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Haryana: जेल में बंद विधायक को भी मिला टिकट; ऐसे उम्मीदवारों के नामांकन-प्रचार से मतदान तक के क्या हैं नियम?
Mon, 09 Sep 2024 07:37 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Mon, 09 Sep 2024 07:37 PM IST
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जेल से चुनाव लड़ने पर कानूनी दांव-पेंच
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
हरियाणा में इस वक्त चुनावी प्रक्रिया चल रही है। राज्य में नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यहां की 90 सीटों के लिए 5 अक्तूबर को मतदान कराया जाएगा। उधर भाजपा, कांग्रेस, आप समेत तमाम अन्य दल अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर रहे हैं।राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने अब तक 41 प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। इन 41 में से एक नाम ऐसा भी है जो फिलहाल जेल में बंद है। कांग्रेस ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किए गए विधायक सुरेंद्र पंवार को टिकट दिया है। पंवार जेल में रहकर ही चुनाव लड़ेंगे और उनके परिवार वालों ने प्रचार अभियान भी शुरू कर दिया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि सुरेंद्र पंवार का मामला क्या है? क्या कोई जेल में रहकर चुनाव लड़ सकता है? जेल से नामांकन कैसे दाखिल होता है? इसकी प्रकिया क्या है? इस पर अदालत का क्या रुख है?
सुरेंद्र पंवार का मामला क्या है?
कांग्रेस ने 7 सितंबर की रात को हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए 31 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी की। इस सूची में सोनीपत के विधायक सुरेंद्र पंवार को भी पार्टी ने टिकट दिया। इसी साल 20 जुलाई को उन्हें खनन मामले में ईडी ने गिरफ्तार किया था। सुरेंद्र पंवार फिलहाल जेल में बंद हैं। प्रत्याशी बनाए जाने के बाद शनिवार (7 सितंबर) को हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष उदयभान ने सुरेंद्र पंवार के परिवर से मुलाकात कर टिकट सौंपा। इस दौरान प्रदेश अध्यक्ष ने सुरेंद्र का टिकट उनकी बहू समीक्षा पंवार को सौंपा। अब समीक्षा ने अपने ससुर के लिए चुनाव अभियान भी शुरू कर दिया है।
कांग्रेस ने 7 सितंबर की रात को हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए 31 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी की। इस सूची में सोनीपत के विधायक सुरेंद्र पंवार को भी पार्टी ने टिकट दिया। इसी साल 20 जुलाई को उन्हें खनन मामले में ईडी ने गिरफ्तार किया था। सुरेंद्र पंवार फिलहाल जेल में बंद हैं। प्रत्याशी बनाए जाने के बाद शनिवार (7 सितंबर) को हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष उदयभान ने सुरेंद्र पंवार के परिवर से मुलाकात कर टिकट सौंपा। इस दौरान प्रदेश अध्यक्ष ने सुरेंद्र का टिकट उनकी बहू समीक्षा पंवार को सौंपा। अब समीक्षा ने अपने ससुर के लिए चुनाव अभियान भी शुरू कर दिया है।
...तो क्या कोई जेल में रहकर चुनाव लड़ सकता है?
