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Hisar News: जैविक खेती-पराली प्रबंधन को अपनाकर आय व पैदावार को बढ़ाया
Wed, 19 Mar 2025 01:21 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
Updated Wed, 19 Mar 2025 01:21 AM IST
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दो दिवसीय कृषि मेले में स्टॉल पर जानकारी लेते किसान।
हिसार। कृषि में नवाचार को अपनाकर न केवल पैदावार और आय को बढ़ाया बल्कि औरों को रोजगार देकर स्वावलंबी बना रहे किसान सुमित्रा और विनोद अन्य किसानों के लिए मिसाल बने हुई हैं। एचएयू में आयोजित कृषि मेले में विनोद को पराली प्रबंधन और डीएसआर तकनीक अपनाने व सुमित्रा को प्राकृतिक खेती के लिए प्रगतिशील किसान सम्मान से नवाजा गया।
जींद निवासी विनोद ने बताया कि उनके गांव पिल्लूखेड़ा में चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के कृषि विज्ञान केंद्र पांडू पिंडारा से विशेषज्ञ डॉ. रामकरण (कोऑर्डिनेटर), धीरज, डॉ. रवि, डॉ. प्रीति मलिक और डॉ. पवन किसानों को पराली प्रबंधन और फसलों की देखभाल के बारे में जागरूक करने आते थे। उनसे प्रेरित होकर मैंने भी पराली प्रबंधन करना शुरू कर दिया। शुरुआत में हैप्पी सीडर तकनीक से पराली प्रबंधन करना शुरू किया। इस तकनीक से पराली को खेत में मिलाने से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है और फसलों की पैदावार में वृद्धि होती है।
जैविक खेती के साथ ही मसालों को पीसकर बेच रही सुमित्रा
जींद जिले के गांव आहिरका की सुमित्रा ने बताया कि उसने पति के साथ मिलकर जैविक करनी शुरू की, लेकिन शुरुआत में फसल की बिक्री में दिक्कत आने लगी। इसके बाद अमरूद व नीबू का बाग लगाया है। इससे ठीक-ठाक आमदनी होने लगी। कोरना काल में हल्दी की खेती शुरू की। जो हल्दी बच जाती उसे पीसकर बेचने लगे। मांग बढ़ने लगी तो दूसरे मसाले, सब्जियां व फल बेचने लगे। इनसे सालाना 8 लाख रुपये तक आय हो रही है। हल्दी के अलावा आलू, गोभी, मटर, घीया, तोरी, भिंडी, गाजर और मूली की खेती भी शुरू कर दी। आसपास के लोग खेत से ताजा सब्जियां खरीदने लगे हैं, जिससे आय भी बढ़ने लगी है। दालों और सरसों तेल की पैकिंग करके भी बेचना शुरू किया है। चार एकड़ जमीन से लगभग 8 लाख रुपये की सालाना आय हो जाती है। खेत, घर और पैकिंग के काम के लिए 3-4 महिलाओं और युवकों को रोजगार भी दिया हुआ है। अब हल्दी, करौंदा, अदरक जैसी औषधीय और मसाले वाली फसलें भी लगाई हैं। इनसे अचार और अन्य खाद्य उत्पाद बनाने की योजना है।
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किसानों ने ली फसलों व नई तकनीक की जानकारी
