{"_id":"643d9a81c05cdaeab50011a4","slug":"the-site-will-be-kept-open-for-those-interested-in-history-information-will-also-be-available-from-the-museum-hisar-news-c-21-hsr1020-109687-2023-04-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"Hisar News: इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए खुली रखी जाएगी साइट, म्युजियम से भी मिलेगी जानकारी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Hisar News: इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए खुली रखी जाएगी साइट, म्युजियम से भी मिलेगी जानकारी
विज्ञापन
नारनौंद। हड़प्पाकालीन स्थल राखीगढ़ी के टीले इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। इसे देखते हुए खोदाई के बाद साइट नंबर एक व तीन का खुला रखने पर विचार किया जा रहा है। जबकि, पहले खोदाई के बाद साइटों को बंद कर दिया जाता था। इसके अलावा यहां बन रहा संग्रहालय भी पुरातन इतिहास से अवगत कराएगा। विश्व विरासत दिवस पर आज इस प्राचीन स्थल पर छायाचित्र प्रदर्शनी का भी आयोजन किया जाएगा।
टीलों के नीचे दबे देश के प्राचीन इतिहास की खोज चल रही है। दीनदयाल उपाध्याय पुरातत्व संस्थान नोएडा के पुरातत्वविद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सहयोग से उत्खनन कार्य में जुटे हैं। एएसआई के 20 छात्र साइट नंबर एक और तीन पर खोदाई करने में लगे हुए हैं। 22 जनवरी से चल रही खोदाई पूरे मई माह तक चलने का अनुमान है। इतिहासकारों का मानना है कि राखीगढ़ी पांच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता का प्रतीक स्थल है। यहां चौथी बार खोदाई चल रही है। अब तक मिले अवशेषों के आधार पर यह कहा जा रहा है कि राखीगढ़ी हड़प्पा काल में महानगर था। यहां पर दृष्टवती नदी के होने के प्रमाण मिले हैं, जो सरस्वती की सहायक नदी कही जाती है। इस बार की खोदाई में अभी तक साइट नम्बर एक पर कच्ची ईंटो की दीवारें और साइट नम्बर तीन पर एक कुआं मिला है। कुएं का व्यास करीब एक मीटर है। उसके चारों तरफ एक-एक फुट का बी नुमा 32 पक्की ईंटें लगाकर गोल आकार का बनाया हुआ है।
फिलहाल पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग दिल्ली के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. संजय मंजुल की देखरेख में खोदाई हो रही है। उनका प्रयास है कि राखीगढ़ी को आने वालों को कुछ अलग से देखने को मिले। इसलिए खोदाई की जाने वाले साइट को खुला रखा जाएगा। पहले हुई दो बार की खोदाई में साइट को मिट्टी से ढक दिया जाता था।
विज्ञापन
राखीगढ़ी के लोग मिट्टी के बर्तनों का भी जानते थे प्रयोग
हड़प्पाकालीन सभ्यता के लोगों ने शुरुआत में मिट्टी के बर्तन में खाना पकाना व खाना सीख लिया था। खोदाई में मिली भट्ठियों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि लोगाें ने चूल्हे पर भोजन बनाने का तरीका भी उसी समय सीख लिया था। इसके अलावा लोग दूध व दूध से बनी वस्तुओं का प्रयोग करते थे।
वर्ष 1998 में पहली बार हुई थी खोदाई
राखीगढ़ी में साइट नंबर 3 पर पहली बार, एक नंबर साइट पर दूसरी बार और सात नंबर साइट पर तीसरी बार खोदाई हो रही है। पहली बार एएसआई के डायरेक्टर डॉ. अमरेंद्र नाथ ने 1998 से 2000 तक खोदाई की थी। दूसरी बार डेक्कन यूनिवर्सिटी के पूर्व चांसलर प्रोफेसर बसंत शिंदे ने 2011 से 2016 तक खोदाई की थी।
संग्रहालय भी देगा इतिहास की जानकारी
प्रदेश सरकार की तरफ से 23.85 करोड़ रुपये की लागत से एक आधुनिक म्यूजियम, कैफेटेरिया, हॉस्टल व रेस्ट हाउस का निर्माण किया जा रहा है। इसमें से हॉस्टल, रेस्ट हाउस व कैफेटेरिया का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है। म्यूजियम का काम पूरा होने के बाद खोदाई के दौरान निकला हुआ सामान रखा जाएगा। जिसको देखकर आने वाले पर्यटक उसको देखकर यह जान पाएंगे कि हड़प्पा कालीन सभ्यता के समय के लोग किन चीजों का प्रयोग करते थे। उनका जीवन यापन व रहन सहन का क्या तरीका था।
