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संकट में सांसें... अब भी नहीं जागे तो फिर कब जागेंगे

Wed, 28 Apr 2021 11:04 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Wed, 28 Apr 2021 11:04 PM IST
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Breathe in distress ... if you don't wake up then when will you wake up
हर रोज खबरें आ रही हैं कि ऑक्सीजन की कमी है, कोरोना मरीज मर रहे हैं। अब समझना चाहिए कि जीवन में ऑक्सीजन के मायने क्या हैं। मगर विडंबना है कि हम अब भी हरियाली की कीमत नहीं समझ पा रहे हैं। संकट के दौर में भी नहीं सीख रहे, अब भी खेतों में विपरीत हालात देखे जा सकते हैं।
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फसलों की कटाई हो चुकी है। अब किसान फसलों के अवशेष जला रहे हैं, साथ में पेड़ भी झुलस रहे हैं। न किसान कुछ सोच रहे, न सिस्टम में बैठे अधिकारियों को कोई परवाह। कभी विकास के नाम पर तो कभी लापरवाही की वजह से, हरियाली को यूं ही खत्म किया जा रहा है। दरअसल, जिले में वन क्षेत्र लगातार घट रहा है। आंकड़ों के अनुसार तीन दशक पहले जिले में 23 प्रतिशत वन क्षेत्र था, लेकिन अब मात्र 0.85 वन क्षेत्र बचा है। पहले खेत कम थे, पेड़ ज्यादा थे। तीस साल में लोगों ने खेती के लिए जमीनें तैयार कर लीं, लेकिन पेड़ खत्म होते गए। संवाद
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विकास के नाम पर कटे हजारों पेड़
वर्ष 2015 में दिल्ली से डबवाली तक फोरलेन बना। तब सिरसा व फतेहाबाद जिले में 120 किलोमीटर तक 39 हजार पेड़ काटे। मिनी बाईपास के निर्माण के दौरान हिसार रोड से सिरसा रोड तक 1300 पेड़ काटे गए। कई अन्य विकास परियोजनाओं के लिए दस साल में 32 हजार पेड़ काटे जा चुके हैं। अब पानीपत से भूना से रतिया होते हुए सरदूलगढ़ तक एक्सप्रेस-वे बनाया जाएगा। इसके लिए जिले में 3000 पेड़ और कटने की आशंका है।
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हर साल 2 से 3 करोड़ खर्च
वन विभाग द्वारा लगाए गए एक पौधे पर करीब 200 रुपये खर्च आता है। विभाग इतने रुपये में पौधा लगाने के साथ तीन साल तक देखभाल भी करता है। प्रत्येक वर्ष पौधे लगाने पर दो से तीन करोड़ रुपये बजट आता है। इस बजट से नए पौधे लगाए जाने के साथ गत वर्ष लगाए पौधों में पानी की व्यवस्था की जाती है। इसके साथ ट्री गार्ड भी इस बजट के तहत लगते हैं। गत वर्ष वन विभाग ने जिले में साढ़े चार लाख पौधे लगाए। वहीं, करीब एक हजार ट्री गार्ड लगाए गए हैं।
जिले की स्थिति
कुल क्षेत्रफल : 2538 वर्ग किलोमीटर
सघन वन : 3 किलोमीटर
खुला वन क्षेत्र :18 वर्ग किलोमीटर
कुल वन क्षेत्र : 21 वर्ग किलोमीटर
प्रतिशत : 0.84
जमींदारों ने भी पहुंचाया हरियाली को नुकसान
तीन दशक पहले जिले में करीब 23 प्रतिशत वन क्षेत्र था। सरकारी पेड़ कम और किसानों के निजी पेड़ ज्यादा थे। मगर खेती को बेहतर बनाने के लिए किसानों ने पेड़ काट दिए। अब धान के क्षेत्र में पेड़ों की संख्या न के समान है। दूर तक मैदान नजर आते हैं। भट्टूकलां क्षेत्र में थोड़े बहुत पेड़ बचे हैं। आज वन क्षेत्र एक प्रतिशत भी नहीं है। इसके अलावा काफी नुकसान फसलों के अवशेष जलाने से हो जाता है।
इसे विकास नहीं कह सकते : कड़वासरा
वन्य जीवों व पर्यावरण संरक्षण क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कड़वासरा का कहना है कि चारों तरफ बन रही इमारतों को देखकर हम सोचते हैं कि विकास हो रहा है। इसे विकास नहीं कहा जा सकता। खत्म होती हरियाली बताती है कि यह विकास पर्यावरण के लिए घातक है। पर्यावरण के साथ बुरा बर्ताव हुआ है। अब सिर्फ नहरों व सड़कों के किनारे पेड़ बचे हैं, वो भी बहुत कम हैं।
शुद्ध वायु में ऑक्सीजन
नाइट्रोजन गैस : 78 प्रतिशत
ऑक्सीजन गैस : 21 प्रतिशत
अन्य गैसें : 1 प्रतिशत
20 से 25 प्रतिशत जंगल चाहिए : ग्रोवर
हमारे जिले की आबादी, क्षेत्रफल व अन्य परिस्थितियों को देखते हुए लगभग 20 से 25 वन क्षेत्र चाहिए। इसके लिए पौधरोपण काफी नहीं, पेड़ों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी।

- डॉ. महेंद्र ग्रोवर, प्रधानाचार्य, वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, अहरवां।
आमजन का सहयोग जरूरी : डीएफओ
वन विभाग जिले में हर साल करीब पांच लाख पौधे लगाता है। लाखों रुपये पौधों की देखरेख पर खर्च होते हैं। लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता की कमी के कारण पेड़ों को क्षति पहुंचती है। पर्यावरण संरक्षण में आमजन का सहयोग बहुत जरूरी है।
- राजेश माथुर, जिला वन अधिकारी।
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