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ये बागवां है... यहां बुजुर्गों को याद आ जाते हैं बचपन के दिन
ब्यूरो/अमर उजाला फतेहाबाद
Updated Sun, 01 Nov 2015 11:05 PM IST
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कहने को तो ये ईंट पत्थर की चारदीवारी है लेकिन इसके अंदर का हरेक शख्स एक दूसरे का रिश्तेदार नहीं है। बावजूद इसके आपस में एक ऐसा रिश्ता है जो शायद बरसों का रिश्तेदार भी न रखे।
ये बागवां की सच्चाई है। हमारे समाज की कड़वी सच्चाई। भारत विकास परिषद एवं बागवां प्रबंधक कमेटी का एक बेहतरीन प्रयास भी है। बिना उनके प्रयत्नों के शायद ये बुजुर्ग घुट-घुट कर जीने को मजबूर हो जाते।
लेकिन अब एक दूसरे का दुख साझे करते हैं, खुशियां मिलकर मनाते हैं। माजरा रोड पर ओल्ड डे केयर होम-बागवां रिटायरमेंट के बाद के एकाकी जीवन बिताने वाले बुजुर्गों के लिए भारत विकास परिषद का एक बेहतरीन प्रयास साबित हुआ है।
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ऐसे अस्तित्व में आया था बागवां
बागवां प्रबंधक कमेटी के सदस्य कुशल चराईपौत्रा की माने तो बागवां की नींव एक उर्दू के रद्दी अखबार के कारण पड़ी। दरअसल लगभग 10 साल पहले कुशल एवं उनके दोस्त विजय मेहता शहर में अपने एक जानकार की दुकान पर बैठे थे।
अचानक एक वृद्ध उस दुकान पर आए और उर्दू का एक अखबार वहां देकर पिछले दिन का उर्दू अखबार वहां से ले गए। इसे देखकर जिज्ञासावश विजय ने इस बारे पूछा तो दुकानदार ने बताया कि उक्त सज्जन शहर के एक संपन्न घर के बुजुर्ग हैं।
लेकिन उनका परिवार उनके लिए एक अखबार तक का इंतजाम करने से इंकार चुका है। ऐसे में उक्त बुजुर्ग और उनके साथ के दो-तीन और वृद्ध इस प्रकार से आपस में अखबार बांटकर पढ़ते हैं।
इस वाक्ये के साथ सामने आया बागवां का सपना। शुरुआती चरण में बागवां को भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा लेकिन अच्छे लोगों का साथ मिलने से बागवां का सपना 9 साल पहले साकार हुआ।
सुंदरनगर में आर्य समाज के भवन में बागवां-द ओल्ड डे केयर होम की स्थापना की गई। लगभग दो साल इस भवन में बिताने के बाद बागवां का अगला ठिकाना बना, जगजीवनपुरा में पड़ा एक खाली भवन, जिसे उस भवन के मालिक रवि चौधरी एवं उनके परिवार ने बागवां को बिना किराए के दे दिया।
इस भवन में आने के बाद ही बागवां के अपने खुद के भवन का सपना देखा गया। भारत विकास परिषद के सदस्यों एवं बागवां प्रबंधक कमेटी के अथक प्रयासों से आखिरकार 18 अक्तूबर को माजरा रोड पर सीपीएस कमल गुप्ता ने बागवां के खुद के भवन का शुभारंभ किया।
ये सुविधाएं मिलती हैं बुजुर्गों को
बागवां में बुजुर्गों को वो सभी सुविधाएं मिलती हैं जिनका सरोकार उनसे है। इसमें अखबार, दवाइयां, समय बिताने को साथी आदि शामिल हैं।
इसके अलावा प्रबंधक कमेटी एवं शहर के सहयोग से यहां आने वाले प्रत्येक बुजुर्ग को दो वक्त की चाय एवं एक वक्त का खाना मुहैया करवाया जाता है। इसके अलावा शहर के प्रसिद्ध डाक्टर अब इसमें नियमित चिकित्सा शिविर लगाते हैं।
जिला सेशन जज माह में एक बार यहां आकर बुजुर्गों की समस्याएं सुनते हैं और उनका निपटारा करते हैं। इन सबके अलावा जो एक सुविधा यहां आने वाले हर बुजुर्ग को सबसे अधिक पसंद आती है, वो है यहां मिलने वाले साथी।
घरों में एक कोने में रहने वाले बुजुर्ग इस चारदीवारी में आकर खुद को बच्चों सा महसूस करते हैं क्योंकि सबको दोस्त मिला है।
ये है भविष्य की योजनाएं
1. महिलाओं के लिए सिलाई सेंटर खोलने की योजना
2. आस पास की गरीब बच्चों की मुफ्त पढ़ाई के लिए शैक्षणिक कार्य शुरू करना
3. फिलहाल महज जांच कैंप लगते हैं, आगे जाकर दवाइयां भी उपलब्ध करवाना
ये है जरूरत
1. सिलाई सेंटर के लिए जगह तो है लेकिन पत्थर आदि लगाने के लिए आर्थिक संसाधनों की जरूरत
2. गरीब बच्चों की पढ़ाई का प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए आर्थिक संसाधनों की कमी
3. जांच कैंप के लिए चिकित्सक फीस नहीं लेते, लेकिन दवाइयों के लिए आर्थिक संसाधनों की जरूरत