50 हेक्टेयर जमीन से नष्ट हो चुके हैं अवशेष
राखीगढ़ी में 550 हेक्टेयर जमीन पर शहर का विकास था। जिसमें से लगभग 500 हेक्टेयर से अवशेष नष्ट हो चुके हैं। फिलहाल 40 से 50 हेक्टेयर क्षेत्र में ही अवशेष बरकरार हैं। जिसको 7 टीलों में बांटा गया है। साइट नंबर 8 कृषि उपयोग में होने के कारण लगभग नष्ट हो चुकी है और साइट नंबर 9 आधे से ज्यादा नष्ट हो चुकी है।
विज्ञापन
टीलों के नीचे दबे देश के प्राचीन इतिहास की खोज चल रही है। दीनदयाल उपाध्याय पुरातत्व संस्थान नोएडा के पुरातत्वविद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सहयोग से उत्खनन कार्य में जुटे हैं। एएसआई के 20 छात्र साइट नंबर एक और तीन पर खोदाई करने में लगे हुए हैं। 22 जनवरी से चल रही खोदाई पूरे मई माह तक चलने का अनुमान है। इतिहासकारों का मानना है कि राखीगढ़ी पांच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता का प्रतीक स्थल है। यहां चौथी बार खोदाई चल रही है। अब तक मिले अवशेषों के आधार पर यह कहा जा रहा है कि राखीगढ़ी हड़प्पा काल में महानगर था। यहां पर दृष्टवती नदी के होने के प्रमाण मिले हैं, जो सरस्वती की सहायक नदी कही जाती है। इस बार की खोदाई में अभी तक साइट नम्बर एक पर कच्ची ईंटो की दीवारें और साइट नम्बर तीन पर एक कुआं मिला है। कुएं का व्यास करीब एक मीटर है। उसके चारों तरफ एक-एक फुट का बी नुमा 32 पक्की ईंटें लगाकर गोल आकार का बनाया हुआ है।
विज्ञापन
फिलहाल पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग दिल्ली के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. संजय मंजुल की देखरेख में खोदाई हो रही है। उनका प्रयास है कि राखीगढ़ी को आने वालों को कुछ अलग से देखने को मिले। इसलिए खोदाई की जाने वाले साइट को खुला रखा जाएगा। पहले हुई दो बार की खोदाई में साइट को मिट्टी से ढक दिया जाता था।
विज्ञापन
राखीगढ़ी के लोग मिट्टी के बर्तनों का भी जानते थे प्रयोग
हड़प्पाकालीन सभ्यता के लोगों ने शुरुआत में मिट्टी के बर्तन में खाना पकाना व खाना सीख लिया था। खोदाई में मिली भट्ठियों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि लोगाें ने चूल्हे पर भोजन बनाने का तरीका भी उसी समय सीख लिया था। इसके अलावा लोग दूध व दूध से बनी वस्तुओं का प्रयोग करते थे।
वर्ष 1998 में पहली बार हुई थी खोदाई
राखीगढ़ी में साइट नंबर 3 पर पहली बार, एक नंबर साइट पर दूसरी बार और सात नंबर साइट पर तीसरी बार खोदाई हो रही है। पहली बार एएसआई के डायरेक्टर डॉ. अमरेंद्र नाथ ने 1998 से 2000 तक खोदाई की थी। दूसरी बार डेक्कन यूनिवर्सिटी के पूर्व चांसलर प्रोफेसर बसंत शिंदे ने 2011 से 2016 तक खोदाई की थी।
संग्रहालय भी देगा इतिहास की जानकारी
प्रदेश सरकार की तरफ से 23.85 करोड़ रुपये की लागत से एक आधुनिक म्यूजियम, कैफेटेरिया, हॉस्टल व रेस्ट हाउस का निर्माण किया जा रहा है। इसमें से हॉस्टल, रेस्ट हाउस व कैफेटेरिया का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है। म्यूजियम का काम पूरा होने के बाद खोदाई के दौरान निकला हुआ सामान रखा जाएगा। जिसको देखकर आने वाले पर्यटक उसको देखकर यह जान पाएंगे कि हड़प्पा कालीन सभ्यता के समय के लोग किन चीजों का प्रयोग करते थे। उनका जीवन यापन व रहन सहन का क्या तरीका था।
50 हेक्टेयर जमीन से नष्ट हो चुके हैं अवशेष
राखीगढ़ी में 550 हेक्टेयर जमीन पर शहर का विकास था। जिसमें से लगभग 500 हेक्टेयर से अवशेष नष्ट हो चुके हैं। फिलहाल 40 से 50 हेक्टेयर क्षेत्र में ही अवशेष बरकरार हैं। जिसको 7 टीलों में बांटा गया है। साइट नंबर 8 कृषि उपयोग में होने के कारण लगभग नष्ट हो चुकी है और साइट नंबर 9 आधे से ज्यादा नष्ट हो चुकी है।