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आधुनिक भाग-दौड़ में पीछे छूट रहीं परंपराएं
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चरखी दादरी।
आधुनिकता के साथ सब कुछ बदल रहा है। पहले कट्टों में कौथली का सामान आता था जबकि अब ऐसा नजर नहीं आता। पहले सावन शुरू होते ही महिलाएं मीठ्ठी तो कर दै री मां या कौथली, लैके जाणी बाहण कै.... जैसे गीत गाने शुरू कर देते थे और बड़े चाव से झूले झूलती थीं। लेकिन अब ऐसा नहीं है। सावन के गीत और झूले तो जैसे गायब ही हो गए हैं। यह कहना है कि रावलधी निवासी बुजुर्ग महिलाओं का। अमर उजाला की ओर से अपराजिता के तहत रावलधी में पुराने और अब के सावन में आए बदलाव पर संवाद आयोजित किया गया। इसमें 60 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं ने भाग लेकर पहले के सावन के अपने अनुभव सांझा किए। पेश है संवाद कार्यक्रम पर एक रिपोर्ट....
- समय के साथ बदलीं परंपराएं, शक्कर पारा और कसार कौथली से हुए गायब
- आधुनिक जमाने में सावन मास पर्व मनाने के तरीके ही बदल गए हैं। रीति-रिवाजों में भी आज बदलाव देखने को मिल रहे हैं। लोगों को अपनी संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए। पहले सावन लगते ही हलचल शुरू हो जाती थी, लेकिन अब न सावन के गीत रहे हैं और न ही वो महिलाओं के झूले।
किताबो देवी, 60 वर्ष
- अब पहले की तरह सावन के गीत नहीं गाए जाते और न ही लोगों में वो चाव रहा है। आधुनिकता के साथ आए बदलाव ने त्योहार मनाने की उमंग को फीका कर दिया है। अब सावन कब आकर चला जाता है, पता तक नहीं चलता। जबकि पहले सावन लगते ही गीतों की गूंज सुनाई देने लगती थी।
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जदई देवी, 61 वर्ष
- सावन की हरियाली तो निराली एवं अलग ही होती है लेकिन पुराने जमाने की तरह सावन पर्व को लेकर अब उल्लास नजर नहीं आता। पुरानी परंपरा एवं रिवाज नहीं रहे। धार्मिक पर्व मनाने के तौर-तरीके भी आज बदल गए हैं। आज पेड़ों के साथ झूले ही गायब हैं। कौथली का अब चाव नहीं रहा।
कमला देवी, 62 वर्ष
- पहले पूरे सावन मास में गीत गाए जाते थे। आपस में मेल-मिलाप होता था। लोग एक-दूसरे के काम में हाथ बंटाते थे। तीज पर्व आज पुरानी यादों तक ही सिमट कर रह गया है। हरियाणवी संस्कृति से युवा पीढ़ी पीछे हटती जा रही है। हमें अपनी संस्कृति को कभी भूलना नहीं चाहिए।
कमला, 61 वर्ष
- पहले कौथली कट्टों में आती थी। जिसमें शक्कर पारा, सुहाली, कसार, मीठे गुलगुले व चूरमा समेत अन्य पकवान होते थे, लेकिन आज कौथली से ये चीजें गायब ही हो चुकी हैं। आजकल कौथली में मिठाई, चॉकलेट और आइस्क्रीम आती है। पहले महिलाओं को सावन का चाव रहता था और वो इंतजार करती थीं।
गिंदोडी देवी, 65 वर्ष
- सावन में अब पहले जैसी बात नहीं है। पहले हर घर और चौक में बच्चे और महिलाएं झूला झूलते थे लेकिन अब इक्का-दुक्का झूला ही नजर आता है। न महिलाओं में वो उल्लस रहा है। पहले की कौथली की तो बात ही अगल थी। मेरी नजर मैं अब सावन नाम का रह गया है।
वेदकौर, 63 वर्ष
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आधुनिकता के साथ सब कुछ बदल रहा है। पहले कट्टों में कौथली का सामान आता था जबकि अब ऐसा नजर नहीं आता। पहले सावन शुरू होते ही महिलाएं मीठ्ठी तो कर दै री मां या कौथली, लैके जाणी बाहण कै.... जैसे गीत गाने शुरू कर देते थे और बड़े चाव से झूले झूलती थीं। लेकिन अब ऐसा नहीं है। सावन के गीत और झूले तो जैसे गायब ही हो गए हैं। यह कहना है कि रावलधी निवासी बुजुर्ग महिलाओं का। अमर उजाला की ओर से अपराजिता के तहत रावलधी में पुराने और अब के सावन में आए बदलाव पर संवाद आयोजित किया गया। इसमें 60 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं ने भाग लेकर पहले के सावन के अपने अनुभव सांझा किए। पेश है संवाद कार्यक्रम पर एक रिपोर्ट....