इस सवाल है जवाब हां है। सबसे ताजा उदाहरण 2024 का लोकसभा चुनाव है जहां दो उम्मीदवार ऐसे थे जो जेल में रहकर चुनाव लड़े और जीते भी। पंजाब की खडूर साहिब लोकसभा सीट पर असम के डिब्रूगढ़ की जेल में बंद खालिस्तानी अलगाववादी अमृतपाल सिंह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीता। वहीं, जम्मू कश्मीर की बारामूला सीट से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद अब्दुल रशिद ने जीत दर्ज की। निर्दलीय रशिद ने जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को हराया।
2024 लोकसभा चुनाव से पहले भी देश के इतिहास में कई उदाहरण रहे हैं, जब जेल में रहते हुए भी लोगों ने चुनाव लड़ा और जीते। आपातकाल काल के दौरान जॉर्ज फर्नांडिस सहित कई विपक्षी नेताओं को जेल में रखा गया था। फर्नांडिस ने जेल से ही 1977 का लोकसभा चुनाव लड़ा और बिहार के मुजफ्फरपुर निर्वाचन सीट से जीते। इसके अलावा, मुख्तार अंसारी, कल्पनाथ राय, मोहम्मद शहाबुद्दीन, अखिल गोगोई, आजम खान भी इसी सूची में शामिल हैं।
भारत में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, देश में चुनावों से जुड़ा प्राथमिक कानून है। कानून की धारा 8(3) के अनुसार, किसी जुर्म के लिए दोषी ठहराया गया और कम से कम दो साल के कारावास की सजा पाया कोई भी व्यक्ति को रिहा होने के बाद छह साल तक चुनाव नहीं लड़ सकता। हालांकि, यह प्रावधान उन विचाराधीन कैदियों पर लागू नहीं होता है जिन्हें दोषी नहीं ठहराया गया है। अब सोनीपत के विधायक सुरेंद्र पंवार का मामला देखें तो उन्हें अभी दोषी नहीं ठहराया गया है। इसलिए, वह अन्य लोगों की तरह 2024 का हरियाणा विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं।
इस सवाल है जवाब हां है। सबसे ताजा उदाहरण 2024 का लोकसभा चुनाव है जहां दो उम्मीदवार ऐसे थे जो जेल में रहकर चुनाव लड़े और जीते भी। पंजाब की खडूर साहिब लोकसभा सीट पर असम के डिब्रूगढ़ की जेल में बंद खालिस्तानी अलगाववादी अमृतपाल सिंह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीता। वहीं, जम्मू कश्मीर की बारामूला सीट से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद अब्दुल रशिद ने जीत दर्ज की। निर्दलीय रशिद ने जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को हराया।
2024 लोकसभा चुनाव से पहले भी देश के इतिहास में कई उदाहरण रहे हैं, जब जेल में रहते हुए भी लोगों ने चुनाव लड़ा और जीते। आपातकाल काल के दौरान जॉर्ज फर्नांडिस सहित कई विपक्षी नेताओं को जेल में रखा गया था। फर्नांडिस ने जेल से ही 1977 का लोकसभा चुनाव लड़ा और बिहार के मुजफ्फरपुर निर्वाचन सीट से जीते। इसके अलावा, मुख्तार अंसारी, कल्पनाथ राय, मोहम्मद शहाबुद्दीन, अखिल गोगोई, आजम खान भी इसी सूची में शामिल हैं।
भारत में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, देश में चुनावों से जुड़ा प्राथमिक कानून है। कानून की धारा 8(3) के अनुसार, किसी जुर्म के लिए दोषी ठहराया गया और कम से कम दो साल के कारावास की सजा पाया कोई भी व्यक्ति को रिहा होने के बाद छह साल तक चुनाव नहीं लड़ सकता। हालांकि, यह प्रावधान उन विचाराधीन कैदियों पर लागू नहीं होता है जिन्हें दोषी नहीं ठहराया गया है। अब सोनीपत के विधायक सुरेंद्र पंवार का मामला देखें तो उन्हें अभी दोषी नहीं ठहराया गया है। इसलिए, वह अन्य लोगों की तरह 2024 का हरियाणा विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं।
जेल में बंद प्रत्याशी पर्चा कैसे भरता है?
नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए, उम्मीदवार या उसके प्रस्तावक को नामांकन दस्तावेजों के साथ रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) के समक्ष व्यक्तिगत रूप से मौजूद होना होगा। सुरेंद्र पंवार के मामले में, उनका नामांकन जिला निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में उनके वकील या परिजन दाखिल कर सकते हैं।
नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए, उम्मीदवार या उसके प्रस्तावक को नामांकन दस्तावेजों के साथ रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) के समक्ष व्यक्तिगत रूप से मौजूद होना होगा। सुरेंद्र पंवार के मामले में, उनका नामांकन जिला निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में उनके वकील या परिजन दाखिल कर सकते हैं।
जेल से प्रचार किया जा सकता है क्या?
