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Hisar News: क्रॉस एग्जामिनेशन के अभाव में गवाही अपठनीय, होटल संचालक बरी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 20 Sep 2026 01:22 AM IST
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Hotel operator acquitted for lack of cross-examination, testimony unreadable
हिसार। नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में सह-आरोपी को होटल का कमरा उपलब्ध कराने के आरोपी होटल संचालक रविंद्र को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-सह-विशेष न्यायाधीश, फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट, हिसार सुनील जिंदल की अदालत ने शनिवार को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
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अदालत ने माना कि अभियोजन के महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही आरोपी के खिलाफ पर्याप्त नहीं है। पीड़िता ने अपने बयान में आरोपी के नाम का उल्लेख नहीं किया जबकि होटल का भागीदार मुख्य परीक्षा के बाद क्रॉस एग्जामिनेशन के लिए अदालत में पेश नहीं हुआ। अभियोजन ने उसे छोड़ दिया था।
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अदालत ने कहा कि क्रॉस एग्जामिनेशन के अभाव में उसकी गवाही आरोपी के खिलाफ साक्ष्य के रूप में नहीं पढ़ी जा सकती। पीड़िता के पिता ने भी आरोपी के खिलाफ शिकायत नहीं होने की बात कही।
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बचाव पक्ष के अधिवक्ता शीतल कुमार शीला ने बताया कि नारनौंद थाना पुलिस ने 12 दिसंबर 2021 को पीड़िता के पिता की शिकायत पर गुमशुदगी की प्राथमिकी दर्ज की थी। शिकायत के अनुसार, 11-12 दिसंबर की रात उनकी 14 वर्षीय बेटी को सचिन बहला-फुसलाकर ले गया था। साइबर सेल की मदद से पुलिस ने उसे 13 दिसंबर 2021 को पलवल के गांव मित्रोल स्थित एक होटल के कमरे से बरामद किया। धारा 164 सीआरपीसी के बयान के बाद मामले में धारा 376(3) आईपीसी और पोक्सो अधिनियम की धारा 4 जोड़ी गई।

बाद में डीएसपी स्तर की तस्दीक के आधार पर पलवल के किशोरपुर निवासी होटल संचालक रविंद्र के खिलाफ पोक्सो अधिनियम की धारा 17 (दुष्प्रेरण) जोड़ी गई और उसे 14 मार्च 2022 को गिरफ्तार किया गया। मुख्य आरोपी सचिन की मुकदमे के दौरान मौत हो गई थी। इसके बाद 23 अक्तूबर 2025 को उसके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई।

अदालत ने कहा कि रविंद्र के खिलाफ कोई ठोस, विश्वसनीय और प्रमाणिक साक्ष्य नहीं है। पुलिस ने होटल में उसकी साझेदारी साबित करने वाला कोई दस्तावेज भी पेश नहीं किया। आरोपी से बरामद फोटोप्रति से यह साबित नहीं होता कि घटना के दिन वह होटल में कार्यरत था। जांच अधिकारी ने जिरह में भी स्वीकार किया कि उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि घटना के समय आरोपी होटल में मौजूद था या नहीं।


इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि रविंद्र ने सह-आरोपी को कमरा उपलब्ध कराकर अपराध में सहायता की। अदालत ने धारा 357-ए सीआरपीसी के तहत पीड़िता के मुआवजे के दावे को भी अस्वीकार कर दिया।
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