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रतिया के 49 आंगनबाड़ी केंद्रों में से 44 चल रहे किराये के कमरों में
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आंगनबाड़ी केंद्र के छोटे कमरे में बच्चों के साथ कार्यकर्ता।
- फोटो : Fatehabad
रतिया। केंद्र और प्रदेश सरकार की ओर से शिक्षा को लेकर बनाई जा रही नई-नई नीतियां बुनियादी ढांचे की कमी के कारण कागजों से बाहर नहीं निकल पा रही है। शिक्षा की बुनियाद को ही मजबूत करने के लिए अभी बड़े सुधार की गुंजाइश है। बुनियादी ढांचे की कमजोर नींव की बानगी इसमें देखने को मिल रही है कि रतिया शहर के 17 वार्डों में 49 आंगनबाड़ी केंद्र बने हुए हैं, लेकिन इनमें से 44 किराये के छोटे-छोटे कमरों में चल रहे हैं। मात्र पांच ही आंगनबाड़ी केंद्र प्राइमरी स्कूलों में संचालित हैं। यहां तक कि महिला एवं बाल विकास विभाग का कार्यालय भी एक कॉलोनी की गलियों में किराये पर चल रहा है।
प्राइमरी स्कूलों में चलने वाले केंद्रों की हालत भी खस्ता
प्राइमरी स्कूलों के अतिरिक्त पड़े कमरों में चल रहे पांच आंगनबाड़ी केंद्रों की हालत भी कोई ज्यादा बेहतर नहीं है। इनमें कुछ की हालत तो इतनी खस्ता है कि बारिश के दिनों में इनमें पानी भर जाता है। इस कारण या तो केंद्रों बंद रखना पड़ता है या फिर सामान बांटने के बाद बच्चों को घर भेज दिया जाता है।
पंजीकरण 3 हजार बच्चों का, आते हैं 2 हजार
शहर के इन 49 आंगनबाड़ी केंद्रों पर करीब तीन हजार बच्चों का पंजीकरण हुआ है। मगर प्रति माह दो हजार बच्चों की ही आंगनबाड़ी केंद्रों में हाजिरी होती है। ज्यादा बच्चे आने पर आंगनबाड़ी केंद्र में बैठने के लिए जगह भी पर्याप्त नहीं रहती है।
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जहां बैठने की जगह, वहीं रखना पड़ता है सामान
44 आंगनबाड़ी केंद्रों में से अधिकतर केंद्र छोटे-छोटे कमरों में चल रहे हैं। इन्हीं कमरों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बच्चों को बिठाने व सामान रखने की व्यवस्था करनी पड़ती है। कमरे छोटे होने की सबसे बड़ी वजह यह भी है कि प्रदेश सरकार द्वारा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को केंद्रों के किराये के रूप में मात्र 500 रुपये महीना मिलते हैं। शहर में मात्र 500 रुपये में कमरा पाना मुश्किल हो जाता है। कुछ केंद्र तो ऐसे हैं, जिनका किराया एक हजार रुपये तक भी हैं। बाकी पैसा आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अपनी जेब से देती हैं।
केस नंबर एक
यहां बरामदे में रखना पड़ता है बच्चों के लिए आया सामान
महिला एवं बाल विकास विभाग का कार्यालय भी एक कॉलोनी में किराये पर चल रहा है। एक मकान में बना विभाग का उपमंडल स्तर का कार्यालय कमरे कम होने की वजह से नाकाफी साबित होता है। कार्यालय में आया बच्चों के राशन व अन्य सामान कर्मचारियों को बरामदे में ही रखने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
केस नंबर दो
दो फुट नीचे कमरा, आगे बरामदा कच्चा
शहर के वार्ड नंबर 4 में महात्मा गांधी स्कूल में चल रहे आंगनबाड़ी केंद्र की हालत काफी खस्ता है। जिन कमरों में आंगनबाड़ी केंद्र चल रहा है, उनमें पहले महात्मा गांधी स्कूल की कक्षा लगती थी। स्कूल में साथ पड़ी जगह पर नए कमरे बनाए गए तो उक्त कमरे में आंगनबाड़ी केंद्र बना दिया गया। आंगनबाड़ी केंद्र का कमरा अन्य कमरों से दो फुट नीचे हैं। आगे बरामदे का फर्श भी कच्चा है। जब बारिश आती है तो केंद्र में पानी भर जाता है।
केस नंबर तीन
छत भी खस्ता हालत
शहर के खंड शिक्षा कार्यालय में बने आंगनबाड़ी केंद्र की छत भी खस्ता हालत में हैं। जब भी बारिश होती है तो छत पर पानी जमा हो जाता है और बूंद-बूंद टपकता रहता है। इससे बच्चों से लेकर आंगनबाड़ी में आने वाली महिलाओं को भी परेशानी उठानी पड़ती है।