- समय के साथ बदलीं परंपराएं, शक्कर पारा और कसार कौथली से हुए गायब
- आधुनिक जमाने में सावन मास पर्व मनाने के तरीके ही बदल गए हैं। रीति-रिवाजों में भी आज बदलाव देखने को मिल रहे हैं। लोगों को अपनी संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए। पहले सावन लगते ही हलचल शुरू हो जाती थी, लेकिन अब न सावन के गीत रहे हैं और न ही वो महिलाओं के झूले।
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किताबो देवी, 60 वर्ष
- अब पहले की तरह सावन के गीत नहीं गाए जाते और न ही लोगों में वो चाव रहा है। आधुनिकता के साथ आए बदलाव ने त्योहार मनाने की उमंग को फीका कर दिया है। अब सावन कब आकर चला जाता है, पता तक नहीं चलता। जबकि पहले सावन लगते ही गीतों की गूंज सुनाई देने लगती थी।
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जदई देवी, 61 वर्ष
- सावन की हरियाली तो निराली एवं अलग ही होती है लेकिन पुराने जमाने की तरह सावन पर्व को लेकर अब उल्लास नजर नहीं आता। पुरानी परंपरा एवं रिवाज नहीं रहे। धार्मिक पर्व मनाने के तौर-तरीके भी आज बदल गए हैं। आज पेड़ों के साथ झूले ही गायब हैं। कौथली का अब चाव नहीं रहा।
कमला देवी, 62 वर्ष
- पहले पूरे सावन मास में गीत गाए जाते थे। आपस में मेल-मिलाप होता था। लोग एक-दूसरे के काम में हाथ बंटाते थे। तीज पर्व आज पुरानी यादों तक ही सिमट कर रह गया है। हरियाणवी संस्कृति से युवा पीढ़ी पीछे हटती जा रही है। हमें अपनी संस्कृति को कभी भूलना नहीं चाहिए।
कमला, 61 वर्ष
- पहले कौथली कट्टों में आती थी। जिसमें शक्कर पारा, सुहाली, कसार, मीठे गुलगुले व चूरमा समेत अन्य पकवान होते थे, लेकिन आज कौथली से ये चीजें गायब ही हो चुकी हैं। आजकल कौथली में मिठाई, चॉकलेट और आइस्क्रीम आती है। पहले महिलाओं को सावन का चाव रहता था और वो इंतजार करती थीं।
गिंदोडी देवी, 65 वर्ष
- सावन में अब पहले जैसी बात नहीं है। पहले हर घर और चौक में बच्चे और महिलाएं झूला झूलते थे लेकिन अब इक्का-दुक्का झूला ही नजर आता है। न महिलाओं में वो उल्लस रहा है। पहले की कौथली की तो बात ही अगल थी। मेरी नजर मैं अब सावन नाम का रह गया है।
वेदकौर, 63 वर्ष