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पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मनरेगा में पसीना बहा रहीं महिलाएं
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मनरेगा के तहत सफाई कार्य में जुटी महिला मजदूर।
- फोटो : Fatehabad
अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष....
पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मनरेगा में पसीना बहा रहीं महिलाएं
29 ग्राम पंचायतों में 13 हजार 868 मनरेगा मजदूरों के बने जॉब कार्ड
7064 पुरुषों के मुकाबले 6804 महिलाएं कर रही मजदूरी
मजदूरों के रहन-सहन और खान-पान में परिवर्तन आया
फोटो 8 की सीरीज...
विकास छिंपा
भूना। केंद्र सरकार की मनरेगा योजना से मजदूरों की आर्थिक स्थिति में काफी बदलाव आया है। मगर योजना के बाद से मजदूरों की दशा और दिशा बदल गई है। मजदूर अब परिवार का पालन पोषण अच्छे ढंग से कर रहा है। जहां पहले मजदूरों को मजदूरी के लिए दर-दर भटकना पड़ता था। लेकिन केंद्र सरकार की योजना मनरेगा से अब 100 दिन का रोजगार मिलने से गांवों एवं शहरों में मजदूरों की संख्या में काफी गिरावट आई है। इसलिए मजदूर न मिलने के कारण मशीनरीकरण का प्रभाव पड़ रहा है।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत भूना ब्लॉक की 29 ग्राम पंचायतों में 16 हजार 488 मनरेगा मजदूर पंजीकृत हैं। इनमें 8727 पुरुष व 7761 महिला शामिल हैं। जबकि 13 हजार 868 योजना में कार्यरत हैं और जॉब कार्ड बनें हैं, जिनमें 6804 महिला व 7064 पुरुष मजदूरी कर रहे हैं। शुरुआती दौर में मजदूरों को एक दिन की मजदूरी 284 रुपये देनी शुरू की गई थी। मगर बाद में इसके बढ़ाकर 309 व 315 रुपये किया गया। फिलहाल 331 रुपये न्यूनतम मजदूरी का भुगतान मिल रहा है। इससे मजदूरों के रहन-सहन और खानपान में भी परिवर्तन आया है।
यह है मजदूर दिवस का उद्देश्य
अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाने के पीछे कुछ उद्देश्य हैं, इसलिए ही इस दिन को मनाया जाता है। मजदूरों की उपलब्धियों का सम्मान करना, उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाना तथा अत्याचारों पर विरोध करना, मजदूर संगठन को मजबूत करना और उनके योगदान की चर्चा करना आदि कई उद्देश्य है।
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कोट
मजदूर दिवस मनाने से नहीं बल्कि मजदूरी करने से मेहनताना मिलता है। मनरेगा की मजदूरी 331 रुपये निर्धारित है। गेहूं के सीजन में 500 से अधिक मजदूरी मजदूरों को मिल रही है। इसलिए काम करने से पैसा मिलेगा, मजदूर दिवस मनाने से नहीं। पिछले कुछ वर्षों से मजदूरों की आर्थिक स्थिति संपन्न हुई है।
-हनुमान सिंह, मजदूर
अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस लाखों मजदूरों के परिश्रम, दृढ़ निश्चय व निष्ठा का दिन है। मजदूरों के बिना किसी भी औद्योगिक ढांचे की कल्पना नहीं की जा सकती। आज भी देश में मजदूरों के साथ अन्याय व शोषण होता है। देश में मजदूरों से कम मजदूरी पर काम कराया जाता है। प्राइवेट कंपनियों व फैक्टरियों में मजदूरों से पूरा काम लेते हैं, लेकिन मजदूरी के नाम पर बहुत कम वेतन देते हैं। मजदूरों से केवल आठ घंटे ही काम कराना सभी प्राइवेट कंपनियों व फैक्टरियों में सुनिश्चित करना चाहिए।
-ओमप्रकाश अनेजा, मजदूर नेता
मनरेगा को मुख्य रूप से ग्राम पंचायतों में लागू किया हुआ है। ठेकेदारों की भागीदारी प्रतिबंधित है। तालाब खुदाई, साफ-सफाई और अन्य कार्यों को लेकर मनरेगा मजदूरों को प्राथमिकता दी जाती है। जिन्हें 331 न्यूनतम मजदूरी का भुगतान भी मजदूरों के अकाउंट में सीधा भेजा जाता है। वही पर्यावरण की रक्षा, ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने, ग्रामीण शहरी प्रवास को कम करने और सामाजिक इक्विटी को बढ़ावा देने में मजदूरों की मनरेगा मददगार साबित हो रही है।
-संदीप जांगड़ा, एबीपीओ, मनरेगा, भूना
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पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मनरेगा में पसीना बहा रहीं महिलाएं
29 ग्राम पंचायतों में 13 हजार 868 मनरेगा मजदूरों के बने जॉब कार्ड
7064 पुरुषों के मुकाबले 6804 महिलाएं कर रही मजदूरी
मजदूरों के रहन-सहन और खान-पान में परिवर्तन आया
फोटो 8 की सीरीज...
