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भक्ति के लिए कोई उम्र बाधा नहीं : चैतन्य महाराज
Thu, 25 Apr 2024 01:16 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
Updated Thu, 25 Apr 2024 01:16 AM IST
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चरखी दादरी। रंगीला हनुमान मंदिर में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन वृंदावन से स्वामी भुवन चैतन्य महाराज ने सती चरित्र, प्रहलाद चरित्र और वामन अवतार प्रसंगों का वर्णन किया। स्वामी भुवन चैतन्य महाराज ने कहा कि भक्ति के लिए कोई उम्र बाधा नहीं है। भक्ति को बचपन में ही करने की प्रेरणा देनी चाहिए क्योंकि बचपन कच्चे मिट्टी की तरह होता है उसे जैसा चाहे वैसा पात्र बनाया जा सकता है।
स्वामी भुवन चैतन्य महाराज ने कहा कि भगवान शिव की बात नहीं मानने पर सती को पिता के घर पर अपमानित होकर स्वयं को अग्नि में स्वाह होना पड़ा था। इसलिए किसी भी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि जहां जा रहे हैं वहां किसी इष्ट या गुरु का अपमान न हो।
भक्त प्रहलाद की कथा सुनाते हुए व्यास ने कहा कि पिता अगर कुमार्ग पर चले तो पुत्र का कर्तव्य है उसे सही मार्ग पर लाए। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद प्रहलाद ने भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा। भगवान ने नरसिंह रूप में अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध कर अपने परमधाम को पहुंचाया।
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भगवान ध्रुव के सत्कर्मों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ध्रुव की साधना, उनके सत्कर्म ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा के परिणाम स्वरूप ही उन्हें वैकुंठ लोक प्राप्त हुआ। महाराज ने बताया कि संसार में जब-जब पाप बढ़ता है, भगवान धरती पर किसी न किसी रूप में अवतरित होते हैं।
यजमान के रूप में किरण, सतीश वधवा, सतीश सपड़ा, ज्ञानचंद सचदेवा व बद्री प्रसाद गाबा उपस्थित रहे। कार्यक्रम को सफल बनाने में अशोक अरोड़ा, पुष्पा नागपाल, सुमन दुआ, राज कुमारी, अमित मुंजाल, विक्की मुंजाल, हंसराज पटवारी, राम दयाल पाहवा, वासूदेव आनंद, नंदलाल ठुकराल, विजय मदान, अशोक चावला, दीपक सतीजा, ओम प्रकाश मुंजाल, देवेंद्र वधवा, रमेश मुंजाल का सहयोग रहा।
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स्वामी भुवन चैतन्य महाराज ने कहा कि भगवान शिव की बात नहीं मानने पर सती को पिता के घर पर अपमानित होकर स्वयं को अग्नि में स्वाह होना पड़ा था। इसलिए किसी भी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि जहां जा रहे हैं वहां किसी इष्ट या गुरु का अपमान न हो।
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भक्त प्रहलाद की कथा सुनाते हुए व्यास ने कहा कि पिता अगर कुमार्ग पर चले तो पुत्र का कर्तव्य है उसे सही मार्ग पर लाए। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद प्रहलाद ने भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा। भगवान ने नरसिंह रूप में अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध कर अपने परमधाम को पहुंचाया।
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भगवान ध्रुव के सत्कर्मों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ध्रुव की साधना, उनके सत्कर्म ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा के परिणाम स्वरूप ही उन्हें वैकुंठ लोक प्राप्त हुआ। महाराज ने बताया कि संसार में जब-जब पाप बढ़ता है, भगवान धरती पर किसी न किसी रूप में अवतरित होते हैं।
यजमान के रूप में किरण, सतीश वधवा, सतीश सपड़ा, ज्ञानचंद सचदेवा व बद्री प्रसाद गाबा उपस्थित रहे। कार्यक्रम को सफल बनाने में अशोक अरोड़ा, पुष्पा नागपाल, सुमन दुआ, राज कुमारी, अमित मुंजाल, विक्की मुंजाल, हंसराज पटवारी, राम दयाल पाहवा, वासूदेव आनंद, नंदलाल ठुकराल, विजय मदान, अशोक चावला, दीपक सतीजा, ओम प्रकाश मुंजाल, देवेंद्र वधवा, रमेश मुंजाल का सहयोग रहा।