केंद्रों के हालात के बारे में जानकारी नहीं
सीडीपीओ लता मेहता के छुट्टी पर जाने पर मुझे कुछ दिन पूर्व ही अतिरिक्त कार्यभार दिया गया है। आंगनबाड़ी केंद्रों के हालात के बारे में जानकारी नहीं है। रतिया शहर के 44 आंगनबाड़ी केंद्र किराए पर जरूर चल रहे हैं। इन केंद्रों पर जाकर उनके हालातों को देखकर उनकी रिपोर्ट तैयार करेंगी।
-सुमन काठपाल, कार्यवाहक सीडीपीओ, रतिया
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प्राइमरी स्कूलों में चलने वाले केंद्रों की हालत भी खस्ता
प्राइमरी स्कूलों के अतिरिक्त पड़े कमरों में चल रहे पांच आंगनबाड़ी केंद्रों की हालत भी कोई ज्यादा बेहतर नहीं है। इनमें कुछ की हालत तो इतनी खस्ता है कि बारिश के दिनों में इनमें पानी भर जाता है। इस कारण या तो केंद्रों बंद रखना पड़ता है या फिर सामान बांटने के बाद बच्चों को घर भेज दिया जाता है।
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पंजीकरण 3 हजार बच्चों का, आते हैं 2 हजार
शहर के इन 49 आंगनबाड़ी केंद्रों पर करीब तीन हजार बच्चों का पंजीकरण हुआ है। मगर प्रति माह दो हजार बच्चों की ही आंगनबाड़ी केंद्रों में हाजिरी होती है। ज्यादा बच्चे आने पर आंगनबाड़ी केंद्र में बैठने के लिए जगह भी पर्याप्त नहीं रहती है।
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जहां बैठने की जगह, वहीं रखना पड़ता है सामान
44 आंगनबाड़ी केंद्रों में से अधिकतर केंद्र छोटे-छोटे कमरों में चल रहे हैं। इन्हीं कमरों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बच्चों को बिठाने व सामान रखने की व्यवस्था करनी पड़ती है। कमरे छोटे होने की सबसे बड़ी वजह यह भी है कि प्रदेश सरकार द्वारा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को केंद्रों के किराये के रूप में मात्र 500 रुपये महीना मिलते हैं। शहर में मात्र 500 रुपये में कमरा पाना मुश्किल हो जाता है। कुछ केंद्र तो ऐसे हैं, जिनका किराया एक हजार रुपये तक भी हैं। बाकी पैसा आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अपनी जेब से देती हैं।
केस नंबर एक
यहां बरामदे में रखना पड़ता है बच्चों के लिए आया सामान
महिला एवं बाल विकास विभाग का कार्यालय भी एक कॉलोनी में किराये पर चल रहा है। एक मकान में बना विभाग का उपमंडल स्तर का कार्यालय कमरे कम होने की वजह से नाकाफी साबित होता है। कार्यालय में आया बच्चों के राशन व अन्य सामान कर्मचारियों को बरामदे में ही रखने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
केस नंबर दो
दो फुट नीचे कमरा, आगे बरामदा कच्चा
शहर के वार्ड नंबर 4 में महात्मा गांधी स्कूल में चल रहे आंगनबाड़ी केंद्र की हालत काफी खस्ता है। जिन कमरों में आंगनबाड़ी केंद्र चल रहा है, उनमें पहले महात्मा गांधी स्कूल की कक्षा लगती थी। स्कूल में साथ पड़ी जगह पर नए कमरे बनाए गए तो उक्त कमरे में आंगनबाड़ी केंद्र बना दिया गया। आंगनबाड़ी केंद्र का कमरा अन्य कमरों से दो फुट नीचे हैं। आगे बरामदे का फर्श भी कच्चा है। जब बारिश आती है तो केंद्र में पानी भर जाता है।
केस नंबर तीन
छत भी खस्ता हालत
शहर के खंड शिक्षा कार्यालय में बने आंगनबाड़ी केंद्र की छत भी खस्ता हालत में हैं। जब भी बारिश होती है तो छत पर पानी जमा हो जाता है और बूंद-बूंद टपकता रहता है। इससे बच्चों से लेकर आंगनबाड़ी में आने वाली महिलाओं को भी परेशानी उठानी पड़ती है।
केंद्रों के हालात के बारे में जानकारी नहीं
सीडीपीओ लता मेहता के छुट्टी पर जाने पर मुझे कुछ दिन पूर्व ही अतिरिक्त कार्यभार दिया गया है। आंगनबाड़ी केंद्रों के हालात के बारे में जानकारी नहीं है। रतिया शहर के 44 आंगनबाड़ी केंद्र किराए पर जरूर चल रहे हैं। इन केंद्रों पर जाकर उनके हालातों को देखकर उनकी रिपोर्ट तैयार करेंगी।
-सुमन काठपाल, कार्यवाहक सीडीपीओ, रतिया