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27 को भंग हो सकती है लुवास की टीचर एसोसिएसन
ब्यूरो / अमर उजाला, हिसार
Updated Sat, 24 Sep 2016 12:00 AM IST
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लुवास
- फोटो : demo
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लुवास को जमीन तो मिल गई है, लेकिन लुवास की टीचर एसोसिएशन (लुवास्ता) पर एक नया संकट आ गया है। 27 सितंबर को जिले के फर्म एंड सोसायटी द्वारा कमेटी बनाकर लुवास्ता को भंग किया जा सकता है। जिसके बाद लुवास्ता की अब तक हुई सभी मीटिंग और फैसले अमान्य हो जाएंगे। हालांकि पदों का क्या होगा इस पर संशय बरकरार है।
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लुवास्ता में कई दिनों तक चली रार के बाद लुवास्ता को अवैधानिक घोषित करने की घोषणा 27 सितंबर को होने वाली मीटिंग में की जा सकती है। लुवास्ता 1860 के एक्ट के तहत रजिस्टर्ड होने के कारण कई दिनों से लुवास्ता प्रधान डॉ. रावत और सचिव डॉ. मलिक के बीच तनातनी चल रही थी। मामला जिले के फर्म एंड सोसायटी रजिस्ट्रार के पास पहुंच गया था, जिसके बाद 22 सितंबर को दोनों रजिस्ट्रार कार्यालय में तलब किया गया था। इसमें 27 सितंबर को कमेटी बना निर्णय लिए जाने की बात कही गई थी। कमेटी में 2 मेंबर प्रधान डॉ. रावत और 2 मेंबर सचिव डॉ. मलिक की ओर से भी होंगे।
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2012 में बने संशोधित कानून के तहत होना चाहिए रजिस्टर्ड
लुवास की टीचर एसोसिएशन लुवास्ता 1860 के कानून के तहत रजिस्टर्ड है, जबकि किसी भी फर्म या सोसायटी को 2012 में बने संशोधित कानून के तहत रजिस्टर्ड होना चाहिए। इसलिए कमेटी का गठन करके इसे अवैधानिक करार दिया जा सकता है। इसी को आधार बनाकर डॉ. जगवीर रावत दोबारा लुवास्ता के प्रधान बने थे।
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वर्ष 2012 में ही बनी थी लुवास्ता
लुवास्ता का गठन मार्च 2012 में हुआ था। इसका रजिस्ट्रेशन 1960 के एक्ट के तहत हुआ। इसके रजिस्ट्रेशन के महज कुछ दिन बाद ही नया रजिस्ट्रेशन एक्ट 2012 बन गया। लुवास्ता के रजिस्ट्रेशन के समय इसका नोटिफिकेशन भी जारी हो चुका था। इसके बाद लुवास्ता को 2012 के एक्ट के तहत रजिस्टर्ड नहीं करवाया गया, जिसके कारण लुवास्ता को अवैधानिक बताया जा रहा है।
प्रधान सहित लुवास्ता के पदों का क्या
लुवास्ता में पड़ी फूट के बाद डॉ. रावत ने लुवास्ता से इस्तीफा दे दिया था। यह इस्तीफा निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के तहत नहीं लिया गया था। और न ही कोई नोटिफिकेशन बनाया गया था। जमीन मिलने के बाद डॉ. रावत ने वैधानिक प्रक्रिया नहीं अपनाने का हवाला दे फिर प्रधान होने का दावा ठोक दिया था। वे इस कूटनीति मेें कामयाब रहे और फर्म एंड सोसायटी रजिस्ट्रार ने उन्हें एक बार फिर प्रधान घोषित कर दिया था। अब निर्धारित प्रक्रिया अपनाकर ही प्रधान को पद से हटाया जा सकता है।