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क्षमा के आदान-प्रदान का महान पर्व है सम्वत्सरी : आचार्य डॉ. पद्मराज
Mon, 09 Sep 2024 06:08 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
Updated Mon, 09 Sep 2024 06:08 AM IST
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फतेहाबाद के महापर्व पर्युषण के अंतिम दिवस प्रवचन करते आचार्य डॉ. पद्मराज स्वामी महाराज।
फतेहाबाद। श्यामनगर स्थित जैन सभा में महापर्व पर्यूषण के अंतिम दिवस पर सम्वत्सरी महापर्व मनाया गया। कार्यक्रम में अंतकृद्दशांग सूत्र की वाचना का समापन आराधना द्वारा किया गया। आचार्य डॉ. पद्मराज स्वामी महाराज ने कहा कि रविवार ऋषि पंचमी के साथ सम्वत्सरी महापर्व है। यह पर्व गणेश चतुर्थी के बाद मनाया जाता है।
दूसरी ओर जैन परंपरा में पर्युषण पर्व का सर्वोपरि मूल्य है। अष्ट दिवसीय इस पर्व के अंतिम दिवस को सम्वत्सरी महापर्व के रूप में मनाया जाता है। यह क्षमापना अर्थात क्षमा के आदान प्रदान का सर्वोत्तम पर्व है। आचार्य डॉ. पद्मराज स्वामी ने कहा कि यह जैन परंपरा का ऐसा पर्व है जिसमें किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं फैलता। कोई शोभायात्रा भी नहीं निकाली जाती कि प्रशासन को परिश्रम करना पड़े और न ही पटाखे आदि फोड़े जाते हैं।
इसमें तो निराहार रहकर व्रत, उपवास, पौषध के द्वारा आत्म साधना की जाती है और परमात्मा के साथ जुड़ने का प्रयास किया जाता है। आचार्य डॉ. पद्मराज स्वामी महाराज ने बताया कि इस पर्व को क्षमापना पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। जगत के जीवमात्र को क्षमादान करते हुए उनसे अपने लिए भी क्षमा याचना की जाती है।
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आचार्य ने आगे बताया कि संसार का प्रत्येक प्राणी अपना विकास करने में समर्थ है। उसमें भी मनुष्य के पास तो यह सामर्थ्य कुछ अधिक ही है। आत्मिक विकास के लिए क्षमाभाव अनिवार्य है। क्षमाभाव से ही कषाय मुक्ति सम्भव है और कषाय मुक्ति ही यथार्थ में मुक्ति है। धर्म के दस लक्षणों में प्रथम लक्षण क्षमा ही है।
इस प्रकार सम्वत्सरी महापर्व जप, तप, त्याग, शील, संयम, दान, सेवा आदि के द्वारा स्वयं को परिशुद्ध करने का महापर्व है। सभा में अठाई तप करने वाले अभिषेक जैन तथा विशेष रूप से पहुंचे अतिथियों कुलजीत सिंह कुलडिया, एडवोकेट भारत भूषण गर्ग, कृष्ण कुमार गर्ग, रामनिवास शर्मा, बाबूराम मित्तल, आरपी गर्ग, वेद मंगल, रविन्द्र चौधरी इत्यादि का मोतियों की माला एवं अंगवस्त्र द्वारा सभा की तरफ से अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रधान सुरेंद्र मित्तल, प्रवीण जैन, विनोद जैन, रवींद्र जैन, संजीव जैन आदि का योगदान रहा।
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दूसरी ओर जैन परंपरा में पर्युषण पर्व का सर्वोपरि मूल्य है। अष्ट दिवसीय इस पर्व के अंतिम दिवस को सम्वत्सरी महापर्व के रूप में मनाया जाता है। यह क्षमापना अर्थात क्षमा के आदान प्रदान का सर्वोत्तम पर्व है। आचार्य डॉ. पद्मराज स्वामी ने कहा कि यह जैन परंपरा का ऐसा पर्व है जिसमें किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं फैलता। कोई शोभायात्रा भी नहीं निकाली जाती कि प्रशासन को परिश्रम करना पड़े और न ही पटाखे आदि फोड़े जाते हैं।
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इसमें तो निराहार रहकर व्रत, उपवास, पौषध के द्वारा आत्म साधना की जाती है और परमात्मा के साथ जुड़ने का प्रयास किया जाता है। आचार्य डॉ. पद्मराज स्वामी महाराज ने बताया कि इस पर्व को क्षमापना पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। जगत के जीवमात्र को क्षमादान करते हुए उनसे अपने लिए भी क्षमा याचना की जाती है।
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आचार्य ने आगे बताया कि संसार का प्रत्येक प्राणी अपना विकास करने में समर्थ है। उसमें भी मनुष्य के पास तो यह सामर्थ्य कुछ अधिक ही है। आत्मिक विकास के लिए क्षमाभाव अनिवार्य है। क्षमाभाव से ही कषाय मुक्ति सम्भव है और कषाय मुक्ति ही यथार्थ में मुक्ति है। धर्म के दस लक्षणों में प्रथम लक्षण क्षमा ही है।
इस प्रकार सम्वत्सरी महापर्व जप, तप, त्याग, शील, संयम, दान, सेवा आदि के द्वारा स्वयं को परिशुद्ध करने का महापर्व है। सभा में अठाई तप करने वाले अभिषेक जैन तथा विशेष रूप से पहुंचे अतिथियों कुलजीत सिंह कुलडिया, एडवोकेट भारत भूषण गर्ग, कृष्ण कुमार गर्ग, रामनिवास शर्मा, बाबूराम मित्तल, आरपी गर्ग, वेद मंगल, रविन्द्र चौधरी इत्यादि का मोतियों की माला एवं अंगवस्त्र द्वारा सभा की तरफ से अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रधान सुरेंद्र मित्तल, प्रवीण जैन, विनोद जैन, रवींद्र जैन, संजीव जैन आदि का योगदान रहा।