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किसान आंदोलन का असर, फ्लॉप रहा कृषि विभाग का जिला स्तरीय मेला
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मेले के दौरान स्टाल लगाकर किसानों के इंतजार में बैठे कर्मचारी।
- फोटो : Fatehabad
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की ओर से वीरवार को पंचायत भवन में लगाया गया जिला स्तरीय किसान मेला पूरी तरह से फ्लॉप रहा। जिला स्तरीय मेले में 200 किसान भी नहीं पहुंचे। प्रदर्शनी में अलग-अलग स्टाल लगाने वाले भी किसानों के इंतजार में अधिकांश समय खाली बैठे रहे। किसानों की इतनी संख्या भी नहीं रही कि मंच से बोलने वाले वक्ताओं को सुनने के लिए सामने लगी कुर्सियां भर जाएं।
दरअसल, हर वर्ष कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा जिला स्तरीय किसान मेले का आयोजन किया जाता है ताकि किसानों को कृषि क्षेत्र की नई-नई तकनीकों व मशीनरियों की जानकारी दी जा सके। मेले में आए कुछेक किसान भी तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन को मेले के फ्लॉप होने का कारण मान रहे हैं। हालांकि, अधिकारी खुलकर कुछ नहीं बोले, लेकिन दबी जुबान में उन्होंने भी आंदोलन को ही मेले में किसानों की कम संख्या का कारण बताया।
किसान बोले- पराली की गांठें न उठाने से सब्सिडी का नहीं मिल रहा फायदा
मेले में आए कुछ किसानों ने बताया कि प्रदेश सरकार द्वारा पराली को लेकर सब्सिडी तो दी जा रही है। मगर पराली की गांठें नहीं उठाए जाने के कारण इसका कोई फायदा किसानों को नहीं मिल रहा है। पराली का बेहतर विकल्प सरकार को देना चाहिए ताकि किसी भी किसान को पराली न जलानी पड़े। किसानों ने कहा कि पराली प्रबंधन के उपकरणों की सुविधा भी कुछ ही किसानों को मिल पाती है।
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कोट
कृषि विभाग द्वारा लगाए किसान मेले में पहुंचे हैं लेकिन किसान आंदोलन का असर जरूर नजर आया है। जितनी संख्या में किसानों को इस मेले में पहुंचना चाहिए था, उतनी संख्या किसानों की नहीं रही।
निर्मल सिंह, किसान।
कोट
तीन कृषि कानूनों को लेकर किसानों में बड़ी नाराजगी है। इसलिए सरकारी कार्यक्रमों में भी किसानों की उपस्थित नाममात्र ही नजर आती है। जिला स्तर के मेले में किसानों की हाजिरी नाममात्र सी ही रही है।
राकेश कुमार, किसान।
कोट
किसान मेले में करीब 700 किसान पहुंचे थे। किसानों का आना-जाना लगा रहा। काफी किसानों के पास समय का भी अभाव रहता है। इसलिए कुछ किसान थोड़े समय के लिए पहुंचे। यह कार्यक्रम किसानों को नई जानकारियां देने के लिए था। ऐसे कार्यक्रमों को राजनीति से नहीं जोड़ देखना चाहिए।
-राजेश सिहाग, कृषि उप निदेशक।
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दरअसल, हर वर्ष कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा जिला स्तरीय किसान मेले का आयोजन किया जाता है ताकि किसानों को कृषि क्षेत्र की नई-नई तकनीकों व मशीनरियों की जानकारी दी जा सके। मेले में आए कुछेक किसान भी तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन को मेले के फ्लॉप होने का कारण मान रहे हैं। हालांकि, अधिकारी खुलकर कुछ नहीं बोले, लेकिन दबी जुबान में उन्होंने भी आंदोलन को ही मेले में किसानों की कम संख्या का कारण बताया।
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किसान बोले- पराली की गांठें न उठाने से सब्सिडी का नहीं मिल रहा फायदा
मेले में आए कुछ किसानों ने बताया कि प्रदेश सरकार द्वारा पराली को लेकर सब्सिडी तो दी जा रही है। मगर पराली की गांठें नहीं उठाए जाने के कारण इसका कोई फायदा किसानों को नहीं मिल रहा है। पराली का बेहतर विकल्प सरकार को देना चाहिए ताकि किसी भी किसान को पराली न जलानी पड़े। किसानों ने कहा कि पराली प्रबंधन के उपकरणों की सुविधा भी कुछ ही किसानों को मिल पाती है।
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कृषि विभाग द्वारा लगाए किसान मेले में पहुंचे हैं लेकिन किसान आंदोलन का असर जरूर नजर आया है। जितनी संख्या में किसानों को इस मेले में पहुंचना चाहिए था, उतनी संख्या किसानों की नहीं रही।
निर्मल सिंह, किसान।
कोट
तीन कृषि कानूनों को लेकर किसानों में बड़ी नाराजगी है। इसलिए सरकारी कार्यक्रमों में भी किसानों की उपस्थित नाममात्र ही नजर आती है। जिला स्तर के मेले में किसानों की हाजिरी नाममात्र सी ही रही है।
राकेश कुमार, किसान।
कोट
किसान मेले में करीब 700 किसान पहुंचे थे। किसानों का आना-जाना लगा रहा। काफी किसानों के पास समय का भी अभाव रहता है। इसलिए कुछ किसान थोड़े समय के लिए पहुंचे। यह कार्यक्रम किसानों को नई जानकारियां देने के लिए था। ऐसे कार्यक्रमों को राजनीति से नहीं जोड़ देखना चाहिए।
-राजेश सिहाग, कृषि उप निदेशक।

कृषि विभाग के मेले में खाली पड़ीं कुर्सियां।- फोटो : Fatehabad