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हिसार के वैज्ञानिकों ने विकसित की नई ‘मूंग’
हिसार/प्रवीन कुमार
Updated Sat, 14 Dec 2013 10:07 PM IST
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चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने मूंग की एक नई किस्म एमएच-421 विकसित की है।
उत्पादन और रोग प्रतिरोधकता की दृष्टि से यह एक उत्तम किस्म बताई जा रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में इसकी खेती की जा सकती है।
कुलपति डॉ. केएस खोखर ने बताया कि केवल 60 दिन में पककर तैयार होने वाली मूंग की यह एमएच-421 किस्म मूंगबीन येलो मोसेक वायरस रोग की प्रतिरोधक है। बसंत व ग्रीष्मकाल में यह 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार देती है, जबकि दूसरी सामान्य किस्मों में इससे आधी ही पैदावार मिलती है। इस किस्म में फलियां गिरती भी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि इस किस्म के दाने चमकीले व मध्यम आकार के होने के कारण मोटे दानों वाली किस्म की अपेक्षा किसानों को इसके ज्यादा भाव मिल सकते हैं। लगभग 10-15 दिन पहले पकने की विशेषता के कारण यह धान-गेहूं फसल चक्र के लिए बहुत उपयुक्त किस्म है। इस किस्म की सरसों, जौ, आलू व गन्ना के पश्चात भी बिजाई की जा सकती है।
इन राज्यों में फायदेमंद रहेगी
डॉ. खोखर ने बताया कि सेंट्रल सब कमेटी ऑन क्रॉप स्टैंडर्ड, नोटिफिकेशन एंड रिलीज ऑफ वैराइटीज ऑफ एग्रीकल्चरल क्रॉप्स ने इस किस्म की विशेषताओं के दृष्टिगत इसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, उत्तरी राजस्थान और उत्तराखंड के समतल एरिया में बसंत व ग्रीष्म ऋतु में बिजाई के लिए अनुमोदित किया है।
इन्होंने किया विकसित
विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. एसएस सिवाच ने बताया कि देश में दलहनों की कम उत्पादकता और अत्यधिक कीमतों को देखते हुए विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक दलहनों की उन्नत व विभिन्न जलवायु के अनुकूल किस्में विकसित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने बताया मूंग की यह किस्म अनुवांशिकी एवं पौध प्रजनन विभाग के वैज्ञानिकों डॉ. रामकुमार यादव, राजेश यादव व आरएस वाल्दिया द्वारा विकसित की गई है। इसमें डॉ. नरेश कुमार, राकेश कुमार, जेएस यादव, एमएस सांगवान और रोशन लाल का भी महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने बताया इससे पूर्व इस विभाग के वैज्ञानिक मूंग की ही ‘सत्या’ किस्म भी विकसित कर चुके हैं।
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उत्पादन और रोग प्रतिरोधकता की दृष्टि से यह एक उत्तम किस्म बताई जा रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में इसकी खेती की जा सकती है।
कुलपति डॉ. केएस खोखर ने बताया कि केवल 60 दिन में पककर तैयार होने वाली मूंग की यह एमएच-421 किस्म मूंगबीन येलो मोसेक वायरस रोग की प्रतिरोधक है। बसंत व ग्रीष्मकाल में यह 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार देती है, जबकि दूसरी सामान्य किस्मों में इससे आधी ही पैदावार मिलती है। इस किस्म में फलियां गिरती भी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि इस किस्म के दाने चमकीले व मध्यम आकार के होने के कारण मोटे दानों वाली किस्म की अपेक्षा किसानों को इसके ज्यादा भाव मिल सकते हैं। लगभग 10-15 दिन पहले पकने की विशेषता के कारण यह धान-गेहूं फसल चक्र के लिए बहुत उपयुक्त किस्म है। इस किस्म की सरसों, जौ, आलू व गन्ना के पश्चात भी बिजाई की जा सकती है।
इन राज्यों में फायदेमंद रहेगी
डॉ. खोखर ने बताया कि सेंट्रल सब कमेटी ऑन क्रॉप स्टैंडर्ड, नोटिफिकेशन एंड रिलीज ऑफ वैराइटीज ऑफ एग्रीकल्चरल क्रॉप्स ने इस किस्म की विशेषताओं के दृष्टिगत इसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, उत्तरी राजस्थान और उत्तराखंड के समतल एरिया में बसंत व ग्रीष्म ऋतु में बिजाई के लिए अनुमोदित किया है।
इन्होंने किया विकसित
विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. एसएस सिवाच ने बताया कि देश में दलहनों की कम उत्पादकता और अत्यधिक कीमतों को देखते हुए विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक दलहनों की उन्नत व विभिन्न जलवायु के अनुकूल किस्में विकसित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने बताया मूंग की यह किस्म अनुवांशिकी एवं पौध प्रजनन विभाग के वैज्ञानिकों डॉ. रामकुमार यादव, राजेश यादव व आरएस वाल्दिया द्वारा विकसित की गई है। इसमें डॉ. नरेश कुमार, राकेश कुमार, जेएस यादव, एमएस सांगवान और रोशन लाल का भी महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने बताया इससे पूर्व इस विभाग के वैज्ञानिक मूंग की ही ‘सत्या’ किस्म भी विकसित कर चुके हैं।