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Fatehabad News: पैतृक घर पहुंच तस्वीरों में खो गईं बेटी दुर्गा
Mon, 02 Feb 2026 11:34 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
Updated Mon, 02 Feb 2026 11:34 PM IST
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गांव पीलीमंदोरी में स्थित पंडित जसराज के पैतृक घर में प्रवेश करती दुर्गा जसराज। संवाद
फतेहाबाद। पद्म विभूषण पंडित जसराज के निधन के बाद सोमवार को पहली बार उनकी पुत्री दुर्गा जसराज पैतृक गांव पीलीमंदोरी पहुंचीं। पिता की जन्मस्थली की मिट्टी को नमन कर वे भावुक हो गईं और पिता की यादों को संजोया। पंडित जसराज के बड़े भाई मनीराम पंडित का परिवार गांव में ही रहता है। दुर्गा ने चचेरे भाई रामकुमार पंडित और उनकी पत्नी-बच्चों से मिलकर परिवार का हालचाल पूछा।
रामकुमार के साथ दुर्गा गांव में मुख्य रोड से करीब पांच सौ मीटर अंदर एक तंग गली में बने डेढ़ सौ गज के पैतृक मकान में पहुंची। इसी घर में पंडित जसराज का जन्म हुआ था। घर की दीवारों पर सजीं स्मृतियों के बीच उनकी नजर लगभग 95 वर्ष पुरानी तस्वीर पर पड़ी। इसमें नन्हें जसराज अपने पिता पंडित मोतीराम की गोद में बैठे नजर आ रहे हैं। इस तस्वीर को देखकर दुर्गा गदगद हो उठीं और पिता के बचपन को याद किया। बडे़ कौतुहल से वे तस्वीर में नजर आ रहे एक-एक व्यक्ति के बारे में पूछतीं रहीं। परिवार के लोगों ने किसी को बुआ तो किसी को ताऊ-ताई, चाचा बताया। दुर्गा ने उस समय को भी याद किया जब वो पिता के साथ पहली बार गांव आईं थीं। इस बार पिता के बिना गांव आना उन्हें भावुक कर गया। भजन गायक अनूप जलोटा को संस्मरण सुनाते हुए दुर्गा ने कहा कि बापूजी ने कहा था कि जब-जब पीलीमंदोरी जाओ, सबसे पहले गांव की मिट्टी को प्रणाम करना।
जिस कमरे में पिता का जन्म हुआ, वहां माथा टेका
दुर्गा उस कमरे में गईं, जहां पंडित जसराज का जन्म हुआ था। सबसे पहले कमरे के फर्श पर माथा टेककर नमन किया। इस कमरे में लगीं पिता की तस्वीरों को देर तक निहारती रहीं। दुर्गा यहां पर करीब 20 मिनट तक रुकीं। दुर्गा ने कहा कि उनसे खुशकिस्मत कोई और नहीं हो सकता था, क्योंकि पंडित जसराज पिता के साथ-साथ उनके गुरु भी रहे हैं। गांव पीलीमंदोरी में उनकी जड़ें हैं और वो इनसे जुड़कर बहुत खुश हैं। उन्होंने पिता की शास्त्रीय विरासत को सहेजने के लिए मुख्यमंत्री नायब सैनी और प्रदेश सरकार का आभार जताया।
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गांव से 300 वर्षों का नाता
रामकुमार ने बताया कि उनके परिवार का इस गांव से गहरा संबंध रहा है। उनका परिवार पिछले 300 वर्षों से पीलीमंदोरी का निवासी है। दादा पंडित मोतीराम हैदराबाद के निजाम के गवैये थे। चाचा जसराज 1925 के आसपास गांव छोड़कर हैदराबाद चले गए थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हैदराबाद के एक प्राइमरी स्कूल में हुई। वे केवल कक्षा दो तक ही शिक्षा ले पाए, लेकिन संगीत उनके रग-रग में बसा था। हमारी कई पीढ़ियों का संगीत के साथ खानदानी जुड़ाव रहा है, जिसने विश्व स्तर पर पहचान दिलाई है।
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पंडित जसराज मां सरस्वती के सच्चे बेटे : अनूप जलोटा
