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कोरोना काल में घर चलाना हुआ मुश्किल तो मां-पिता ने छोड़ा, 12 बच्चे बाल भवन पहुंचे

Thu, 08 Jul 2021 01:03 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Thu, 08 Jul 2021 01:03 AM IST
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When it was difficult to run the house during the Corona period, the parents left, 12 children reached Bal Bhavan
कुलदीप जांगड़ा
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हिसार। कोरोना काल की मार समाज में हर वर्ग पर पड़ी है और कुछ बच्चों के सिर से माता-पिता का साया छीन गया। कई लोगों का व्यापार ठप हो गया तो किसी की नौकरी चली गई। ऐसे में कई अभिभावक बड़ा परिवार होने या लालन-पोषण न कर पाने की वजह से अपने बच्चों को बाल भवन छोड़ने पर मजबूर हैं। कोरोना काल की पहली और दूसरी लहर के दौरान बाल भवन में ऐसे 12 बच्चे पहुंचे हैं। जिनको पालन-पोषण के डर से अभिभावकों ने छोड़ दिया है।
कुल बच्चों के मुकाबले यह तिहाई हिस्सा हैं, जो चिंताजनक विषय है। इनमें नवजात से लेकर 4 से 5 साल तक के बच्चे शामिल हैं। अब इनका लालन-पालन बाल भवन में तैनात आया और वहां का स्टाफ कर रहा है। इस बारे में संवाददाता ने ग्राउंड रिपोर्ट की है, तभी यह हकीकत सामने आई।
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जिले में साल 2015 में बाल भवन की शुरुआत हुई थी। पहले यह हांसी में था, लेकिन 2019 से हिसार में ही है। तब से लेकर अब तक बाल भवन में कुल 30 बच्चे आ चुके हैं। इस समय बाल भवन में 12 बच्चे रह रहे हैं। इनमें 8 लड़कियां और 4 लड़के हैं। सीडब्ल्यूसी द्वारा उन दंपती को बच्चे गोद दिए जाते हैं, जिनकी सालाना 4 से 5 लाख आय हो। (संवाद)
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4 बच्चे जा चुके विदेेश, एक की तैयारी
अब तक बाल भवन से 4 बच्चें विदेश जा चुके हैं। जैसे कि इटली, स्पेन, दुबई और फ्रांस। इन देशों में रहने वाले दंपती ने इन चारों बच्चों को गोद लिया है। इन बच्चों को गए हुए काफी समय बीत चुका है। खास बात यह है कि यह चारों ही लड़कियां हैं। अब एक और डेढ़ साल की बच्ची के कनाडा जाने की तैयारी है। खुशी की बात यह है कि इनमें से अभी तक कोई बच्चा वापस नहीं आया है। बाल भवन में 10 बच्चों के रहने के क्षमता है। मगर इस समय क्षमता से अधिक 12 बच्चे हैं। इनमे से दो बच्चों को उनके मां-बाप लेकर जाने वाले हैं, जिन्होंने पहले लालन-पालन के डर से छोड़ दिया था। ऐसी उम्मीदें बाकी अभिभावक से भी है। देरी से सही आखिरकार बच्चों को अपने माता-पिता का साथ तो मिल सकेगा।
मैं कब घर जाऊंगी
बाल भवन में रह रही एक सात वर्षीय बच्ची स्टाफ से कह रही थी, कि मैं कब घर जाऊंगी। बच्ची बोली कि मम्मा हर बार फोन पर कहती है कि अबकी बार लेने आऊंगी और घर लेकर जाऊंगी। इसलिए बच्ची स्टाफ से ही पूछती है कि मम्मा क्यों नहीं आई, कह रही थी अब आऊंगी। उस समय बच्ची काफी उदास थी और कुछ दिन से उसका मन भी नहीं लग रहा था। इस बच्ची को कोरोना काल में ही मां-बाप ने छोड़ा है। अभी भी कई बार उसके मां-बाप इससे फोन से बात करते हैं।
बड़े बच्चों को रहने में होती है परेशानी
बाल भवन में तैनात मैनेजर मोतीलाल ने कहा कि कई मां-बाप बड़े बच्चों को छोड़ देते हैं, जिस कारण उन बच्चों को यहां रहने में परेशानी होती है और न ही उनका मन लगता है। क्योंकि इस उम्र में बच्चे अपने मां-बाप या परिवार को भूल नहीं पाते। यदि बच्चों को जन्म के समय ही छोड़ दिया जाए तो वे बच्चे जल्दी ही बाकी बच्चों के साथ मिलकर रहने लग जाते हैं और आया को ही अपनी मां समझते हैं।
बाल भवन में मैनेजर मोतीलाल, नर्स ममता, सोशल वर्कर पूजा और आया में रीना, मंजू, दर्शना, शिल्पा, सुमन व संतरों शामिल है। इसके अलावा पैनल के तहत निजी बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मीनू गोयल बच्चों की रेखभाल में जुटा है।

हमारे पास कोरोना काल में 11 बच्चे ऐसे आए हैं, जिनको उनके माता-पिता ने छोड़ा है। यह अभिभावक बड़ा परिवार या लालन-पोषण करने में सक्षम नहीं थे। हमारे यहां से 4 बच्चे विदेश भी गए हैं, अभी यहां पर 12 बच्चे दाखिल हैं।
- सुभाष मेहरा, सुपरिंटेंडेंट, चाइल्ड वेलफेयर कमेटी, हिसार
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