होगा।
ये विचार महिला समानता दिवस के अवसर पर चर्चा करते हुए हिसार बार की महिला अधिवक्ताओं ने अमर उजाला के साथ साझा किए। एडवोकेट रेनु वालिया ने कहा कि महिला और पुरुषों के बीच प्रकृति ने जो अंतर बनाया है, वह तो रहेगा, लेकिन शिक्षा के साथ-साथ महिलाएं इस अंतर को पाट रही हैं। आज महिलाएं वह कार्य भी कर रही है जो सिर्फ पुरुषों के क्षेत्र माने जाते थे, लेकिन पुरुष वह कार्य नहीं कर पा रहे हैं जो सिर्फ महिलाएं ही कर सकती हैं। हालांकि लोगों की सोच में बदलाव की आज भी बहुत जरूरत है।
एडवोकेट भावना गुप्ता ने बताया कि दिखावे के लिए तो बहुत कुछ हुआ है, लेकिन असलियत में उतना ज्यादा नहीं हुआ है। सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि अशिक्षित महिला व पुरुष, जहां महिला-पुरुष की समानता की खिलाफत करते ही हैं, साथ में शिक्षित पुरुषों की सोच भी ठीक नहीं है। हमें शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी देने चाहिए ताकि लोगों की सोच में बदलाव आए।
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एडवोकेट रेखा मित्तल ने कहा कि सरकार की योजनाओं के बाद आज महिलाओं के नाम अचल संपत्ति की रजिस्ट्री होने लगी ताकि स्टांप ड्यूटी में बचत हो, लेकिन पुरातन सोच के कारण उस संपत्ति को बेचने का अधिकार आज भी पुरुषों को ही है। आज पंचायतों में भी महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिल रहा है, लेकिन पुरुष उनको सिर्फ स्टांप की तरह प्रयोग कर रहे हैं, इस दिशा में काम की ज्यादा दरकार है।
एडवोकेट रेखा जाटव ने कहा कि महिलाओं ने अपने आप को हर क्षेत्र में साबित किया है, लेकिन लड़के की चाह की सोच आज भी समाज में व्याप्त है। जब तक यह सोच खत्म नहीं होगी और लड़का-लड़की को एक समान नहीं माना जाएगा, तब तक इस दिशा में सुधार की गुंजाइश रहेगी।
एडवोकेट ममता रानी ने कहा कि महिलाएं आज कामकाजी तो बन गई हैं, लेकिन पुरातनकाल से जो जिम्मेदारियां महिलाओं को मिली हुई थी, आज भी उनको महिलाएं ही निभा रही हैं। आज भी महिला जब अपनी ड्यूटी करके थक हारकर घर जाती है तो घर का सारा काम, बच्चों का ध्यान रखना आदि कई काम हैं, वह महिलाओं को ही करना पड़ता है।
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ये विचार महिला समानता दिवस के अवसर पर चर्चा करते हुए हिसार बार की महिला अधिवक्ताओं ने अमर उजाला के साथ साझा किए। एडवोकेट रेनु वालिया ने कहा कि महिला और पुरुषों के बीच प्रकृति ने जो अंतर बनाया है, वह तो रहेगा, लेकिन शिक्षा के साथ-साथ महिलाएं इस अंतर को पाट रही हैं। आज महिलाएं वह कार्य भी कर रही है जो सिर्फ पुरुषों के क्षेत्र माने जाते थे, लेकिन पुरुष वह कार्य नहीं कर पा रहे हैं जो सिर्फ महिलाएं ही कर सकती हैं। हालांकि लोगों की सोच में बदलाव की आज भी बहुत जरूरत है।
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एडवोकेट भावना गुप्ता ने बताया कि दिखावे के लिए तो बहुत कुछ हुआ है, लेकिन असलियत में उतना ज्यादा नहीं हुआ है। सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि अशिक्षित महिला व पुरुष, जहां महिला-पुरुष की समानता की खिलाफत करते ही हैं, साथ में शिक्षित पुरुषों की सोच भी ठीक नहीं है। हमें शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी देने चाहिए ताकि लोगों की सोच में बदलाव आए।
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एडवोकेट रेखा मित्तल ने कहा कि सरकार की योजनाओं के बाद आज महिलाओं के नाम अचल संपत्ति की रजिस्ट्री होने लगी ताकि स्टांप ड्यूटी में बचत हो, लेकिन पुरातन सोच के कारण उस संपत्ति को बेचने का अधिकार आज भी पुरुषों को ही है। आज पंचायतों में भी महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिल रहा है, लेकिन पुरुष उनको सिर्फ स्टांप की तरह प्रयोग कर रहे हैं, इस दिशा में काम की ज्यादा दरकार है।
एडवोकेट रेखा जाटव ने कहा कि महिलाओं ने अपने आप को हर क्षेत्र में साबित किया है, लेकिन लड़के की चाह की सोच आज भी समाज में व्याप्त है। जब तक यह सोच खत्म नहीं होगी और लड़का-लड़की को एक समान नहीं माना जाएगा, तब तक इस दिशा में सुधार की गुंजाइश रहेगी।
एडवोकेट ममता रानी ने कहा कि महिलाएं आज कामकाजी तो बन गई हैं, लेकिन पुरातनकाल से जो जिम्मेदारियां महिलाओं को मिली हुई थी, आज भी उनको महिलाएं ही निभा रही हैं। आज भी महिला जब अपनी ड्यूटी करके थक हारकर घर जाती है तो घर का सारा काम, बच्चों का ध्यान रखना आदि कई काम हैं, वह महिलाओं को ही करना पड़ता है।