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नकली चोट, असली नोट प्रकरण : 94 तारीख, 14 गवाही और 12 साल लंबी लड़ाई के बाद भी अधूरा मिला न्याय
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हिसार। नकली चोट असली नोट मामले की शनिवार को अदालत में सुनवाई हुई। अदालत ने आरोपी हिसार के हैबतपुर गांव निवासी बलविंदर व न्यू मॉडल टाउन निवासी कुलदीप को दोषी करार दिया है, जबकि मेट्रो अस्पताल के संचालक डॉ. संजय वर्मा को बरी कर दिया। मामले में शिकायतकर्ता एडवोकेट हरदीप ने कहा कि 12 साल न्याय पाने के लिए लड़ाई लड़ी और न्याय भी मिला लेकिन यह अधूरा है। हरदीप ने आरोप लगाया कि जांच अधिकारी सूरज कुमार ने चिकित्सक से मिलीभगत करके फाइल पर जांच तथ्य पेश नहीं किए। रंगे हाथों पकड़वाने वाले तत्कालीन डीएसपी इंद्र सिंह कुंडू को उक्त मामले में गवाह नहीं बनाया। अब इस मामले में हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी। एडवोकेट हरदीप ने बताया कि 12 साल में 19 दिन तक ये कानूनी लड़ाई लड़ी गई। इस 12 साल के समय के दौरान अदालत में 94 तारीख लगी और 14 लोगों ने गवाही दी।
डॉ. भूप सिंह सहित दो को हो चुकी है सजा
हिसार के बहुचर्चित नकली चोट असली नोट प्रकरण में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अल्का मलिक की अदालत ने गत 31 मार्च, 2016 को सामान्य अस्पताल के तत्कालीन चिकित्सा अधिकारी डॉ. भूप सिंह व राजस्थान के दुमकी गांव निवासी जयवीर को दस-दस साल की कैद की सजा सुनाई थी। इस मामले में डॉ. भूप सिंह को प्रदेश सरकार ने पहले ही बर्खास्त कर दिया था। यह मामला भी एडवोकेट हरदीप की शिकायत पर दर्ज किया गया था।
यह मामला बना नकली चोट के खुलासे की वजह
एडवोकेट हरदीप का भाई पवन कुमार सिवानी क्षेत्र के गुरेरा गांव की एक बीज फैक्ट्री में सुरक्षाकर्मी के तौर पर तैनात था। 15 दिसंबर, 2009 को मनोज, समुंदर, जयवीर और अन्य वहां पर आए और किसी रंजिश को लेकर उसके साथ हाथापाई की और धमकी देकर चले गए। इस मामले में उन्होंने सिवानी पुलिस को शिकायत कर दी। इसके बाद उक्त लोगों ने सामान्य अस्पताल में तैनात चिकित्सा अधिकारी डॉ. भूप सिंह से मिलीभगत करके जयबीर को नकली चोट मारी और हत्या प्रयास का मामला दर्ज करवाने के लिए झूठी एफआईआर दर्ज करवाई। जब पुलिस ने हत्या प्रयास का मामला दर्ज किया तो उन्होंने इस पूरे मामले की जांच की और जांच में इनका फर्जीवाड़ा सामने आया।
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307 की प्राथमिकी के लिए ऐसे मारते थे नकली चोट
दरअसल कनपटी के दोनों तरफ दो-दो पैरिटल बोन होती है। यदि किसी झगड़े में इस पैरिटल बोन में थोड़ा भी फ्रेक्चर आ जाए तो कानूनी भाषा में वह मामला हत्या के प्रयास का बनता है, क्योंकि यह हड्डी अगर टूट जाए तो आदमी मर सकता है। यह लोग किसी से रंजिश निकालने के लिए पहले उसके पास झगड़ा करके आते। उसके बाद नकली चोट मरवाकर पैरिटल बोन में फ्रेक्चर करवाते। इसके बाद उसकी फर्जी एमएलआर बनवाते और पुलिस को मजबूरन 307 का हत्या प्रयास का मामला दर्ज करना पड़ता।
ऐसे हुआ था मामले का खुलासा
जब हरदीप को उसके भाई ने बताया कि उन्होंने हमलावरों के साथ मारपीट नहीं की और उसके खिलाफ हत्या प्रयास का मामला दर्ज हो गया। ऐसे में हरदीप ने हिसार व आसपास के थाने में दर्ज 307 के मामलों की एमएलआर का अध्ययन किया तो सैकड़ों ऐसे मामले मिले जिनमें सिर्फ पैरिटल बोन में फ्रेक्चर था। इन अधिकांश एमएलआर को डॉ. भूप सिंह व उनके सहयोगी चिकित्सकों ने तैयार किया था। ऐसे में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से इस तकनीकी मामले का खुलासा हो गया।