हिसार। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में चल रहे कृषि मेले में मंगलवार को किसानों ने फसलों व सब्जियों के बीजों की खरीदारी की और कृषि की नई तकनीकों के बारे में जानकारी ली। सरसों व बाजार की उन्नत किस्मों की जानकारी लेकर इनके बीजों की खरीद की गई। बाजरे की एचएचबी 67 किस्म के प्रति किसानों का रुझान दिखा। इसे कम पानी वाले क्षेत्र में भी लगाया जा सकता है। हाईब्रीड बीज बेच रहे सुनील कुमार ने बताया कि इनमें सामान्य बीजों की तुलना में रोग बहुत कम लगते हैं और पैदावर भी ज्यादा देते हैं। टमाटर के हाईब्रीड बीज वाला पौधा साइज में छोटा होता है और 35-40 दिन में ही फूल आने लगते हैं। एक एकड़ में करीब 150 ग्राम बीज की खपत होती है। जबकि एक एकड़ से किसान डेढ़ लाख रुपये की आमदनी कर सकता है।
पशुओं के लिए साल भर चलने वाली घास
इन्फिनिटी घास पशुओं के लिए साल भर चलने वाला चारा है। इस किस्म को किसान कम पानी वाले क्षेत्र में लगाकर साल भर पशुओं के लिए प्रयोग में ला सकते हैं। एक एकड़ में 4-5 किलो बीज लगता है और इसकी कटाई के बीच 30 से 45 दिन का अंतर रखना होता है। कंपनी के डीआरएम अनूप कुमार ने बताया कि ये घास लगाने के बाद किसान 8 से 10 बार कटाई कर सकते हैं। एक किलो बीज की कीमत 600 रुपये है।
बाजरे की उन्नत किस्में
एचएचबी 67 (संशोधित 2) : यह किस्म एचएयू की ओर से तैयार की गई है। इसमें बायोटेक्नोलॉजी विधि द्वारा जोगिया प्रतिरोधी जीन डाले गए हैं। इससे जोगिया बीमारी नहीं लगती और सिट्टों पर छोटे-छोटे बाल भी होते हैं। इसके दानों व सूखे चारे की औसत पैदावार 31 मन व 90 मन प्रति एकड़ है। यह किस्म 65-70 दिन में पककर तैयार हो जाती है। वैज्ञानिक विधि द्वारा खेती करने पर यह 37.5 मन प्रति एकड़ तक पैदावार दे सकती है।
एचएचबी 197 : इस किस्म में बाजरे के सिट्टों पर लंबे बाल होते हैं जोकि फसल को पक्षियों से होने वाले नुकसान से बचाते हैं। यह किस्म अच्छे फुटाव वाली होने के साथ-साथ जोगिया व कांगियारी रोगरोधी भी है। इसके दानों व सूखे चारे की औसत उपज 35 से 115 मन प्रति एकड़ है। यह किस्म 68-72 दिन में पककर तैयार हो जाती है।
एचएचबी 299 व एचएचबी 311 : ये दोनों किस्मे अधिक लौह युक्त (73-83 पीपीएम) हैं। इनके सिट्टे मध्यम लंबाई के होते हैं। एचएचबी 299 के दानों व सूखे चारे की औसत उपज 39.5 व 100-105 मन प्रति एकड़ है। इसकी फसल 80-82 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। एचएचबी 311 के दानों व सूखे चारे की औसत उपज 37.5 मन व 88-100 मन प्रति एकड़ है। 75-80 दिनों में फसल पककर तैयार हो जाती है।
सरसों की उन्नत किस्में
आरएच 725 : इस किस्म की सिफारिश वर्ष 2018 में हरियाणा, पंजाब, दिल्ली एवं राजस्थान के कुछ हिस्सों के बारानी क्षेत्रों में बिजाई के लिए की गई है। इस किस्म में फलियां लंबी व मोटी होती हैं और दाने का आकार भी बड़ा होता है। इस किस्म की फसल 136-143 दिन में पककर तैयार हो जाती है और 10-11 क्विंटल प्रति एकड़ औसत पैदावार होती है। इस किस्म में तेल की मात्रा 40 प्रतिशत है और यह उच्च तापमान के प्रति अवरोधी है।
आरएच 1424 : इस किस्म की सिफारिश वर्ष 2022 में हरियाणा, पंजाब, दिल्ली एवं राजस्थान के कुछ हिस्सों के बारानी क्षेत्रों में समय पर बिजाई के लिए की गई। यह 137-140 दिनों में पककर 10.4 से 10.8 क्विटल प्रति एकड़ औसत पैदावार देती है। इस किस्म की फलियां लंबी व दानों का आकार मोटा होता है। इसमें लगभग 40.5 प्रतिशत तेल होता है।
