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Hisar News: सुमित्रा महिलाओं को बना रही कारोबारी ,15 हजार को दे चुकी प्रशिक्षण
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हिसार। गांव मंगाली की सुमित्रा देवी अपने गांव ही नहीं आसपास के 50 से अधिक गांवों के लिए देवी स्वरूप साबित हो रही हैं। मनकों की माला बनाने से प्रसिद्ध हुई सुमित्रा अब तक 15 हजार महिलाओं को प्रशिक्षण दे चुकी हैं। उनके गांव की करीब 2 हजार महिलाओं का रोजगार भी चला रही हैं। जिसमें महिलाओं को घर पर ही काम करते हुए हर महीने 15 से 20 हजार रूपये की कमाई हो जाती है। महिलाओं ने सभी महिलाओं को एक छत के नीचे लाकर अपने कारोबार को एक एमएसएमई का रूप देने के लिए प्रोजेक्ट तैयार किया है। जिसमें लिए उन्होंने जमीन लीज पर ली है। अब सरकार की ओर से 5 करोड़ के लोन का इंतजार है। इस कारोबार में 500 महिलाएं एक साथ काम करेंगी।
सुमित्रा ने बताया कि उन्होंने वर्ष 1990 में 10 महिलाओं के साथ एक समूह बनाकर लोन लिया था। पहले मुझे पंजीरी बनाने का काम मिला था।जिसकी कोई ज्यादा डिमांड नहीं थी। वर्ष 2000 में स्वयं सहायता समूह की याेजना आई तो जिले का सबसे पहला समूह जागृति महिला समूह बनाया। इस समूह के तहत महिलाएं मनके बनाना शुरु किया। ऐसे मनके हमारे गांव के कुछ बुजुर्ग बनाते थे। जो उनकी माला बनाकर मेले में बेचते थे। हमारा समूह पहले मनके बनाकर उन्हें गांव के ही व्यापारियों को बेचता था। व्यापारी उसे दिल्ली सप्लाई करते थे। दिल्ली में उन मनकों का उपयोग कर बैग, माला आदि उत्पाद बनाए जाते थे। इसके बाद मैंने दिल्ली में बैग, माला आदि बनाने का प्रशिक्षण लिया। धीरे धीरे हमारा समूह अपने उत्पादों को मेलों में अपने उत्पाद बेचने लगा। फरीदाबाद, गुरुग्राम, दिल्ली व्यापार मेले में भी प्रदर्शित किए। मैंने लगातार 15 साल इस मेले में स्टॉल लगाई। फिलहाल हमारे मनकों की माला सहित अन्य उत्पाद कई देशों में पहुंच रहे हैं। जिसमें यूएसए, पाकिस्तान, बांग्लादेश, जापान में भी यह उत्पाद पहुंच रहे हैं।
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सुमित्रा फिलहाल मनकों की माला के अलावा लकड़ी के सजावटी आईटम बनाने पर भी काम कर रही हैं। जिसमें अलग अलग तरह की सीनरी सहित अन्य उत्पाद बनाने पर प्रशिक्षण ले रही हैं। वर्ष 2006 में उन्होंने भारती फाउंडेशन एनजीओ बनाया। इस एनजीओ के जरिए महिलाओं के स्वयं सहायता समूह बनाकर उनको प्रशिक्षण देती है। अपने एनजीओ का सर्टिफिकेट भी देती है। इस सर्टिफिकेट के आधार पर उन्हें लोन मिलता है। जिससे वह अपना कारोबार शुरु कर पाती हैं। हिसार , जींद, फतेहाबाद, भिवानी ,चरखी दादरी, रोहतक, सिरसा आदि जिलों में महिलाओं को प्रशिक्षण देकर समूह बनवा चुकी हैं।
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पाकिस्तान में दिया प्रशिक्षण, अमेरिका से मिला न्योता
वर्ष 2012 में इंडिया फर्स्ट शो के तहत उन्हें प्रशासन की ओर से पाकिस्तान भेजा गया। वहां मैंने अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाई तथा 10 दिनों तक महिलाओं को लकड़ी के मनके बनाने का प्रशिक्षण दिया। बाद में मेरे पास पाकिस्तान से चिठ्ठी आई , जिसमें उन्होंने मुझे फिर से बुलाया। मैंने दूसरी बार जाने से इनकार कर दिया। अमेरिका के लिए भी मुझे न्योता मिला लेकिन जीआई टैग न होने के कारण नहीं जा सकी। अब मैंने जीआई टैग के लिए आवेदन किया हुआ है।
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महिलाओं को हुनरमंद बनाकर रोजगार बनाने का लक्ष्य..
