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Hindi News ›   Haryana ›   Fatehabad News ›   Saved the lives of hundreds of people setting themselves caught in the vortex of poverty

सैकड़ों डूबते लोगों की जान बचाई, खुद गरीबी के भंवर में फंसा

Thu, 05 Jun 2014 12:08 AM IST
fatehabad
fatehabad Updated Thu, 05 Jun 2014 12:08 AM IST
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 पानी में डूब रहे सैकड़ों लोगों की जिंदगी बचाने वाले गांव कंवलगढ़ निवासी जोरा सिंह खुद खाने के दाने-दाने को मोहताज हैं। उन्हें भाखड़ा, घग्गर, जोहड़ और जलघरों से लोगों की जान बचाने के बदले में शाबासी तो खूब मिली, लेकिन प्रशासन की ओर से एक नौकरी नसीब नहीं हुई।

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 इतनी जिंदगियां बचाने पर जोरा सिंह को प्रशासन और समाजसेवी संस्थाओं की ओर से प्रशंसा पत्र तो खूब मिले, लेकिन आर्थिक मदद के नाम पर झोली खाली ही रही। अब 40 वर्षीय जोरा सिंह के सामने अपने परिवार का पालने का संकट पैदा हो गया है। वे कह रहे हैं कि प्रशंसा पत्र से रोटी तो नहीं बनती।
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पिछले 18 वर्षों से लगातार नदी, नाले या जोहड़ में डूबे लोगों की जिंदगी बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाने वाले जोरा सिंह अब इस सेवा के कार्य को करने से अपने हाथ पीछे खींचने लगे हैं। एक तो उम्र का पड़ाव और दूसरा गरीबी। जोरा सिंह बताते हैं कि उनके परिवार में पत्नी, दो बेटी और एक बेटा है, जो एक कमरे के घर में रहने को मजबूर हैं। 13 वर्षीय बड़ी बेटी ज्योति आठवीं कक्षा, 6 वर्षीय बेटा सिकंदर दूसरी कक्षा में और चार साल की लड़की काजल गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं।
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कई राज्यों में जाते हैं
वे रतिया क्षेत्र में ही नहीं बल्कि हरियाणा के कई जिलों, राजस्थान और पंजाब में भी डूबे लोगों को बचाने या शव निकालने के लिए जाते हैं।

खुद किराया भरकर जाता हूं, बाद में कोई नहीं पूछता
जोरा सिंह ने बताया कि मैं किराया भरकर घटनास्थल पर पहुंचता हूं। कई बार तोे डूबने वालों की मौत पहले ही हो जाती है, ऐसे मौक ों पर मैं खुद किराया नहीं मांगता। जोरा सिंह ने कहा कि जिनकी जान बचाता हूं वो भी बाद में मुझसे मुंह फेर लेते हैं और अपने परिजनों को अस्पताल ले जाने के बाद मुझे नहीं पूछते। प्रशासन भी तब याद करता है जब प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़ आदि की समस्या होती है।

नौकरी की मांग
जोरा सिंह ने बताया कि मेरे पास अब तक एसपी, एसडीएम और ग्राम पंचायतों द्वारा दिए गए सैकड़ाें प्रशंसा पत्र इकट्ठा हो चुके हैं। ऐसे प्रशंसा पत्र मेरे किस काम के। बच्चे रोटी मांगते हैं और इन प्रशंसा पत्रों की रोटी नहीं बन सकती। सरकार द्वारा कोई सरकारी नौकरी या कोई आर्थिक सहायता प्रदान की जाए जिससे मैं अपना गुजर बसर कर सकूं।

पंजाब में फिर भी मिल जाती है मदद
जोरा सिंह ने बताया कि जब भी वे पंजाब में किसी डूबते को बचाते हैं या शव निकालते हैं तो वहां भी लोग आर्थिक मदद कर देते हैं, लेकिन यहां तो कोई नहीं पूछता। कई बार तो किसी डूबे व्यक्ति को ढूंढने के लिए चार पांच दिन भी लग जाते हैं और जब हमें सफलता मिलती है तो प्रशासन हमें भूल जाता है।

 उन्होंने बताया कि हाल ही में गांव भुदड़वास की भाखड़ा में डूबे युवकाें को चार दिन तलाशते हुए वे नंगल के पास मिले। प्रशासन ने उन्हें घर तक पहुंचाने की जहमत नहीं उठाई। जो काम प्रशासन को करना चाहिए, वह काम मैं करता हूं, लेकिन कोई नौकरी नहीं मिलती।

पहली कक्षा में ही बचाई थी जान
गोताखोर जोरा सिंह ने बताया कि 1988 में बाढ़ आई थी, उस समय वह पहली कक्षा में पढ़ता था। गांव के दो बच्चे घग्घर में डूब गए थे। वह उन्हें जिंदा निकाल लाया था। उसके बाद उसके मन में दूसरों की जान बचाने का यह जज्बा पैदा हो गया। जब वह कुछ बड़ा हुआ तो उसका जुनून पैदा हो गया।

 
एसडीएम को नहीं पता
एसडीएम उमेद सिंह मोहन ने कहा कि मेरे संज्ञान में ऐसी बात नहीं है। आपने बताया है तो मैं जोरा सिंह को बुलाकर उससे पूछूंगा। उसके बाद ही कुछ बता पाऊंगा। उनसे पूछा गया कि हाल ही में जोरा सिंह ने भूंदड़वास के दो युवकों के शव तलाश कर निकाले हैं तो इस पर भी एसडीएम ने जानकारी होने से इंकार कर दिया।

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