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Hisar News: सात फेरों के बंधन में बंधने के लिए सात मुहूर्त शेष
Tue, 30 Jun 2026 01:21 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
Updated Tue, 30 Jun 2026 01:21 AM IST
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हिसार। सात फेरों के बंधन में बंधने के लिए अब केवल सात दिन ही शेष बचे हैं। 14 जुलाई को गुरु तारा के अस्त होने के कारण देव-शयन की बेला शुरू हो जाएगी जिससे शादियों की गूंज और अन्य शुभ संस्कारों की चहल-पहल पर नवंबर तक विराम लग जाएगा। इस सीजन के अंतिम सात शुभ मुहूर्त 1, 3, 4, 6, 7, 8 और 9 जुलाई हैं।
पंडित देव शर्मा के अनुसार, 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ चातुर्मास आरंभ होगा और नवंबर में देवउठनी एकादशी के बाद ही फिर से विवाह का सिलसिला शुरू होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास का शुभारंभ होता है। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, जनेऊ, मुंडन और अन्य मांगलिक संस्कार नहीं किए जाते।
चार माह तक पूजा-पाठ, जप, तप, व्रत, दान, कथा-श्रवण और धार्मिक साधना को विशेष महत्व दिया जाता है। पंडित देव शर्मा ने बताया कि विवाह के लिए केवल शुभ तिथि ही नहीं, बल्कि ग्रह-नक्षत्रों की अनुकूल स्थिति भी आवश्यक होती है। 14 जुलाई से गुरु तारा अस्त होने के कारण विवाह मुहूर्त मान्य नहीं रहेंगे। इसके बाद चातुर्मास प्रारंभ होने से मांगलिक कार्यों पर धार्मिक परंपरा के अनुसार रोक लग जाएगी।
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श्रावण मास और चातुर्मास को आध्यात्मिक साधना का श्रेष्ठ समय माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु भगवान विष्णु, भगवान शिव और अन्य देवी-देवताओं की आराधना करते हैं। मंदिरों में विशेष धार्मिक आयोजन, भजन-कीर्तन, सत्संग और कथा-प्रवचन होते हैं। श्रद्धालु व्रत, दान-पुण्य और सेवा कार्यों के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करते हैं।
नवंबर में देवउठनी एकादशी से होगी शुभ कार्यों की शुरुआत :
चातुर्मास केवल शुभ कार्यों पर विराम का समय नहीं है बल्कि आत्मसंयम और आत्मचिंतन का भी अवसर है। नवंबर में देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के साथ विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों की फिर से शुरुआत होगी। इसके बाद विवाह की शहनाइयां और अन्य मांगलिक कार्य भी प्रारंभ हो जाते हैं।
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पंडित देव शर्मा के अनुसार, 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ चातुर्मास आरंभ होगा और नवंबर में देवउठनी एकादशी के बाद ही फिर से विवाह का सिलसिला शुरू होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास का शुभारंभ होता है। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, जनेऊ, मुंडन और अन्य मांगलिक संस्कार नहीं किए जाते।
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चार माह तक पूजा-पाठ, जप, तप, व्रत, दान, कथा-श्रवण और धार्मिक साधना को विशेष महत्व दिया जाता है। पंडित देव शर्मा ने बताया कि विवाह के लिए केवल शुभ तिथि ही नहीं, बल्कि ग्रह-नक्षत्रों की अनुकूल स्थिति भी आवश्यक होती है। 14 जुलाई से गुरु तारा अस्त होने के कारण विवाह मुहूर्त मान्य नहीं रहेंगे। इसके बाद चातुर्मास प्रारंभ होने से मांगलिक कार्यों पर धार्मिक परंपरा के अनुसार रोक लग जाएगी।
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श्रावण मास और चातुर्मास को आध्यात्मिक साधना का श्रेष्ठ समय माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु भगवान विष्णु, भगवान शिव और अन्य देवी-देवताओं की आराधना करते हैं। मंदिरों में विशेष धार्मिक आयोजन, भजन-कीर्तन, सत्संग और कथा-प्रवचन होते हैं। श्रद्धालु व्रत, दान-पुण्य और सेवा कार्यों के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करते हैं।
नवंबर में देवउठनी एकादशी से होगी शुभ कार्यों की शुरुआत :
चातुर्मास केवल शुभ कार्यों पर विराम का समय नहीं है बल्कि आत्मसंयम और आत्मचिंतन का भी अवसर है। नवंबर में देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के साथ विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों की फिर से शुरुआत होगी। इसके बाद विवाह की शहनाइयां और अन्य मांगलिक कार्य भी प्रारंभ हो जाते हैं।