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रिजुल शर्मा बोलीं- हर पांच किमी. पर जांचे गए पासपोर्ट, तीन घंटे सैनिकों ने ताने रखी बंदूक

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 06 Mar 2022 12:55 AM IST
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Rijul Sharma said- every five km. But the passports were checked, the soldiers held the gun for three hours
हिसार। यूक्रेन के शहर लुंगाश से बमबारी हो रही थी। सायरन बजते ही बंकर में चले जाते। तीन दिन बंकर के अंदर रहे। 27 फरवरी को हिम्मत दिखाकर हॉस्टल से बाहर आए। हम कुल 18 विद्यार्थी थे। वहां से दो वैन किराये पर ली। यहां से स्लोवाकिया बॉर्डर के लिए निकले। रास्ते मे बमबारी और रूस और यूूक्रेन के सैनिक एक-दूसरे पर गोलियां बरसा रहे थे। हमने अपने आंखों से तबाही का मंजर देखा। रास्ते में हर पांच किलोमीटर के बाद यूक्रेन सैनिक वैन को रुकवाकर सभी का पासपोर्ट जांचते। एक बार तो तीन घंटे तक सभी पर बंदूकें तानी रखी। डर से जान निकल रही थी। जब भी चेकपोस्ट आती सैनिक वैन को घेर लेते। दहशत में दो हजार किलोमीटर का सफर तीन दिन में तय हुआ। इसके बाद चालक ने बॉर्डर से 22 किलोमीटर दूर उतार दिया, इसके बाद पैदल बॉर्डर पर पहुंचे।
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स्लोवाकिया बॉर्डर तक रास्ते में काफी बर्फबारी हो रही थी। हमारे पास कपड़ों की अलग से कोई व्यवस्था नही थी। खाने और पीने का सामान भी खत्म हो गया था। काफी मुश्किलों को पार करने के बाद बॉर्डर पर पहुंचे। शरीर के अंदर इतनी हिम्मत नहीं बची की सही तरीके से खड़े भी हो सके। बॉर्डर पार करने के बाद दूतावास ने रहने और खाने की व्यवस्था की। भारतीय वायु सेना का विमान हमें वहां से गाजियाबाद लेकर आया।
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- यूक्रेन से लौटी सिवानी मंडी में रहने वाली डॉ. रिजुल शर्मा ने अमर उजाला कार्यालय पहुंचे सुनाया दर्द
1500 रुपये में मिली पानी की एक बोतल
यूक्रेन से लौटी सिवानी के वार्ड-6 में अपने नैनिहाल में रहने वाले रिजुल शर्मा ने बताया कि यूक्रेन से स्लोवाकिया तक का सफर खौफ में बीता। वैन से यूक्रेन से निकले तो तीन दिन तक कोई नहीं सोया। चालक ने भी बॉर्डर से 22 किलोमीटर पहले उतार दिया। इसके बाद पैदल चले। अपराजिता के तहत अमर उजाला कार्यालय में पहुंची रिजुल शर्मा ने बताया कि स्लोवाकिया महंगा शहर है। यहां बॉर्डर पर हजारों की संख्या में लोग अपने-अपने देश जाने के लिए एकत्रित हो रहे थे। यहां पर पानी की एक बोतल 1500 रुपये में मिली, जबकि दो चॉकलेट के एक हजार रुपये चुकाए।
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बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था करें सरकार
रिजुल के पिता अजय शर्मा और माता प्रियंका शर्मा ने बताया कि उनकी बेटी सकुशल घर पहुंच गई है। बेटी यूक्रेन में एमबीबीएम के चतुर्थ वर्ष के दूसरे सेेमेस्टर में पढ़ रही थी। युद्ध के कारण बेटी की पढ़ाई खराब हुई है। भारत सरकार को बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं चाहिए। उनका कहना है कि बच्चे इसलिए बाहर जातेे हैं क्योंकि यहां पर बच्चों के एडमिशन नहीं हो पाते। नीट में फाइट है। इसके अलावा कुछ बच्चे आरक्षण की नीति में रह जाते हैं। विदेश में 12वीं पास करने के बाद ही एडमिशन हो जाता है।
भारत सरकार का धन्यवाद किया
सिवानी के पार्षद नवीन ने बताया कि युद्ध के कारण बच्चों की पढ़ाई तो खराब हुई है। वहां पर भारतीय बच्चे फंसे हुए थे। भारत सरकार वहां पर फंसे हुए बच्चों को सुरक्षित लेकर आ रही है। भारतीय सेना के जवान वहां जाकर बच्चों को लेकर आ रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने सरकार से मांग की है कि बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था यहीं पर की जाए। अनिल चावला का कहना है कि भारत सरकार बच्चों के तर्जुबों को देखते हुए भारत में ही पढ़ाई की व्यवस्था करें, ताकि बच्चों का भविष्य खराब न हो।

जज्बे को सलाम : भागीरथ जांगड़ा का कहना है कि वे भारत सरकार का धन्यवाद करते हैं। रिजुल ने बताया वहां का भयानक मंजर को देखते हुए भारत सरकार की सहायता के जज्बे को सलाम है। इसके अलावा सरकार को बच्चों की पढ़ाई का जो नुकसान हुआ है उसे पूरा किया जाए।
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