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भदावरी नस्ल की भैंस के दूध से निकलता है सबसे अधिक घी, पनीर और मावा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 23 Sep 2022 11:45 PM IST
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The milk of Bhadavari breed buffalo produces the most ghee, paneer and mawa.
राष्ट्रीय चारागाह संस्थान झांसी में पाली गईं भदावरी नस्ल की भैंस। - फोटो : Hisar
उदयभान त्रिपाठी
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हिसार। मुर्राह नस्ल से आकार में हल्की भदावरी नस्ल की भैंस के दूध में घी की मात्रा अधिक होती है। केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान (सीआईआरबी) हिसार की यूनिट झांसी (यूपी) में इस पर हाल में किए गए शोध में यह बात सामने आई है। मुर्राह नस्ल की भैंस के दूध में औसतन सात प्रतिशत फैट होता है, जबकि भदावरी के दूध में औसत 8.3 प्रतिशत फैट मिला है। मुर्राह व नीली रावी की अपेक्षा इस प्रजाति में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अधिक होती है। यही कारण है कि यह सबसे कम बीमार होती है।
देशभर में भैंस की 19 प्रजातियां हैं, जिनमें सबसे अधिक दूध हरियाणा की मुर्राह व पंजाब की नीली रावी प्रजाति की भैंस देती हैं। इन दोनों प्रजाति में दूध का औसत उत्पादन (300 दिन के आधार पर) 22-25 लीटर तक होता है। अगर दूध में मिलने वाले फैट के आधार पर तुलना करें तो उत्तर प्रदेश के चंबल क्षेत्र में पाई जाने वाली भदावरी नस्ल की भैंस अपनी अलग पहचान रखती है।
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चारा खाती है कम, रोग प्रतिरोधक क्षमता सबसे अधिक
सीआईआरबी के प्रधान वैज्ञानिक (एनिमल ब्रीडिंग) एवं राष्ट्रीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान झांसी (यूपी) के प्रभारी डॉ. बीपी कुशवाहा बताते हैं कि भदावर (आगरा की एक तहसील का नाम) क्षेत्र में पाई जाने वाली इस प्रजाति की भैंस की खासियत आसपास के लोगों को पता है। औसतन चार क्विंटल वजन वाली इस भैंस की रोग प्रतिरोधक क्षमता सबसे अधिक होती है। मुर्राह की अपेक्षा एक चौथाई चारा कम खाती है और दूध भी औसतन छह से सात लीटर देती है। लेकिन, इसके दूध में फैट की मात्रा देश में पाई जाने वाली भैंसों की किसी भी प्रजाति में से सबसे अधिक होती है। फैट अधिक होने के चलते इसके दूध में पनीर व खोवा भी अधिक मिलता है।
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सीएफटीआरआई ने भी माना प्रमाणिक
डॉ. कुशवाहा बताते हैं कि भदावरी भैंस के दूध में पाए जाने वाले गुणवत्ता की जांच मैसूर के सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीच्यूट (सीएफटीआरआई) में कराई जा चुकी है। जांच में इस बात की पुष्टि हुई है कि भदावरी के दूध में 77.30 प्रतिशत सेचुरेटेड फैट व 22.61 प्रतिशत अनसेचुरेटेड फैट होता है। घी में पाया जाना वाला फैट वनस्पति व तेलों में मिलने वाले फैट के मुकाबले अच्छा होता है। इसका हृदय पर सकारात्मक असर होता है।
देश में 10 लाख से अधिक है संख्या
मुर्राह व नीली रावी की तरह ही भदावरी भैंसों की संख्या में लगातार वृद्घि हो रही है। देश में इसकी 10 लाख से अधिक संख्या है। डॉ. बीपी कुशवाहा के अनुसार घी की अधिकता के चलते अब हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश के पशुपालक इसका सीमेन ले जा रहे हैं। देश में अब तक 14 लाख से अधिक सीमेन इस प्रजाति का वितरित हो चुका है।

कोट
मुर्राह व नीली रावी को दूध उत्पादन के लिए पसंद किया जाता है, लेकिन घी के लिए भदावरी की प्रजाति सबसे अच्छी है। हर नस्ल की अपनी खासियत होती है। ओरछा राज परिवार की पशुशाला में भी भदावरी नस्ल की भैंसों का पालन होता है। इसके दूध का स्वाद भी बेहतर है। भैंसों की देसी नस्लों का संवर्धन किया जा रहा है। - डॉ. टीके दत्ता, निदेशक, सीआईआरबी हिसार
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