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अपने साथ नहीं थे, फिर भी नहीं मानी हार, मेहनत के बल पर बना कोई कोच तो कोई अध्यापक

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 08 Nov 2021 01:09 AM IST
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Was not with me, yet did not give up, some coach made on the strength of hard work and some teacher
विष्णु - फोटो : Hisar
पिंकू यादव
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हिसार। कुछ बच्चे सभी सुविधाएं मिलने के बाद भी सफल नहीं हो पाते। वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं, जो अभावों में पलकर और अपनों के बिना मेहनत के बलबूते आगे बढ़ते हैं। शहर में भी कुछ ऐसे बच्चे रहे, जिनके अपने उनके साथ नहीं थे। इसके बावजूद उन्होंने मेहनत के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई है। आज समाज में सफल होकर नाम कमाया है।
आज विश्व अनाथ दिवस है। इसी उपलक्ष्य में हमने ऐसे कुछ लोगों से बात की जो अनाथ आश्रम में पले बढ़े। वे अपनी मेहनत के बल पर कुश्ती कोच से लेकर सरकारी अध्यापक तक बन गए।
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अनाथ आश्रम के आश्रय और मेहनत के बलबूते सफल हुए कुश्ती कोच विष्णु, आज तैयार कर रहे अंतरराष्ट्रीय पहलवान
कुश्ती के कोच विष्णु ने बताया कि वह श्री कृष्ण प्रणामी बाल आश्रम में पले बढ़े हैं। उन्होंने दसवीं तक की पढ़ाई कैमरी गांव के सरकारी स्कूल से की। उनका खेलों में रुझान था। इसलिए जब आश्रम में कोच रणधीर ने कुश्ती की ट्रेनिंग शुरू की तो उन्होंने उनसे ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी। उन्होंने अभ्यास शुरू किया तो कोच रणधीर ने भी उनका सहयोग किया। वह खेल में काफी अच्छे थे, दौड़ और अन्य गेम में भी खेलते थे। कोच रणधीर ने आश्रम में ही मिट्टी का अखाड़ा बनाया और वहां उसने ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी। विष्णु बताते हैं कि वह खेल में काफी अच्छे थे। वह लगातार आगे बढ़ते रहे। इसके बाद वे कुश्ती में जिले में प्रथम रहे। उस दौरान हरियाणा एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय में स्पोर्ट्स कॉलेज होता था। उन्होंने वहां पर एडमिशन लिया। वहां अर्जुन अवॉर्डी रहे कोच उदय पहलवान के मार्गदर्शन में कुश्ती का अभ्यास किया। वहां भी खाना-पीना सब सरकारी थी। कुछ फीस लगती थीं, वह आश्रम से महाराज जी दे देते थे। इसके बाद वहा छह साल की डिग्री ली। यह कोचिंग का कोर्स था। इसके बाद स्पोर्ट्स की लाइन ही पकड़ी ली। इसके बाद पटियाला में कोच का ट्रायल देने गया तो वहां भी चयनित हो गया। वहां खाना पीना सब हॉस्टल की तरफ से था। वहा एक साल के कोर्स के बाद खेल विभाग में 18 कोच लगने थे। उस दौरान उसका भी चयन हो गया। इसके बाद से वे महावीर स्टेडियम में कोचिंग दे रहे हैं। विष्णु ने बताया कि उनके पास पूजा ढांडा, किरण गोदारा सहित कई इंटरनेशनल खिलाड़ी उन से कोचिंग लेकर आगे बढ़ चुके हैं। विष्णु ने बताया कि जब श्री कृष्ण प्रणामी आश्रम में आए तो वह उस समय करीब छह या सात वर्ष के रहे होंगे। उन्हें नहीं मालूम कि आश्रम में उनको कौन लाया था। कौन उनके माता-पिता हैं और कहां कि रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि आश्रम के आश्रय और मेहनत के बलबूते पर मैंने सफलता हासिल की है।
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हालात ने बना दिया अध्यापक
आश्रम में पले बढ़े रमेश ने बताया कि उन्हें छोटी उम्र में ही आश्रम में लाया गया था। रमेश ने बताया कि आश्रम से ही उन्हें पढ़ाया लिखाया गया। जिसके बाद वे आज सरकारी अध्यापक हैं। रमेश ने बताया कि उन्होंने दसवीं कक्षा के बाद अपने स्तर पर कई काम किए। एंबुलेंस चलाई, कई मल्टीनेशनल कंपनी में काम किया। अब आश्रम में ही कृष्ण के साथ मिलकर अपनी फाउंडेशन भी चलाते हैं। र्वे आएएस बनना चाहते थे, लेकिन अब हिसार के ही सरकारी स्कूल में अध्यापक हैं।

पता नहीं कौन आश्रम में छोड़ गया
हरी ने बताया की वे भी रमेश की तरह ही श्री कृष्ण आश्रम में पले बढ़े हैं। वे बताते है कि वह अब सरकारी स्कूल में टीचर हैं। 46 साल के हरी ने बताया कि उनकी माता चाहती थीं कि वे एक अच्छे अध्यापक बनें। बच्चों के भविष्य को संवारने का काम करें। आज अध्यापक बन व अपनी मां के सपने को पूूरा कर वे बेहद खुश है। वे अपने स्तर पर अब आश्रम में मदद करते हैं। उन्होंने बताया कि आश्रम में उनको यहां कौन लाया पता नहीं। (संवाद)
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