आरएच 1975 : इस किस्म की सिफारिश वर्ष 2024 में हरियाणा, पंजाब, दिल्ली एवं राजस्थान में बिजाई के लिए की गई थी। यह 142-145 दिनों में पककर 108 से 11.6 क्विंटल प्रति एकड़ औसत पैदावार देती है। इस किस्म में फलियां लंबी व दानों का आकार मोटा होता है। इसमें लगभग 39.5 प्रतिशत तेल होता है।
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जींद निवासी विनोद ने बताया कि उनके गांव पिल्लूखेड़ा में चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के कृषि विज्ञान केंद्र पांडू पिंडारा से विशेषज्ञ डॉ. रामकरण (कोऑर्डिनेटर), धीरज, डॉ. रवि, डॉ. प्रीति मलिक और डॉ. पवन किसानों को पराली प्रबंधन और फसलों की देखभाल के बारे में जागरूक करने आते थे। उनसे प्रेरित होकर मैंने भी पराली प्रबंधन करना शुरू कर दिया। शुरुआत में हैप्पी सीडर तकनीक से पराली प्रबंधन करना शुरू किया। इस तकनीक से पराली को खेत में मिलाने से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है और फसलों की पैदावार में वृद्धि होती है।
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जैविक खेती के साथ ही मसालों को पीसकर बेच रही सुमित्रा
जींद जिले के गांव आहिरका की सुमित्रा ने बताया कि उसने पति के साथ मिलकर जैविक करनी शुरू की, लेकिन शुरुआत में फसल की बिक्री में दिक्कत आने लगी। इसके बाद अमरूद व नीबू का बाग लगाया है। इससे ठीक-ठाक आमदनी होने लगी। कोरना काल में हल्दी की खेती शुरू की। जो हल्दी बच जाती उसे पीसकर बेचने लगे। मांग बढ़ने लगी तो दूसरे मसाले, सब्जियां व फल बेचने लगे। इनसे सालाना 8 लाख रुपये तक आय हो रही है। हल्दी के अलावा आलू, गोभी, मटर, घीया, तोरी, भिंडी, गाजर और मूली की खेती भी शुरू कर दी। आसपास के लोग खेत से ताजा सब्जियां खरीदने लगे हैं, जिससे आय भी बढ़ने लगी है। दालों और सरसों तेल की पैकिंग करके भी बेचना शुरू किया है। चार एकड़ जमीन से लगभग 8 लाख रुपये की सालाना आय हो जाती है। खेत, घर और पैकिंग के काम के लिए 3-4 महिलाओं और युवकों को रोजगार भी दिया हुआ है। अब हल्दी, करौंदा, अदरक जैसी औषधीय और मसाले वाली फसलें भी लगाई हैं। इनसे अचार और अन्य खाद्य उत्पाद बनाने की योजना है।
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हिसार। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में चल रहे कृषि मेले में मंगलवार को किसानों ने फसलों व सब्जियों के बीजों की खरीदारी की और कृषि की नई तकनीकों के बारे में जानकारी ली। सरसों व बाजार की उन्नत किस्मों की जानकारी लेकर इनके बीजों की खरीद की गई। बाजरे की एचएचबी 67 किस्म के प्रति किसानों का रुझान दिखा। इसे कम पानी वाले क्षेत्र में भी लगाया जा सकता है। हाईब्रीड बीज बेच रहे सुनील कुमार ने बताया कि इनमें सामान्य बीजों की तुलना में रोग बहुत कम लगते हैं और पैदावर भी ज्यादा देते हैं। टमाटर के हाईब्रीड बीज वाला पौधा साइज में छोटा होता है और 35-40 दिन में ही फूल आने लगते हैं। एक एकड़ में करीब 150 ग्राम बीज की खपत होती है। जबकि एक एकड़ से किसान डेढ़ लाख रुपये की आमदनी कर सकता है।
