Haryana: कर्ण कोट टीले से मिली ऐतिहासिक मणि, रोशनी में अंगारे सी दिखती है, समुद्र में पाई जाती हैं ऐसी मणियां
गांव के शोधार्थी ने मणि खोजने का दावा किया है। एक सींग वाले हिरण की टेराकोटा की मूर्ति के भी अवशेष मिले हैं। पुरातत्व विभाग इस मणि व टेराकोटा को अपने संरक्षण में लेगा। ऐसी मणियां समुद्र में मिलती हैं।
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हरियाणा के फतेहाबाद के गांव भट्टू बुआन में कर्ण कोट टीले से ऐतिहासिक महत्व की मणि मिली है। मणि को अगर लाइट दिखाई जाए तो यह अंगारे की तरह दिखाई देती है। इस प्रकार की मणियां अक्सर समुद्र में मिलती हैं। माना जा रहा है कि पौराणिक काल में इसे यहां पर व्यापार के जरिये लाया गया था।
वहीं, यहां पर एक सींग वाले हिरण की टेराकोटा प्रतिकृति भी मिली है। गांव के शोधार्थी एवं सेफ्टी इंजीनियर अजय कुमार ने इसकी जानकारी पुरातत्व विभाग को दी है। विभाग की टीम अब यहां पर आकर इन अवशेषों को अपने कब्जे में लेगी।
फतेहाबाद के भूना के पास स्थित गांव भट्टू बुआन के कर्ण कोट टीले में शोध के दौरान शोधार्थी अजय कुमार को समुद्र से निकलने वाली गेरूआ रंग की मणि मिली है। मणि को प्रकाश में रखने पर ये आग की अलग-अलग झलक दिखलाती है। कई बार यह अंगारे की तरह जलती दिखाई देती है, तो कई बार इसमें त्रिकोणीय संरचनाएं उभरती हैं, जो इसको अति दुर्लभ बनाती हैं।
ज्ञात रहे कि फतेहाबाद में हाकड़ा से लेकर हड़प्पा तक की सभ्यताओं के अवशेष मिल चुके हैं। गांव भिरड़ाना में हाकड़ा व हड़प्पा, बनावाली व कुनाल में हड़प्पा संस्कृति के अवशेष मिल चुके हैं। उस समय समुद्र के जरिये व्यापार किया जाता था, फतेहाबाद के आसपास के क्षेत्र में कहीं भी समुद्र नहीं है।
ऐसे में माना जा रहा है कि यह मणि व्यापार के माध्यम से यहां लाई गई थी, क्योंकि उस समय इन मणियों को संभ्रात लोग माला आदि पहनने के लिए प्रयोग करते थे। इसी कर्ण कोट टीले पर एक सींग वाले हिरण की टेराकोटा मूर्ति भी मिली है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय मिट्टी से मूर्तियां आदि बनाने का ज्ञान लोगों को था।
सात साल पहले हुई थी खोज
शोधार्थी अजय कुमार का दावा है कि जब उन्हें गांव से कुछ दूरी पर खेतों में बिखरे हुए पत्थर और कंकाल के अंश मिले तो फिर उन्होंने खुद ही इस पर शोध करना शुरू कर दिया था। इसके बाद कई चीजें मिली। इनमें कुछ चीजें तीन हजार साल पुरानी थीं, जो कुषाण वंश व गुप्तवंश काल की थी। अजय ने पुरातत्व विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया तो पुरातत्व विभाग की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. बुनानी भट्टाचार्य अपनी टीम के साथ आठ माह पहले मौके पर आईं। इसके बाद उन्होंने भी यह माना कि यह वस्तुएं तीन हजार साल पहले की हैं।
कर्ण कोट टीले से मिला एक सींग वाले हिरण का टेराकोटा।
माना जाता है कि यहां पर करनाल के राजा कर्ण का किला था, जिस कारण इसको कर्ण कोट टीले के नाम से जाना जाता है। अजय ने बताया कि यहां पर मिली पुरातत्व महत्व की चीजों को पुरातत्व विभाग की टीम को सौंप दिया है। वहीं, विभाग की टीम ने अजय को जिम्मेदारी दी है कि वह इस जगह की देखरेख करें और अन्य कोई चीज मिले तो उन्हें अवगत करवाते रहें।
मौर्य काल, कुषाण, गुप्तवंश तथा मुगल काल के मिल चुके हैं अवशेष
सेफ्टी इंजीनियर अजय कुमार ने बताया कि यहां एक वॉटर चैनल काफी घेरे में बना हुआ है। यहीं एक कुआं भी है, जो काफी वर्ष पुराना है। संगमरमर के लाल पत्थर के टुकड़े मिले थे, जो दिल्ली के लाल किले के निर्माण में प्रयोग हुआ है। कुषाण समय का एक पत्थर ऐसा है, जो फर्श को चिकना बनाने के लिए प्रयोग होता है। जो चीजें पुरातत्व विभाग को सौंपी गई हैं, वह मौर्य काल, कुषाण, गुप्तवंश तथा मुगल काल के अवशेष हैं। अजय कुमार ने बताया कि यहां संकेत है कि यह महानगर वैदिक काल से अस्तित्व में था, जो सरस्वती नदी के तट पर स्थापित था।
गांव भट्टू से शोधार्थी अजय ने मुझे जानकारी दी है कि यहां पर ऐतिहासिक महत्व की मणि मिली है, जो अपने आप में अलग है। यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साइट है। यहां पर अक्सर पौराणिक महत्व की वस्तुएं मिलती रहती हैं। इस साइट को जल्द ही पुरातत्व विभाग अपने संरक्षण में लेगा और खुदाई का काम शुरू किया जाएगा। -डॉ.बुनानी भट्टाचार्य, उप निदेशक, पुरातत्व विभाग, हरियाणा