भजन गायक अनूप जलोटा सबसे पहले दुर्गा जसराज के साथ पंडित जसराज के पैतृक घर पहुंचे। उन्होंने कहा कि पंडित जसराज मां सरस्वती के सच्चे बेटे हैं। जिस तरह हरियाणा की धरती पर भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया, उसी तरह पंडित जसराज ने यहां जन्म लेकर दुनिया को संगीत का उपदेश दिया। उनके पैतृक घर आकर खुद को धन्य महसूस कर रहा हूं और अपने आप में अलौकिक अनुभव है। पुरानी यादें ताजा करते हुए उन्होंने कहा कि पंडित जसराज मुझे प्यार से जवाईं राजा कहते थे क्योंकि मेरी पत्नी ने कुछ समय तक उनसे शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण की थी। ऐसे में सारी जिंदगी उनके साथ आत्मीय संबंध बना रहा।
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बड़े भाई मणिराम थे जसराज के पहले गुरु
पंडित जसराज को दुनिया सुरों के सम्राट और महान शास्त्रीय संगीत गायक के रूप में जानती है, लेकिन बेहद कम लोगों को यह मालूम है कि उनका पहला प्यार तबला वादन था। वो तबला वादन की औपचारिक शिक्षा शुरू कर चुके थे, लेकिन किस्मत उन्हें गायकी की ओर ले आई। कठोर रियाज और गुरु-शिष्य परंपरा में मिली शिक्षा ने उनकी आवाज को एक अलग पहचान दी। उनकी गायकी में भक्ति, शुद्धता और भावनाओं की गहराई साफ झलकती थी। उनके बड़े भाई पंडित मणिराम ने उन्हें संगीत की बारीकियां सिखाईं। हालांकि प्रारंभिक शिक्षा पिता मोतीराम ने ही दी।
जसरंगी जुगलबंदी ने दिलाई अलग पहचान
पंडित जसराज मेवाती घराने के महान गायक थे। उनके द्वारा रचित ‘जसरंगी’ जुगलबंदी संगीत जगत को अनोखी देन है। इसमें महिला और पुरुष गायक अलग-अलग रागों में एक साथ गायन करते हैं, जो शास्त्रीय संगीत में एक नया प्रयोग माना गया।
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अंतिम बार 2014 में आए थे पैतृक घर
पंडित जसराज बहुत छोटी उम्र में ही गांव छोड़कर हैदराबाद चले गए थे। इसके बाद संगीत की दुनिया में कदम बढ़ाते हुए जसराज से पद्म विभूषण पंडित जसराज हो गए। वे 2014 में गांव आए थे। इस दौरान ही उनके पिता मोतीराम के नाम पर लाइब्रेरी स्थापित की गई। इसके बाद उनका अपने गांव में आना नही हो सका। 17 अगस्त 2020 में अमेरिका में उन्होंने आखिरी सांस ली।
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ग्रामीणों ने साझा किए अनुभव
पंडित जसराज मेरे पड़ोसी रहे हैं। मेरे पिता के साथ उनका बचपन का नाता रहा है। वे जब भी मुंबई से गांव में आते थे तो मेरे पिता के साथ समय बिताते थे। गांव में आकर वह देसी खान पान और रीति-रिवाजों के बारे में पूछते थे। - सुभाष डूडी, ग्रामीण
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चार भाइयों में सबसे छोटे पंडित जसराज मेरे चाचा थे। वे परिवार में और गांव के विशेष कार्यक्रमों में आते रहे हैं। हमारा पैतृक काम गाना बजाना रहा है। पंडित जसराज के कारण ही हमारे परिवार की पहचान है। परिवार अब भी संगीत के साथ जुड़ा हुआ है। - रामकुमार, भतीजा
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गांव में जन्मे पंडित जसराज के नाम पर बने पुस्तकालय में मूर्ति अनावरण किया है। उनकी वजह से पीलीमंदोरी की पहचान विश्व तक है। उनका व्यवहार नर्म और मिलनसार था। मैं उनसे कई बार मिला। जब गांव में आते थे तो लोगों से जरूर मिलते थे। - ताराचंद ग्रामीण