कोर्ट की टिप्पणी : अभियोजन डॉ. संजय वर्मा के खिलाफ केस साबित करने में विफल रहा
नकली चोट-असली नोट प्रकरण के आरोपी मेट्रो अस्पताल के संचालक चिकित्सक डॉ. संजय वर्मा को बरी करते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष डॉ. वर्मा के खिलाफ केस साबित करने में विफल रहा है। हालांकि अभियोजन पक्ष ने एक्स्ट्रा ज्यूडिशियन कनफेशन, रोहतक मेडिकल कॉलेज के विशेष बोर्ड की रिपोर्ट के सहारे डॉ. वर्मा को दोषी साबित करने का प्रयास किया लेकिन अदालत ने अभियोजन पक्ष के सभी प्रयासों को खारिज कर दिया।
एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कनफेशन के तौर पर अभियोजन पक्ष ने एडवोकेट हरदीप के ससुर रोहताश को गवाह बनाया। रोहताश ने अपनी गवाही में कहा कि डॉ. संजय वर्मा ने इस मामले में समझौता करने के लिए उससे मुलाकात की और माना कि बलविंदर और कुलदीप उसके कहने पर ही फर्जी एमएलआर के लिए रुपये लेते थे। इस गवाह को अदालत ने अभियोजन पक्ष का हितबद्ध गवाह (इंट्रस्टिड विटनेस) माना और कहा कि रोहताश ने अपनी गवाही में यह भी नहीं बताया कि डॉ. संजय वर्मा ने उनसे किस दिन और किस समय मुलाकात की थी। साथ ही अदालत ने कहा कि एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कनफेशन आमतौर पर आरोपियों के पक्ष के समक्ष किया जाता और यह कमजोर सुबूत की श्रेणी में आता है और सिर्फ इस आधार पर आरोपी को सजा नहीं दी जा सकती।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि एडवोकेट हरदीप की जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच के आदेश दिए और फिर रोहतक मेडिकल कॉलेज ने विशेष मेडिकल बोर्ड गठित किया। इस बोर्ड के सदस्य वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. एसके धत्तरवाल ने कुल 46 मामलों के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया, जिनमें से 13 मामले मेट्रो अस्पताल के, छह मामले एएमसी अस्पताल के, पांच मामले में सपरा अस्पताल के, चार मामले में सर्वोदय अस्पताल के, दो मामले में लाइफलाइन इंस्टीट्यूट के थे। बोर्ड ने एमएलएआर, अस्पताल के रिकॉर्ड, रेडियोलॉजी एक्जामिनेशन और पुलिस द्वारा उपलब्ध करवाए गए हथियार का विश्लेषण कर अपना मत दिया कि कुछ गलत खेल खेले जाने की संभावना है लेकिन नकली चोट की बात सामने नहीं आई। सिर्फ संभावना पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
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डॉ. भूप सिंह सहित दो को हो चुकी है सजा
हिसार के बहुचर्चित नकली चोट असली नोट प्रकरण में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अल्का मलिक की अदालत ने गत 31 मार्च, 2016 को सामान्य अस्पताल के तत्कालीन चिकित्सा अधिकारी डॉ. भूप सिंह व राजस्थान के दुमकी गांव निवासी जयवीर को दस-दस साल की कैद की सजा सुनाई थी। इस मामले में डॉ. भूप सिंह को प्रदेश सरकार ने पहले ही बर्खास्त कर दिया था। यह मामला भी एडवोकेट हरदीप की शिकायत पर दर्ज किया गया था।
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यह मामला बना नकली चोट के खुलासे की वजह
एडवोकेट हरदीप का भाई पवन कुमार सिवानी क्षेत्र के गुरेरा गांव की एक बीज फैक्ट्री में सुरक्षाकर्मी के तौर पर तैनात था। 15 दिसंबर, 2009 को मनोज, समुंदर, जयवीर और अन्य वहां पर आए और किसी रंजिश को लेकर उसके साथ हाथापाई की और धमकी देकर चले गए। इस मामले में उन्होंने सिवानी पुलिस को शिकायत कर दी। इसके बाद उक्त लोगों ने सामान्य अस्पताल में तैनात चिकित्सा अधिकारी डॉ. भूप सिंह से मिलीभगत करके जयबीर को नकली चोट मारी और हत्या प्रयास का मामला दर्ज करवाने के लिए झूठी एफआईआर दर्ज करवाई। जब पुलिस ने हत्या प्रयास का मामला दर्ज किया तो उन्होंने इस पूरे मामले की जांच की और जांच में इनका फर्जीवाड़ा सामने आया।
