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Hisar News: बचपन में घुलता जहर...कच्ची उम्र में बीड़ी-सिगरेट-छैनी व गुटखा का सेवन बढ़ा
Sat, 31 May 2025 12:34 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
Updated Sat, 31 May 2025 12:34 AM IST
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डॉ. प्रशांत कुमार, वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ, नागरिक अस्पताल, हिसार।
हिसार। अबोध उम्र, नासमझ दिल और नशे की गिरफ्त में डूबता बचपन। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अब 10 से 13 साल के बच्चे भी बीड़ी, सिगरेट, छैनी और गुटखे जैसे जानलेवा नशों का सेवन करने लगे हैं। पहले यह उम्र 13 से 15 वर्ष मानी जाती थी, लेकिन अब मासूमियत कहीं और पहले ही दम तोड़ने लगी है। नागरिक अस्पताल की मनोरोग ओपीडी में सामने आए आंकड़े चौंका देने वाले हैं।
चिकित्सकाें की मानें तो हर दिन ऐसे 15 से 20 नए मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें बच्चे किसी न किसी नशे की चपेट में पाए जा रहे हैं। हर साल 31 मई को विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य तंबाकू के सेवन से होने वाले स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणामों के बारे में लोगों को जागरूक करना है।
ये हैं तीन बिंदु
मानसिक विकार : जिज्ञासा से लत तक का सफर
इस श्रेणी में आने वाले बच्चे अत्यधिक जिज्ञासु प्रवृत्ति के होते हैं। ये हर चीज को जानने और अनुभव करने की चाह रखते हैं, चाहे वह दवा हो या नशीला पदार्थ। यही जिज्ञासा धीरे-धीरे प्रयोग से लत में बदल जाती है।
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सामाजिक विकार : तनाव से भागने की कोशिश
इन बच्चों के जीवन में कोई न कोई गहरी सामाजिक समस्या होती है, जैसे- पारिवारिक कलह, घरेलू हिंसा, बेरोजगारी का माहौल या माता-पिता का तलाक। ऐसी परिस्थितियां उन्हें हर समय तनाव में रखती हैं। तनाव से बचने और आत्मिक शांति की तलाश में वे नशे का सहारा लेने लगते हैं।
अनुवांशिक विकार : देखादेखी से विनाश की ओर
इस श्रेणी में वे बच्चे आते हैं जिनके अभिभावक स्वयं नशे के आदी होते हैं। जब बच्चे अपने बड़ों को बीड़ी, सिगरेट, गुटखा या अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करते देखते हैं, तो वे भी अनजाने में उसे आजमाते हैं। यह देखादेखी की आदत कब गहरी लत में बदल जाती है, इसका एहसास उन्हें भी नहीं होता।
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इन बातों का रखें ख्याल
- हर अभिभावक को अपने बच्चे के सामने आदर्श माता-पिता की तरह पेश आना चाहिए
- बच्चे से संवाद करना जरूरी है। तभी बच्चा अपने अंदर की बात अभिभावकों से शेयर करेगा
- बच्चे की संगत पर अवश्य नजर रखें। क्योंकि संगत का दैनिक दिनचर्या में अहम रोल होता है
- समय-समय पर बच्चे की आदतों का पड़ताल जरूर करें, ताकि पता रहें कि बच्चा क्या कर रहा है
- बीड़ी-सिगरेट व अन्य नशीले पदार्थ का सेवन यदि बच्चा करता है तो पहले अभिभावक स्वत: काउंसिलिंग करें। अगर उसके बावजूद असर नहीं दिखता है तो बिना देरी किए चिकित्सक को दिखाए।
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ओपीडी में रोजाना 15 से 20 केस ऐसे आ रहे हैं, जिसमें 10 से 13 साल की उम्र में ही बच्चा बीड़ी-सिगरेट व नशीले पदार्थों का सेवन करना शुरू कर देता है। इनमें लड़कों की तादाद 70 फीसदी से अधिक है। अभिभावक बच्चों की संगत पर नजर रखें। समस्या का हल न दिखे तो चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। - डॉ. प्रशांत कुमार, वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ, नागरिक अस्पताल, हिसार
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चिकित्सकाें की मानें तो हर दिन ऐसे 15 से 20 नए मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें बच्चे किसी न किसी नशे की चपेट में पाए जा रहे हैं। हर साल 31 मई को विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य तंबाकू के सेवन से होने वाले स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणामों के बारे में लोगों को जागरूक करना है।
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ये हैं तीन बिंदु
मानसिक विकार : जिज्ञासा से लत तक का सफर
इस श्रेणी में आने वाले बच्चे अत्यधिक जिज्ञासु प्रवृत्ति के होते हैं। ये हर चीज को जानने और अनुभव करने की चाह रखते हैं, चाहे वह दवा हो या नशीला पदार्थ। यही जिज्ञासा धीरे-धीरे प्रयोग से लत में बदल जाती है।
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सामाजिक विकार : तनाव से भागने की कोशिश
इन बच्चों के जीवन में कोई न कोई गहरी सामाजिक समस्या होती है, जैसे- पारिवारिक कलह, घरेलू हिंसा, बेरोजगारी का माहौल या माता-पिता का तलाक। ऐसी परिस्थितियां उन्हें हर समय तनाव में रखती हैं। तनाव से बचने और आत्मिक शांति की तलाश में वे नशे का सहारा लेने लगते हैं।
अनुवांशिक विकार : देखादेखी से विनाश की ओर
इस श्रेणी में वे बच्चे आते हैं जिनके अभिभावक स्वयं नशे के आदी होते हैं। जब बच्चे अपने बड़ों को बीड़ी, सिगरेट, गुटखा या अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करते देखते हैं, तो वे भी अनजाने में उसे आजमाते हैं। यह देखादेखी की आदत कब गहरी लत में बदल जाती है, इसका एहसास उन्हें भी नहीं होता।
इन बातों का रखें ख्याल
- हर अभिभावक को अपने बच्चे के सामने आदर्श माता-पिता की तरह पेश आना चाहिए
- बच्चे से संवाद करना जरूरी है। तभी बच्चा अपने अंदर की बात अभिभावकों से शेयर करेगा
- बच्चे की संगत पर अवश्य नजर रखें। क्योंकि संगत का दैनिक दिनचर्या में अहम रोल होता है
- समय-समय पर बच्चे की आदतों का पड़ताल जरूर करें, ताकि पता रहें कि बच्चा क्या कर रहा है
- बीड़ी-सिगरेट व अन्य नशीले पदार्थ का सेवन यदि बच्चा करता है तो पहले अभिभावक स्वत: काउंसिलिंग करें। अगर उसके बावजूद असर नहीं दिखता है तो बिना देरी किए चिकित्सक को दिखाए।
ओपीडी में रोजाना 15 से 20 केस ऐसे आ रहे हैं, जिसमें 10 से 13 साल की उम्र में ही बच्चा बीड़ी-सिगरेट व नशीले पदार्थों का सेवन करना शुरू कर देता है। इनमें लड़कों की तादाद 70 फीसदी से अधिक है। अभिभावक बच्चों की संगत पर नजर रखें। समस्या का हल न दिखे तो चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। - डॉ. प्रशांत कुमार, वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ, नागरिक अस्पताल, हिसार