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हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि पंडित जसराज का जन्म इस गांव में हुआ। उनके नाम से गांव में पार्क, पुस्तकालय पहले है। अब मूर्ति अनावरण करवाया गया है। उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनके नाम से समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहेंगे। - धर्मवीर गोरछिया
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रामकुमार के साथ दुर्गा गांव में मुख्य रोड से करीब पांच सौ मीटर अंदर एक तंग गली में बने डेढ़ सौ गज के पैतृक मकान में पहुंची। इसी घर में पंडित जसराज का जन्म हुआ था। घर की दीवारों पर सजीं स्मृतियों के बीच उनकी नजर लगभग 95 वर्ष पुरानी तस्वीर पर पड़ी। इसमें नन्हें जसराज अपने पिता पंडित मोतीराम की गोद में बैठे नजर आ रहे हैं। इस तस्वीर को देखकर दुर्गा गदगद हो उठीं और पिता के बचपन को याद किया। बडे़ कौतुहल से वे तस्वीर में नजर आ रहे एक-एक व्यक्ति के बारे में पूछतीं रहीं। परिवार के लोगों ने किसी को बुआ तो किसी को ताऊ-ताई, चाचा बताया। दुर्गा ने उस समय को भी याद किया जब वो पिता के साथ पहली बार गांव आईं थीं। इस बार पिता के बिना गांव आना उन्हें भावुक कर गया। भजन गायक अनूप जलोटा को संस्मरण सुनाते हुए दुर्गा ने कहा कि बापूजी ने कहा था कि जब-जब पीलीमंदोरी जाओ, सबसे पहले गांव की मिट्टी को प्रणाम करना।
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जिस कमरे में पिता का जन्म हुआ, वहां माथा टेका
दुर्गा उस कमरे में गईं, जहां पंडित जसराज का जन्म हुआ था। सबसे पहले कमरे के फर्श पर माथा टेककर नमन किया। इस कमरे में लगीं पिता की तस्वीरों को देर तक निहारती रहीं। दुर्गा यहां पर करीब 20 मिनट तक रुकीं। दुर्गा ने कहा कि उनसे खुशकिस्मत कोई और नहीं हो सकता था, क्योंकि पंडित जसराज पिता के साथ-साथ उनके गुरु भी रहे हैं। गांव पीलीमंदोरी में उनकी जड़ें हैं और वो इनसे जुड़कर बहुत खुश हैं। उन्होंने पिता की शास्त्रीय विरासत को सहेजने के लिए मुख्यमंत्री नायब सैनी और प्रदेश सरकार का आभार जताया।
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गांव से 300 वर्षों का नाता
रामकुमार ने बताया कि उनके परिवार का इस गांव से गहरा संबंध रहा है। उनका परिवार पिछले 300 वर्षों से पीलीमंदोरी का निवासी है। दादा पंडित मोतीराम हैदराबाद के निजाम के गवैये थे। चाचा जसराज 1925 के आसपास गांव छोड़कर हैदराबाद चले गए थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हैदराबाद के एक प्राइमरी स्कूल में हुई। वे केवल कक्षा दो तक ही शिक्षा ले पाए, लेकिन संगीत उनके रग-रग में बसा था। हमारी कई पीढ़ियों का संगीत के साथ खानदानी जुड़ाव रहा है, जिसने विश्व स्तर पर पहचान दिलाई है।
पंडित जसराज मां सरस्वती के सच्चे बेटे : अनूप जलोटा