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307 की प्राथमिकी के लिए ऐसे मारते थे नकली चोट
दरअसल कनपटी के दोनों तरफ दो-दो पैरिटल बोन होती है। यदि किसी झगड़े में इस पैरिटल बोन में थोड़ा भी फ्रेक्चर आ जाए तो कानूनी भाषा में वह मामला हत्या के प्रयास का बनता है, क्योंकि यह हड्डी अगर टूट जाए तो आदमी मर सकता है। यह लोग किसी से रंजिश निकालने के लिए पहले उसके पास झगड़ा करके आते। उसके बाद नकली चोट मरवाकर पैरिटल बोन में फ्रेक्चर करवाते। इसके बाद उसकी फर्जी एमएलआर बनवाते और पुलिस को मजबूरन 307 का हत्या प्रयास का मामला दर्ज करना पड़ता।
ऐसे हुआ था मामले का खुलासा
जब हरदीप को उसके भाई ने बताया कि उन्होंने हमलावरों के साथ मारपीट नहीं की और उसके खिलाफ हत्या प्रयास का मामला दर्ज हो गया। ऐसे में हरदीप ने हिसार व आसपास के थाने में दर्ज 307 के मामलों की एमएलआर का अध्ययन किया तो सैकड़ों ऐसे मामले मिले जिनमें सिर्फ पैरिटल बोन में फ्रेक्चर था। इन अधिकांश एमएलआर को डॉ. भूप सिंह व उनके सहयोगी चिकित्सकों ने तैयार किया था। ऐसे में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से इस तकनीकी मामले का खुलासा हो गया।
कोर्ट की टिप्पणी : अभियोजन डॉ. संजय वर्मा के खिलाफ केस साबित करने में विफल रहा
नकली चोट-असली नोट प्रकरण के आरोपी मेट्रो अस्पताल के संचालक चिकित्सक डॉ. संजय वर्मा को बरी करते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष डॉ. वर्मा के खिलाफ केस साबित करने में विफल रहा है। हालांकि अभियोजन पक्ष ने एक्स्ट्रा ज्यूडिशियन कनफेशन, रोहतक मेडिकल कॉलेज के विशेष बोर्ड की रिपोर्ट के सहारे डॉ. वर्मा को दोषी साबित करने का प्रयास किया लेकिन अदालत ने अभियोजन पक्ष के सभी प्रयासों को खारिज कर दिया।
एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कनफेशन के तौर पर अभियोजन पक्ष ने एडवोकेट हरदीप के ससुर रोहताश को गवाह बनाया। रोहताश ने अपनी गवाही में कहा कि डॉ. संजय वर्मा ने इस मामले में समझौता करने के लिए उससे मुलाकात की और माना कि बलविंदर और कुलदीप उसके कहने पर ही फर्जी एमएलआर के लिए रुपये लेते थे। इस गवाह को अदालत ने अभियोजन पक्ष का हितबद्ध गवाह (इंट्रस्टिड विटनेस) माना और कहा कि रोहताश ने अपनी गवाही में यह भी नहीं बताया कि डॉ. संजय वर्मा ने उनसे किस दिन और किस समय मुलाकात की थी। साथ ही अदालत ने कहा कि एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कनफेशन आमतौर पर आरोपियों के पक्ष के समक्ष किया जाता और यह कमजोर सुबूत की श्रेणी में आता है और सिर्फ इस आधार पर आरोपी को सजा नहीं दी जा सकती।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि एडवोकेट हरदीप की जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच के आदेश दिए और फिर रोहतक मेडिकल कॉलेज ने विशेष मेडिकल बोर्ड गठित किया। इस बोर्ड के सदस्य वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. एसके धत्तरवाल ने कुल 46 मामलों के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया, जिनमें से 13 मामले मेट्रो अस्पताल के, छह मामले एएमसी अस्पताल के, पांच मामले में सपरा अस्पताल के, चार मामले में सर्वोदय अस्पताल के, दो मामले में लाइफलाइन इंस्टीट्यूट के थे। बोर्ड ने एमएलएआर, अस्पताल के रिकॉर्ड, रेडियोलॉजी एक्जामिनेशन और पुलिस द्वारा उपलब्ध करवाए गए हथियार का विश्लेषण कर अपना मत दिया कि कुछ गलत खेल खेले जाने की संभावना है लेकिन नकली चोट की बात सामने नहीं आई। सिर्फ संभावना पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।