पशुओं के लिए साल भर चलने वाली घास
इन्फिनिटी घास पशुओं के लिए साल भर चलने वाला चारा है। इस किस्म को किसान कम पानी वाले क्षेत्र में लगाकर साल भर पशुओं के लिए प्रयोग में ला सकते हैं। एक एकड़ में 4-5 किलो बीज लगता है और इसकी कटाई के बीच 30 से 45 दिन का अंतर रखना होता है। कंपनी के डीआरएम अनूप कुमार ने बताया कि ये घास लगाने के बाद किसान 8 से 10 बार कटाई कर सकते हैं। एक किलो बीज की कीमत 600 रुपये है।
बाजरे की उन्नत किस्में
एचएचबी 67 (संशोधित 2) : यह किस्म एचएयू की ओर से तैयार की गई है। इसमें बायोटेक्नोलॉजी विधि द्वारा जोगिया प्रतिरोधी जीन डाले गए हैं। इससे जोगिया बीमारी नहीं लगती और सिट्टों पर छोटे-छोटे बाल भी होते हैं। इसके दानों व सूखे चारे की औसत पैदावार 31 मन व 90 मन प्रति एकड़ है। यह किस्म 65-70 दिन में पककर तैयार हो जाती है। वैज्ञानिक विधि द्वारा खेती करने पर यह 37.5 मन प्रति एकड़ तक पैदावार दे सकती है।
एचएचबी 197 : इस किस्म में बाजरे के सिट्टों पर लंबे बाल होते हैं जोकि फसल को पक्षियों से होने वाले नुकसान से बचाते हैं। यह किस्म अच्छे फुटाव वाली होने के साथ-साथ जोगिया व कांगियारी रोगरोधी भी है। इसके दानों व सूखे चारे की औसत उपज 35 से 115 मन प्रति एकड़ है। यह किस्म 68-72 दिन में पककर तैयार हो जाती है।
एचएचबी 299 व एचएचबी 311 : ये दोनों किस्मे अधिक लौह युक्त (73-83 पीपीएम) हैं। इनके सिट्टे मध्यम लंबाई के होते हैं। एचएचबी 299 के दानों व सूखे चारे की औसत उपज 39.5 व 100-105 मन प्रति एकड़ है। इसकी फसल 80-82 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। एचएचबी 311 के दानों व सूखे चारे की औसत उपज 37.5 मन व 88-100 मन प्रति एकड़ है। 75-80 दिनों में फसल पककर तैयार हो जाती है।
सरसों की उन्नत किस्में
आरएच 725 : इस किस्म की सिफारिश वर्ष 2018 में हरियाणा, पंजाब, दिल्ली एवं राजस्थान के कुछ हिस्सों के बारानी क्षेत्रों में बिजाई के लिए की गई है। इस किस्म में फलियां लंबी व मोटी होती हैं और दाने का आकार भी बड़ा होता है। इस किस्म की फसल 136-143 दिन में पककर तैयार हो जाती है और 10-11 क्विंटल प्रति एकड़ औसत पैदावार होती है। इस किस्म में तेल की मात्रा 40 प्रतिशत है और यह उच्च तापमान के प्रति अवरोधी है।
आरएच 1424 : इस किस्म की सिफारिश वर्ष 2022 में हरियाणा, पंजाब, दिल्ली एवं राजस्थान के कुछ हिस्सों के बारानी क्षेत्रों में समय पर बिजाई के लिए की गई। यह 137-140 दिनों में पककर 10.4 से 10.8 क्विटल प्रति एकड़ औसत पैदावार देती है। इस किस्म की फलियां लंबी व दानों का आकार मोटा होता है। इसमें लगभग 40.5 प्रतिशत तेल होता है।
आरएच 1975 : इस किस्म की सिफारिश वर्ष 2024 में हरियाणा, पंजाब, दिल्ली एवं राजस्थान में बिजाई के लिए की गई थी। यह 142-145 दिनों में पककर 108 से 11.6 क्विंटल प्रति एकड़ औसत पैदावार देती है। इस किस्म में फलियां लंबी व दानों का आकार मोटा होता है। इसमें लगभग 39.5 प्रतिशत तेल होता है।