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दुष्यंत के चक्रव्यूह को नहीं भेद पाए अभिमन्यु
amarujala/Hisar
Updated Mon, 08 May 2017 12:48 AM IST
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एक बार फिर अभिमन्यु चक्रव्यूह को भेद नहीं पाए। आखिरी हिस्से में आकर अभिमन्यु दुष्यंत की व्यूह रचना में फंस गए। हैदराबाद में बैठकर दुष्यंत चौटाला ने आखिरी कुछ घंटों में पूरा समीकरण बदल दिया। इनेलो ने साबित कर दिया कि जाट समाज में उनके संगठन का अब भी वर्चस्व कायम है।
जाट संस्था के चुनाव भले ही छोटे हों, लेकिन इनका मैसेज काफी बड़ा रहा। इनेलो और भाजपा में वर्चस्व को लेकर जंग पहले से थी। पहली जंग कॉलेजियम चुनाव को लेकर थी, जिसमें भाजपा ने इनेलो के भिवानी जिला अध्यक्ष और संस्था के पूर्व प्रधान रहे सुनील लांबा को हराने में कामयाब रही। यहां इनेलो को करारी मात सहनी पड़ी। पूर्व प्रधान कॉलेजियम का चुनाव भी नहीं जीत पाए। दूसरे चरण में भी भाजपा ने ही बाजी मारी। पहले भाजपा मनदीप मलिक और जगजीत सिंधु के नाम पर मंथन कर रही थी। एन वक्त पर भाजपा ने इनेलो में सेंध लगाते हुए पूर्व प्रधान रहे नरेंद्र लांबा के बेटे सुनील लांबा के भाई सुशील लांबा को अपने पैनल में जोड़ लिया। इनेलो में भी बागी प्रत्याशी के तौर पर केके गोदारा ने नामांकन कर दिया। जिसके बाद इनेलो तीन हिस्सों में बंटकर बेहद कमजोर नजर आने लगी। इनेलो पैनल को भी कमजोर माना जा रहा था, जिसमें प्रधान पद की छवि को लेकर सवाल खड़े किए गए थे। बागी बनने की कगार पर जा रहे मनदीप मलिक को भी मनाकर उपप्रधान के लिए जोड़ लिया गया। यहां तक अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदकर आगे बढ़ने में कुछ कामयाब रहे। भाजपा की ओर से चुनाव जीतने के लिए सभी सहयोगियों की टीम को प्रचार में उतारा गया। वित्तमंत्री के भतीजे अजय सिंधु, साले शशि ढाका, करीबी सतपाल श्योराण को चुनाव में जीत के लिए लगाया गया। आखिरी दिन जिला परिषद चेयरमैन के बेटे को भी कैंप में लाया गया।
एक ही रात में कुछ घंटों में पलटा खेल
पहले चरण में इनेलो चुनाव को सामाजिक स्तर पर हल कराना चाहती थी। इस कारण नामांकन वापसी तक किसी तरह का प्रचार नहीं किया। बागी हुए प्रत्याशी केके गोदारा को भी मनाने का प्रयास नहीं किया। आखिरी कुछ घंटे में सांसद दुष्यंत चौटाला ने चुुनाव की कमान अपने हाथ में ली। सांसद किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने हैदराबाद में गए हुए थे। दुष्यंत ने वहां से ही अपनी टीम को काम पर लगाया। रात के समय पार्टी के उन खास पदाधिकारियों को फोन किए, जिन गांव और एरिया से कॉलेजियम थे। सभी को एक ही संदेश दिया गया कि पार्टी संगठन से बाहर न जाएं। आखिरी कुछ घंटे में बेहद आक्रामक तरीके से तीनों विधायकों को भी जिम्मेदारी सौंपी गई। आखिरी कुछ घंटे में दुष्यंत ने पूरा खेल ही पलट दिया।
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युवा अध्यक्ष की खास भूमिका
इनेलो के सतपाल पालू की जीत में युवा विंग के अध्यक्ष अमित बूरा की खास भूमिका रही। अपने एरिया में कॉलेजियम को मनाने से लेकर दूसरे एरिया के कॉलेजियम सदस्यों को मतदान केंद्र तक लाने की जिम्मेदारी इनके पास थी। युवाओं को जोड़ने के लिए भी युवा अध्यक्ष को निर्देश दिए गए थे। आखिरी दो दिन में युवा अध्यक्ष ने कॉलेजियम सदस्यों को भरोसे में लिया।
जीत के मायने
इनेलो की इस जीत के काफी मायने हैं। जाट समाज में इनेलो ने अपना वर्चस्व फिर से साबित किया। करीब तीन साल पहले हिसार संसदीय क्षेत्र ने दुष्यंत पर जताए भरोसे को इस छोटे चुनाव के जरिये दोहराया। इनेलो ने जाट आरक्षण आंदोलन में लगातार धरने पर सहयोग दिया। इनेलो की जीत में यह भी एक कारण साबित हुआ।
हार के बाद भी मजबूत