अपने बुजुर्गों को एक वृद्धाश्रम में भेजना एक गलत परंपरा है। उन बुजुर्गों का क्या, जिनके परिजन इस परंपरा को ही जीना चाहते हैं।
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ये बागवां की सच्चाई है। हमारे समाज की कड़वी सच्चाई। भारत विकास परिषद एवं बागवां प्रबंधक कमेटी का एक बेहतरीन प्रयास भी है। बिना उनके प्रयत्नों के शायद ये बुजुर्ग घुट-घुट कर जीने को मजबूर हो जाते।
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लेकिन अब एक दूसरे का दुख साझे करते हैं, खुशियां मिलकर मनाते हैं। माजरा रोड पर ओल्ड डे केयर होम-बागवां रिटायरमेंट के बाद के एकाकी जीवन बिताने वाले बुजुर्गों के लिए भारत विकास परिषद का एक बेहतरीन प्रयास साबित हुआ है।
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ऐसे अस्तित्व में आया था बागवां
बागवां प्रबंधक कमेटी के सदस्य कुशल चराईपौत्रा की माने तो बागवां की नींव एक उर्दू के रद्दी अखबार के कारण पड़ी। दरअसल लगभग 10 साल पहले कुशल एवं उनके दोस्त विजय मेहता शहर में अपने एक जानकार की दुकान पर बैठे थे।
अचानक एक वृद्ध उस दुकान पर आए और उर्दू का एक अखबार वहां देकर पिछले दिन का उर्दू अखबार वहां से ले गए। इसे देखकर जिज्ञासावश विजय ने इस बारे पूछा तो दुकानदार ने बताया कि उक्त सज्जन शहर के एक संपन्न घर के बुजुर्ग हैं।
लेकिन उनका परिवार उनके लिए एक अखबार तक का इंतजाम करने से इंकार चुका है। ऐसे में उक्त बुजुर्ग और उनके साथ के दो-तीन और वृद्ध इस प्रकार से आपस में अखबार बांटकर पढ़ते हैं।
इस वाक्ये के साथ सामने आया बागवां का सपना। शुरुआती चरण में बागवां को भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा लेकिन अच्छे लोगों का साथ मिलने से बागवां का सपना 9 साल पहले साकार हुआ।
सुंदरनगर में आर्य समाज के भवन में बागवां-द ओल्ड डे केयर होम की स्थापना की गई। लगभग दो साल इस भवन में बिताने के बाद बागवां का अगला ठिकाना बना, जगजीवनपुरा में पड़ा एक खाली भवन, जिसे उस भवन के मालिक रवि चौधरी एवं उनके परिवार ने बागवां को बिना किराए के दे दिया।
इस भवन में आने के बाद ही बागवां के अपने खुद के भवन का सपना देखा गया। भारत विकास परिषद के सदस्यों एवं बागवां प्रबंधक कमेटी के अथक प्रयासों से आखिरकार 18 अक्तूबर को माजरा रोड पर सीपीएस कमल गुप्ता ने बागवां के खुद के भवन का शुभारंभ किया।
ये सुविधाएं मिलती हैं बुजुर्गों को
बागवां में बुजुर्गों को वो सभी सुविधाएं मिलती हैं जिनका सरोकार उनसे है। इसमें अखबार, दवाइयां, समय बिताने को साथी आदि शामिल हैं।
इसके अलावा प्रबंधक कमेटी एवं शहर के सहयोग से यहां आने वाले प्रत्येक बुजुर्ग को दो वक्त की चाय एवं एक वक्त का खाना मुहैया करवाया जाता है। इसके अलावा शहर के प्रसिद्ध डाक्टर अब इसमें नियमित चिकित्सा शिविर लगाते हैं।
जिला सेशन जज माह में एक बार यहां आकर बुजुर्गों की समस्याएं सुनते हैं और उनका निपटारा करते हैं। इन सबके अलावा जो एक सुविधा यहां आने वाले हर बुजुर्ग को सबसे अधिक पसंद आती है, वो है यहां मिलने वाले साथी।
घरों में एक कोने में रहने वाले बुजुर्ग इस चारदीवारी में आकर खुद को बच्चों सा महसूस करते हैं क्योंकि सबको दोस्त मिला है।
ये है भविष्य की योजनाएं
1. महिलाओं के लिए सिलाई सेंटर खोलने की योजना
2. आस पास की गरीब बच्चों की मुफ्त पढ़ाई के लिए शैक्षणिक कार्य शुरू करना
3. फिलहाल महज जांच कैंप लगते हैं, आगे जाकर दवाइयां भी उपलब्ध करवाना
ये है जरूरत
1. सिलाई सेंटर के लिए जगह तो है लेकिन पत्थर आदि लगाने के लिए आर्थिक संसाधनों की जरूरत
2. गरीब बच्चों की पढ़ाई का प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए आर्थिक संसाधनों की कमी
3. जांच कैंप के लिए चिकित्सक फीस नहीं लेते, लेकिन दवाइयों के लिए आर्थिक संसाधनों की जरूरत
अपने बुजुर्गों को एक वृद्धाश्रम में भेजना एक गलत परंपरा है। उन बुजुर्गों का क्या, जिनके परिजन इस परंपरा को ही जीना चाहते हैं।