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1971 की लड़ाई में शहीद हो गए थे बुड़ाक के वीर सिंह, आज भी फौज में हैं गांव के 10 युवा,
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अमर उजाला ब्यूरो
जिले के बुड़ाक गांव देश की रक्षा के लिए अग्रिम पंक्ति का गांव कहा जा सकता है। इस गांव के नायक वीर सिंह पूनिया, जहां 1971 की लड़ाई में शहीद हुए थे, वहीं गांव के 10 युवक आज भी सेना में भर्ती हैं, जो विभिन्न स्थानों पर देश की रक्षा के लिए तैनात हैं। गांव के ही आठ जवान देशसेवा करके सेवानिवृत्त होकर गांव आ चुके हैं।
जम्मू-कश्मीर में सेना पर हुए आतंकी हमले में शहीद हुए सैनिकों के प्रति जहां पूरे देश के लोगों में रोष और गुस्सा है, वहीं जिले के गांव बुड़ाक के ग्रामीण इस हमले से न केवल गुस्से में हैं, बल्कि शहीद हुए सैनिकों के परिवारों का दर्द उनके सीने में भी है। इसका कारण यह है कि इस गांव का सैनिकों का इतिहास रहा है। इस गांव के नायक वीर सिंह भारत-पाकिस्तान की 1971 की लड़ाई के दौरान दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। उनकी बहादुरी के किस्से सुन कर गांव के युवाओं में सेना के प्रति जज्बा पैदा हुआ और आज स्थिति यह है कि गांव के आठ जवान देशसेवा करके सेवानिवृत्ति पा चुके हैं, जबकि 10 जवान ऐसे हैं, जो आज भी देश की सरहदों पर तैनात रहकर देश की सेवा में लगे हुए हैं। गांव में नायक वीर सिंह की प्रतिमा स्थापित की गई है और उनकी शहादत के दिन के अलावा शहीदी दिवसों पर ग्रामीण एकत्रित होकर उनकी प्रतिमा के समक्ष अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।
ग्रामीणों में गुस्सा इतना, बस अभी लिया जाए बदला
बुड़ाक के ग्रामीणों में हमले के प्रति गुस्सा इतना है कि वे चाहते हैं बस बदला तुरंत लिया जाना चाहिए। शहीद वीर सिंह के भतीजे संजय पूनिया ने कहा कि हम सैनिक के परिवार की पीड़ा को अच्छी तरह से समझते हैं। देश का गुस्सा भले कुछ दिनों बाद शांत हो जाए, लेकिन उनके दिलों में यह जख्म हरा रहेगा। सरकार को चाहिए कि तुरंत प्रभाव से एक्शन ले और आतंकियों के ठिकानों पर हमले कर उन्हें नष्ट करे। पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने का अब समय आ गया है।
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यह बोलीं शहीद की वीरांगना
शहीद वीर सिंह की वीरांगना बीरमति ने कहा कि हम यह देखते-सुनते आ रहे हैं कि ये कर देंगे, वो कर देंगे, लेकिन आज तक किया किसी ने कुछ नहीं। बस मेरी जैसी वीरांगनाओं की संख्या जरूर बढ़ रही है।
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जिले के बुड़ाक गांव देश की रक्षा के लिए अग्रिम पंक्ति का गांव कहा जा सकता है। इस गांव के नायक वीर सिंह पूनिया, जहां 1971 की लड़ाई में शहीद हुए थे, वहीं गांव के 10 युवक आज भी सेना में भर्ती हैं, जो विभिन्न स्थानों पर देश की रक्षा के लिए तैनात हैं। गांव के ही आठ जवान देशसेवा करके सेवानिवृत्त होकर गांव आ चुके हैं।
जम्मू-कश्मीर में सेना पर हुए आतंकी हमले में शहीद हुए सैनिकों के प्रति जहां पूरे देश के लोगों में रोष और गुस्सा है, वहीं जिले के गांव बुड़ाक के ग्रामीण इस हमले से न केवल गुस्से में हैं, बल्कि शहीद हुए सैनिकों के परिवारों का दर्द उनके सीने में भी है। इसका कारण यह है कि इस गांव का सैनिकों का इतिहास रहा है। इस गांव के नायक वीर सिंह भारत-पाकिस्तान की 1971 की लड़ाई के दौरान दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। उनकी बहादुरी के किस्से सुन कर गांव के युवाओं में सेना के प्रति जज्बा पैदा हुआ और आज स्थिति यह है कि गांव के आठ जवान देशसेवा करके सेवानिवृत्ति पा चुके हैं, जबकि 10 जवान ऐसे हैं, जो आज भी देश की सरहदों पर तैनात रहकर देश की सेवा में लगे हुए हैं। गांव में नायक वीर सिंह की प्रतिमा स्थापित की गई है और उनकी शहादत के दिन के अलावा शहीदी दिवसों पर ग्रामीण एकत्रित होकर उनकी प्रतिमा के समक्ष अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।
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ग्रामीणों में गुस्सा इतना, बस अभी लिया जाए बदला
बुड़ाक के ग्रामीणों में हमले के प्रति गुस्सा इतना है कि वे चाहते हैं बस बदला तुरंत लिया जाना चाहिए। शहीद वीर सिंह के भतीजे संजय पूनिया ने कहा कि हम सैनिक के परिवार की पीड़ा को अच्छी तरह से समझते हैं। देश का गुस्सा भले कुछ दिनों बाद शांत हो जाए, लेकिन उनके दिलों में यह जख्म हरा रहेगा। सरकार को चाहिए कि तुरंत प्रभाव से एक्शन ले और आतंकियों के ठिकानों पर हमले कर उन्हें नष्ट करे। पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने का अब समय आ गया है।
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यह बोलीं शहीद की वीरांगना
शहीद वीर सिंह की वीरांगना बीरमति ने कहा कि हम यह देखते-सुनते आ रहे हैं कि ये कर देंगे, वो कर देंगे, लेकिन आज तक किया किसी ने कुछ नहीं। बस मेरी जैसी वीरांगनाओं की संख्या जरूर बढ़ रही है।