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तीन दिन से सड़क पर सोने को मजबूर 122 परिवार
ब्यूरो / अमर उजाला , हिसार
Updated Sat, 25 Jun 2016 12:38 AM IST
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122 परिवार
- फोटो : buraeau
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मिलगेट एरिया में ढहाए मकानों के 122 परिवार के सैकड़ों सदस्य तीन दिन बाद भी खुले आसमां के नीचे रहने को मजबूर हैं। प्रशासन की ओर से इन्हें किसी तरह की सहायता उपलब्ध नहीं करवाई गई है। लोग बहते हुए आंसुओं से मलबे में से अपने जरूरत के सामान और ईंटें आदि उठा रहे हैं। इधर, शुक्रवार को मिलकर्मियों ने मिल की जमीन पर कांटेदार तार लगाकर 122 परिवारों के लोगों को जमीन खाली करने की बात कही। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद प्रशासन द्वारा मिल की जमीन पर रहे 122 घरों को तोड़कर कब्जा छुड़वाया था। इसके बाद तीसरे दिन मिलकर्मियों ने पिलरों पर कांटेदार तार लगाई, जिन पर लोगों ने वहां से खदेड़ने का आरोप लगाया है। हालांकि अभी भी काफी मकानों का मलबा वहां पड़ा हुआ है। गौरतलब है कि प्रशासन द्वारा 40 सालों से रह रहे 122 परिवारों के मकान तोड़कर मिल और पीडबल्यूडी के साथ बीड़ की भी जमीन को भी कब्जे से मुक्त करवाया था।
अब कहां जाए 122 परिवार
मिल की जमीन पर बने मकानों के ढहाए जाने से इन घरों में रहने वाले लोग तीसरे दिन भी किसी प्रकार की मदद न मिलने के कारण सड़क पर ही रहने को मजबूर हैं। 122 मकानों में से अधिकतर लोग मजदूरी करके अपनी आजीविका चला रहे हैं। अब मकान तोड़े जाने से इन लोगों की आजीविका भी मुश्किल हो गई है। आलम ये है कि इन लोगों के घर तोड़े जाने से न तो ये पेट की भूूख मिटा पा रहे हैं और न ही कोई काम ही कर पा रहे हैं।
यह बोले लोग
बेघर हुए लोगों ने शुक्रवार को एकत्रित होकर बैठक की। बैठक में मुकेश, किताबा, विजेंद्र, राजाराम आदि ने कहा कि सरकार द्वारा हमारे घरों को तोड़ने से पहले हमें किसी प्रकार की सहायता मुहैया करवानी चाहिए थी। ऐसे अचानक हमारे घरों के टूटने से हमारे परिवार भी बिखरने को हैं। इससे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई तो छूट ही जाएगी, साथ ही हमें डर है कि बच्चे आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त न हो जाएं।
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अब कहां जाए 122 परिवार
मिल की जमीन पर बने मकानों के ढहाए जाने से इन घरों में रहने वाले लोग तीसरे दिन भी किसी प्रकार की मदद न मिलने के कारण सड़क पर ही रहने को मजबूर हैं। 122 मकानों में से अधिकतर लोग मजदूरी करके अपनी आजीविका चला रहे हैं। अब मकान तोड़े जाने से इन लोगों की आजीविका भी मुश्किल हो गई है। आलम ये है कि इन लोगों के घर तोड़े जाने से न तो ये पेट की भूूख मिटा पा रहे हैं और न ही कोई काम ही कर पा रहे हैं।
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यह बोले लोग
बेघर हुए लोगों ने शुक्रवार को एकत्रित होकर बैठक की। बैठक में मुकेश, किताबा, विजेंद्र, राजाराम आदि ने कहा कि सरकार द्वारा हमारे घरों को तोड़ने से पहले हमें किसी प्रकार की सहायता मुहैया करवानी चाहिए थी। ऐसे अचानक हमारे घरों के टूटने से हमारे परिवार भी बिखरने को हैं। इससे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई तो छूट ही जाएगी, साथ ही हमें डर है कि बच्चे आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त न हो जाएं।
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