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महिलाओं को सरपंची देने को तैयार नहीं चौधरी
अमर उजाला हिसार/ब्यूरो
Updated Mon, 25 Jan 2016 01:38 AM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेटी बचाव बेटी पढ़ाओ का अभियान पंचायती चुनाव में फेल नजर आया। बेटियों को आगे लाने के लिए देश भर में मोदी सरकार द्वारा ढिंढोरा पीटा गया मगर हरियाणा के हिसार में यह जादू नहीं चल सका। हिसार के चौधरी अब भी महिलाओं को चौधर देने को तैयार नहीं है।
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इस अभियान से हां जन्मदर लिंगानुपात की खाई कम जरूर हुई है। यहां एक हजार लड़कों के पीछे 923 बेटियां पैदा हुई मगर चौधर में आगे लाने की बजाए महिलाओं को दबाया गया है। पिछली बार जहां जिले में 127 महिला सरपंच चुनी गई थी अबकी बार पिछला आंकड़ा भी घट गया।
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इस बार जिले भर में 125 महिलाओं के ही सिर ताज सज पाए हैं। यानी जिले की पंचायतों में अब 40.5 प्रतिशत भागीदारी महिलाओं की है। महिला आरक्षित सीट की बात करें तो 33 प्रतिशत हिस्सेदारी महिलाओं की जरूरी है। मगर हिसार जिले में महिलाओं की भागेदारी आरक्षण से साढे पांच प्रतिशत अधिक रही।
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102 सींटें तो थी रिजर्व, 23 महिलाओं को लाया गया मर्जी से
जिले में 102 महिलाओं के लिए तो रिजर्व सीट थी। यानी 102 महिलाओं को सरपंच बनाना चौधरियों की मजबूरी थी। इसके बावजूद चौधरियों ने 23 महिलाओं को ही आगे आने दिया। जहां तक सवाल है इन महिलाओं को आगे लाने का वो भी तब हो पाया जब पढ़े लिखे की शर्त चौधरियों के सामने आ गई।
म्हारे सरपंच अधिकतर दसवीं पास
म्हारे जिले के सरपंच चाहे महिला हो या पुरूष सबसे अधिक दसवीं पास हैं। जिले में 308 पंचायतों में बने सरपंचों में से 188 सरपंच ऐसे हैं जो दसवीं पास है। इसके अलावा फिर 8 वीं पास सरपंच 54 हैं। 12 वीं कक्षा पास सरपंच जिले भर के 35 हैं और ग्रेजुएट सरपंच तो 32 ही हैं। यानी आंकड़ों का आंकलन करें तो सरपंच पद के लिए पढ़े लिखे लोग तो आ रहे हैं मगर उनकी शैक्षणिक योग्यता ज्यादा नहीं है। अधिकतर सरपंच दसवीं पास हैं।
अनुसूचित जाति के बने 72 सरपंच
अनुसूचित जाति के जिले भर में महिला और पुरुष सरपंच कुल 72 बने हैं। हालांकि सामान्य जातियों के सरपंच अनुसूचित जातियों से दो गुणा से अधिक हैं। सामान्य जातियों के इस बार जिले भर में 185 सरपंच बने हैं। इसके अलावा ओबीसी के 51 सरपंच जिले भर में बने हैं।