भजन गायक अनूप जलोटा सबसे पहले दुर्गा जसराज के साथ पंडित जसराज के पैतृक घर पहुंचे। उन्होंने कहा कि पंडित जसराज मां सरस्वती के सच्चे बेटे हैं। जिस तरह हरियाणा की धरती पर भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया, उसी तरह पंडित जसराज ने यहां जन्म लेकर दुनिया को संगीत का उपदेश दिया। उनके पैतृक घर आकर खुद को धन्य महसूस कर रहा हूं और अपने आप में अलौकिक अनुभव है। पुरानी यादें ताजा करते हुए उन्होंने कहा कि पंडित जसराज मुझे प्यार से जवाईं राजा कहते थे क्योंकि मेरी पत्नी ने कुछ समय तक उनसे शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण की थी। ऐसे में सारी जिंदगी उनके साथ आत्मीय संबंध बना रहा।
बड़े भाई मणिराम थे जसराज के पहले गुरु
पंडित जसराज को दुनिया सुरों के सम्राट और महान शास्त्रीय संगीत गायक के रूप में जानती है, लेकिन बेहद कम लोगों को यह मालूम है कि उनका पहला प्यार तबला वादन था। वो तबला वादन की औपचारिक शिक्षा शुरू कर चुके थे, लेकिन किस्मत उन्हें गायकी की ओर ले आई। कठोर रियाज और गुरु-शिष्य परंपरा में मिली शिक्षा ने उनकी आवाज को एक अलग पहचान दी। उनकी गायकी में भक्ति, शुद्धता और भावनाओं की गहराई साफ झलकती थी। उनके बड़े भाई पंडित मणिराम ने उन्हें संगीत की बारीकियां सिखाईं। हालांकि प्रारंभिक शिक्षा पिता मोतीराम ने ही दी।
जसरंगी जुगलबंदी ने दिलाई अलग पहचान
पंडित जसराज मेवाती घराने के महान गायक थे। उनके द्वारा रचित ‘जसरंगी’ जुगलबंदी संगीत जगत को अनोखी देन है। इसमें महिला और पुरुष गायक अलग-अलग रागों में एक साथ गायन करते हैं, जो शास्त्रीय संगीत में एक नया प्रयोग माना गया।
अंतिम बार 2014 में आए थे पैतृक घर
पंडित जसराज बहुत छोटी उम्र में ही गांव छोड़कर हैदराबाद चले गए थे। इसके बाद संगीत की दुनिया में कदम बढ़ाते हुए जसराज से पद्म विभूषण पंडित जसराज हो गए। वे 2014 में गांव आए थे। इस दौरान ही उनके पिता मोतीराम के नाम पर लाइब्रेरी स्थापित की गई। इसके बाद उनका अपने गांव में आना नही हो सका। 17 अगस्त 2020 में अमेरिका में उन्होंने आखिरी सांस ली।
ग्रामीणों ने साझा किए अनुभव
पंडित जसराज मेरे पड़ोसी रहे हैं। मेरे पिता के साथ उनका बचपन का नाता रहा है। वे जब भी मुंबई से गांव में आते थे तो मेरे पिता के साथ समय बिताते थे। गांव में आकर वह देसी खान पान और रीति-रिवाजों के बारे में पूछते थे। - सुभाष डूडी, ग्रामीण
चार भाइयों में सबसे छोटे पंडित जसराज मेरे चाचा थे। वे परिवार में और गांव के विशेष कार्यक्रमों में आते रहे हैं। हमारा पैतृक काम गाना बजाना रहा है। पंडित जसराज के कारण ही हमारे परिवार की पहचान है। परिवार अब भी संगीत के साथ जुड़ा हुआ है। - रामकुमार, भतीजा
गांव में जन्मे पंडित जसराज के नाम पर बने पुस्तकालय में मूर्ति अनावरण किया है। उनकी वजह से पीलीमंदोरी की पहचान विश्व तक है। उनका व्यवहार नर्म और मिलनसार था। मैं उनसे कई बार मिला। जब गांव में आते थे तो लोगों से जरूर मिलते थे। - ताराचंद ग्रामीण
हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि पंडित जसराज का जन्म इस गांव में हुआ। उनके नाम से गांव में पार्क, पुस्तकालय पहले है। अब मूर्ति अनावरण करवाया गया है। उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनके नाम से समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहेंगे। - धर्मवीर गोरछिया

गांव पीलीमंदोरी में स्थित पंडित जसराज के पैतृक घर में प्रवेश करती दुर्गा जसराज। संवाद