भले ही इस चुनाव में भाजपा का प्रत्याशी हार गया, लेकिन जाट समाज में भाजपा ने अपनी पैठ शुरू कर दी है। जाट संस्था के चुनाव में इससे पहले भाजपा कभी नहीं उतरी थी। पहली बार मुकाबले में आने के बाद महज चार वोट से हारने को भाजपा की मजबूत स्थिति को दिखाता है। इस पूरे गेम से कांग्रेस पूरी तरह से गायब रही।
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जाट संस्था के चुनाव भले ही छोटे हों, लेकिन इनका मैसेज काफी बड़ा रहा। इनेलो और भाजपा में वर्चस्व को लेकर जंग पहले से थी। पहली जंग कॉलेजियम चुनाव को लेकर थी, जिसमें भाजपा ने इनेलो के भिवानी जिला अध्यक्ष और संस्था के पूर्व प्रधान रहे सुनील लांबा को हराने में कामयाब रही। यहां इनेलो को करारी मात सहनी पड़ी। पूर्व प्रधान कॉलेजियम का चुनाव भी नहीं जीत पाए। दूसरे चरण में भी भाजपा ने ही बाजी मारी। पहले भाजपा मनदीप मलिक और जगजीत सिंधु के नाम पर मंथन कर रही थी। एन वक्त पर भाजपा ने इनेलो में सेंध लगाते हुए पूर्व प्रधान रहे नरेंद्र लांबा के बेटे सुनील लांबा के भाई सुशील लांबा को अपने पैनल में जोड़ लिया। इनेलो में भी बागी प्रत्याशी के तौर पर केके गोदारा ने नामांकन कर दिया। जिसके बाद इनेलो तीन हिस्सों में बंटकर बेहद कमजोर नजर आने लगी। इनेलो पैनल को भी कमजोर माना जा रहा था, जिसमें प्रधान पद की छवि को लेकर सवाल खड़े किए गए थे। बागी बनने की कगार पर जा रहे मनदीप मलिक को भी मनाकर उपप्रधान के लिए जोड़ लिया गया। यहां तक अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदकर आगे बढ़ने में कुछ कामयाब रहे। भाजपा की ओर से चुनाव जीतने के लिए सभी सहयोगियों की टीम को प्रचार में उतारा गया। वित्तमंत्री के भतीजे अजय सिंधु, साले शशि ढाका, करीबी सतपाल श्योराण को चुनाव में जीत के लिए लगाया गया। आखिरी दिन जिला परिषद चेयरमैन के बेटे को भी कैंप में लाया गया।
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एक ही रात में कुछ घंटों में पलटा खेल
पहले चरण में इनेलो चुनाव को सामाजिक स्तर पर हल कराना चाहती थी। इस कारण नामांकन वापसी तक किसी तरह का प्रचार नहीं किया। बागी हुए प्रत्याशी केके गोदारा को भी मनाने का प्रयास नहीं किया। आखिरी कुछ घंटे में सांसद दुष्यंत चौटाला ने चुुनाव की कमान अपने हाथ में ली। सांसद किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने हैदराबाद में गए हुए थे। दुष्यंत ने वहां से ही अपनी टीम को काम पर लगाया। रात के समय पार्टी के उन खास पदाधिकारियों को फोन किए, जिन गांव और एरिया से कॉलेजियम थे। सभी को एक ही संदेश दिया गया कि पार्टी संगठन से बाहर न जाएं। आखिरी कुछ घंटे में बेहद आक्रामक तरीके से तीनों विधायकों को भी जिम्मेदारी सौंपी गई। आखिरी कुछ घंटे में दुष्यंत ने पूरा खेल ही पलट दिया।
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युवा अध्यक्ष की खास भूमिका
इनेलो के सतपाल पालू की जीत में युवा विंग के अध्यक्ष अमित बूरा की खास भूमिका रही। अपने एरिया में कॉलेजियम को मनाने से लेकर दूसरे एरिया के कॉलेजियम सदस्यों को मतदान केंद्र तक लाने की जिम्मेदारी इनके पास थी। युवाओं को जोड़ने के लिए भी युवा अध्यक्ष को निर्देश दिए गए थे। आखिरी दो दिन में युवा अध्यक्ष ने कॉलेजियम सदस्यों को भरोसे में लिया।
जीत के मायने
इनेलो की इस जीत के काफी मायने हैं। जाट समाज में इनेलो ने अपना वर्चस्व फिर से साबित किया। करीब तीन साल पहले हिसार संसदीय क्षेत्र ने दुष्यंत पर जताए भरोसे को इस छोटे चुनाव के जरिये दोहराया। इनेलो ने जाट आरक्षण आंदोलन में लगातार धरने पर सहयोग दिया। इनेलो की जीत में यह भी एक कारण साबित हुआ।
हार के बाद भी मजबूत
भले ही इस चुनाव में भाजपा का प्रत्याशी हार गया, लेकिन जाट समाज में भाजपा ने अपनी पैठ शुरू कर दी है। जाट संस्था के चुनाव में इससे पहले भाजपा कभी नहीं उतरी थी। पहली बार मुकाबले में आने के बाद महज चार वोट से हारने को भाजपा की मजबूत स्थिति को दिखाता है। इस पूरे गेम से कांग्रेस पूरी तरह से गायब रही।