सुमित्रा ने बताया कि वह दसवीं पास ही हैं। अपने चारों बच्चों को भी उच्च शिक्षा दिलवाई। मेरी एक बेटी बीटेक , एक जेबीटी, तीसरी इंटनेशनल फुटबाल खिलाड़ी है। बेटा रक्षा मंत्रालय में बतौर सीनियर ऑडिटर है। उनके पति जगदीश वन विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे। फिलहाल खेती बाड़ी का काम संभालते हैं। सुमित्रा देवी ने बताया उनके चारों बच्चों की शिक्षा , नौकरी व शादी की जिम्मेदारी पूरी करने के बाद फिलहाल उनका पूरा फोकस गांव की महिलाओं को हुनरमंद बनाकर रोजगार दिलाना है।
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सुमित्रा ने बताया कि उन्होंने वर्ष 1990 में 10 महिलाओं के साथ एक समूह बनाकर लोन लिया था। पहले मुझे पंजीरी बनाने का काम मिला था।जिसकी कोई ज्यादा डिमांड नहीं थी। वर्ष 2000 में स्वयं सहायता समूह की याेजना आई तो जिले का सबसे पहला समूह जागृति महिला समूह बनाया। इस समूह के तहत महिलाएं मनके बनाना शुरु किया। ऐसे मनके हमारे गांव के कुछ बुजुर्ग बनाते थे। जो उनकी माला बनाकर मेले में बेचते थे। हमारा समूह पहले मनके बनाकर उन्हें गांव के ही व्यापारियों को बेचता था। व्यापारी उसे दिल्ली सप्लाई करते थे। दिल्ली में उन मनकों का उपयोग कर बैग, माला आदि उत्पाद बनाए जाते थे। इसके बाद मैंने दिल्ली में बैग, माला आदि बनाने का प्रशिक्षण लिया। धीरे धीरे हमारा समूह अपने उत्पादों को मेलों में अपने उत्पाद बेचने लगा। फरीदाबाद, गुरुग्राम, दिल्ली व्यापार मेले में भी प्रदर्शित किए। मैंने लगातार 15 साल इस मेले में स्टॉल लगाई। फिलहाल हमारे मनकों की माला सहित अन्य उत्पाद कई देशों में पहुंच रहे हैं। जिसमें यूएसए, पाकिस्तान, बांग्लादेश, जापान में भी यह उत्पाद पहुंच रहे हैं।
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सुमित्रा फिलहाल मनकों की माला के अलावा लकड़ी के सजावटी आईटम बनाने पर भी काम कर रही हैं। जिसमें अलग अलग तरह की सीनरी सहित अन्य उत्पाद बनाने पर प्रशिक्षण ले रही हैं। वर्ष 2006 में उन्होंने भारती फाउंडेशन एनजीओ बनाया। इस एनजीओ के जरिए महिलाओं के स्वयं सहायता समूह बनाकर उनको प्रशिक्षण देती है। अपने एनजीओ का सर्टिफिकेट भी देती है। इस सर्टिफिकेट के आधार पर उन्हें लोन मिलता है। जिससे वह अपना कारोबार शुरु कर पाती हैं। हिसार , जींद, फतेहाबाद, भिवानी ,चरखी दादरी, रोहतक, सिरसा आदि जिलों में महिलाओं को प्रशिक्षण देकर समूह बनवा चुकी हैं।
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पाकिस्तान में दिया प्रशिक्षण, अमेरिका से मिला न्योता
वर्ष 2012 में इंडिया फर्स्ट शो के तहत उन्हें प्रशासन की ओर से पाकिस्तान भेजा गया। वहां मैंने अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाई तथा 10 दिनों तक महिलाओं को लकड़ी के मनके बनाने का प्रशिक्षण दिया। बाद में मेरे पास पाकिस्तान से चिठ्ठी आई , जिसमें उन्होंने मुझे फिर से बुलाया। मैंने दूसरी बार जाने से इनकार कर दिया। अमेरिका के लिए भी मुझे न्योता मिला लेकिन जीआई टैग न होने के कारण नहीं जा सकी। अब मैंने जीआई टैग के लिए आवेदन किया हुआ है।
महिलाओं को हुनरमंद बनाकर रोजगार बनाने का लक्ष्य..
सुमित्रा ने बताया कि वह दसवीं पास ही हैं। अपने चारों बच्चों को भी उच्च शिक्षा दिलवाई। मेरी एक बेटी बीटेक , एक जेबीटी, तीसरी इंटनेशनल फुटबाल खिलाड़ी है। बेटा रक्षा मंत्रालय में बतौर सीनियर ऑडिटर है। उनके पति जगदीश वन विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे। फिलहाल खेती बाड़ी का काम संभालते हैं। सुमित्रा देवी ने बताया उनके चारों बच्चों की शिक्षा , नौकरी व शादी की जिम्मेदारी पूरी करने के बाद फिलहाल उनका पूरा फोकस गांव की महिलाओं को हुनरमंद बनाकर रोजगार दिलाना है।