जेल में बंद व्यक्ति अपने या अपनी पार्टी के लिए प्रचार नहीं कर सकता। हालांकि, वह अपनी पार्टी के सदस्यों के जरिए अपने संदेश पहुंचा सकता है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62(5) में कहा गया है कि कानूनी रूप से कैद या पुलिस हिरासत में रहने वाला व्यक्ति मतदान नहीं कर सकता।
इसी साल 1 मई को दिल्ली उच्च न्यायालय ने चुनाव अधिकार से जुड़ी एक जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया था। याचिका में निर्वाचन आयोग को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि वह एक तंत्र विकसित करे, जिससे नेता और उम्मीदवार उचित प्रतिबंधों के साथ वर्चुअल प्रचार कर सकें।
याचिका पर अदालत ने कहा था, 'हम हिरासत में लिए गए किसी व्यक्ति को प्रचार करने की अनुमति नहीं दे सकते। अन्यथा, सभी बलात्कारी, हत्यारे चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक दल बनाना शुरू कर देंगे।'
अब सोनीपत विधायक सुरेंद्र पंवार के मामले की बात करें तो इसमें उनकी बहू समीक्षा पंवार पिता सुरेंद्र के प्रचार का जिम्मा संभालेंगी।
जेल में बंद व्यक्ति अपने या अपनी पार्टी के लिए प्रचार नहीं कर सकता। हालांकि, वह अपनी पार्टी के सदस्यों के जरिए अपने संदेश पहुंचा सकता है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62(5) में कहा गया है कि कानूनी रूप से कैद या पुलिस हिरासत में रहने वाला व्यक्ति मतदान नहीं कर सकता।
इसी साल 1 मई को दिल्ली उच्च न्यायालय ने चुनाव अधिकार से जुड़ी एक जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया था। याचिका में निर्वाचन आयोग को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि वह एक तंत्र विकसित करे, जिससे नेता और उम्मीदवार उचित प्रतिबंधों के साथ वर्चुअल प्रचार कर सकें।
याचिका पर अदालत ने कहा था, 'हम हिरासत में लिए गए किसी व्यक्ति को प्रचार करने की अनुमति नहीं दे सकते। अन्यथा, सभी बलात्कारी, हत्यारे चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक दल बनाना शुरू कर देंगे।'
अब सोनीपत विधायक सुरेंद्र पंवार के मामले की बात करें तो इसमें उनकी बहू समीक्षा पंवार पिता सुरेंद्र के प्रचार का जिम्मा संभालेंगी।
क्या जेल में बंद लोग मतदान कर सकते हैं?
चुनाव प्रचार के साथ इस पर भी रोक है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 62(5) कहती है, 'कोई भी व्यक्ति किसी भी चुनाव में मतदान नहीं करेगा यदि वह किसी जेल में बंद है, चाहे वह कारावास या निर्वासन या अन्यथा की सजा के तहत हो, या पुलिस की कानूनी हिरासत में हो।'
इसके अलावा देश की सर्वोच्च अदालत ने कई फैसलों के जरिए स्पष्ट किया है कि चुनाव लड़ने का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है, न कि मौलिक या सामान्य कानूनी अधिकार।
चुनाव प्रचार के साथ इस पर भी रोक है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 62(5) कहती है, 'कोई भी व्यक्ति किसी भी चुनाव में मतदान नहीं करेगा यदि वह किसी जेल में बंद है, चाहे वह कारावास या निर्वासन या अन्यथा की सजा के तहत हो, या पुलिस की कानूनी हिरासत में हो।'
इसके अलावा देश की सर्वोच्च अदालत ने कई फैसलों के जरिए स्पष्ट किया है कि चुनाव लड़ने का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है, न कि मौलिक या सामान्य कानूनी अधिकार।