विकास छिंपा
भूना। केंद्र सरकार की मनरेगा योजना से मजदूरों की आर्थिक स्थिति में काफी बदलाव आया है। मगर योजना के बाद से मजदूरों की दशा और दिशा बदल गई है। मजदूर अब परिवार का पालन पोषण अच्छे ढंग से कर रहा है। जहां पहले मजदूरों को मजदूरी के लिए दर-दर भटकना पड़ता था। लेकिन केंद्र सरकार की योजना मनरेगा से अब 100 दिन का रोजगार मिलने से गांवों एवं शहरों में मजदूरों की संख्या में काफी गिरावट आई है। इसलिए मजदूर न मिलने के कारण मशीनरीकरण का प्रभाव पड़ रहा है।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत भूना ब्लॉक की 29 ग्राम पंचायतों में 16 हजार 488 मनरेगा मजदूर पंजीकृत हैं। इनमें 8727 पुरुष व 7761 महिला शामिल हैं। जबकि 13 हजार 868 योजना में कार्यरत हैं और जॉब कार्ड बनें हैं, जिनमें 6804 महिला व 7064 पुरुष मजदूरी कर रहे हैं। शुरुआती दौर में मजदूरों को एक दिन की मजदूरी 284 रुपये देनी शुरू की गई थी। मगर बाद में इसके बढ़ाकर 309 व 315 रुपये किया गया। फिलहाल 331 रुपये न्यूनतम मजदूरी का भुगतान मिल रहा है। इससे मजदूरों के रहन-सहन और खानपान में भी परिवर्तन आया है।
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यह है मजदूर दिवस का उद्देश्य
अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाने के पीछे कुछ उद्देश्य हैं, इसलिए ही इस दिन को मनाया जाता है। मजदूरों की उपलब्धियों का सम्मान करना, उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाना तथा अत्याचारों पर विरोध करना, मजदूर संगठन को मजबूत करना और उनके योगदान की चर्चा करना आदि कई उद्देश्य है।
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मजदूर दिवस मनाने से नहीं बल्कि मजदूरी करने से मेहनताना मिलता है। मनरेगा की मजदूरी 331 रुपये निर्धारित है। गेहूं के सीजन में 500 से अधिक मजदूरी मजदूरों को मिल रही है। इसलिए काम करने से पैसा मिलेगा, मजदूर दिवस मनाने से नहीं। पिछले कुछ वर्षों से मजदूरों की आर्थिक स्थिति संपन्न हुई है।
-हनुमान सिंह, मजदूर
अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस लाखों मजदूरों के परिश्रम, दृढ़ निश्चय व निष्ठा का दिन है। मजदूरों के बिना किसी भी औद्योगिक ढांचे की कल्पना नहीं की जा सकती। आज भी देश में मजदूरों के साथ अन्याय व शोषण होता है। देश में मजदूरों से कम मजदूरी पर काम कराया जाता है। प्राइवेट कंपनियों व फैक्टरियों में मजदूरों से पूरा काम लेते हैं, लेकिन मजदूरी के नाम पर बहुत कम वेतन देते हैं। मजदूरों से केवल आठ घंटे ही काम कराना सभी प्राइवेट कंपनियों व फैक्टरियों में सुनिश्चित करना चाहिए।
-ओमप्रकाश अनेजा, मजदूर नेता
मनरेगा को मुख्य रूप से ग्राम पंचायतों में लागू किया हुआ है। ठेकेदारों की भागीदारी प्रतिबंधित है। तालाब खुदाई, साफ-सफाई और अन्य कार्यों को लेकर मनरेगा मजदूरों को प्राथमिकता दी जाती है। जिन्हें 331 न्यूनतम मजदूरी का भुगतान भी मजदूरों के अकाउंट में सीधा भेजा जाता है। वही पर्यावरण की रक्षा, ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने, ग्रामीण शहरी प्रवास को कम करने और सामाजिक इक्विटी को बढ़ावा देने में मजदूरों की मनरेगा मददगार साबित हो रही है।
-संदीप जांगड़ा, एबीपीओ, मनरेगा, भूना