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माओवादियों के साथ हुई मुठभेड़ में मौड़ी निवासी हवलदार वेदप्रकाश शहीद, अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 17 Aug 2021 12:36 AM IST
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Havildar Vedprakash Martyr, resident of Mauri in an encounter with Maoists, crowd gathered in the last journey
शहीद को सलामी देते सैन्य अधिकारी और मौके पर मौजूद लोग। - फोटो : CharkhiDadri
अरूणाचल-प्रदेश में स्वतंत्रता दिवस पर माओवादियों के साथ हुई मुठभेड़ में मौड़ी निवासी हवलदार वेदप्रकाश शहीद हो गए। सोमवार शाम पैतृक गांव में उनकी सैन्य और राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि की गई। वीर जांबाज को विदाई देने जनसैलाब उमड़ा और गांव की गलियां ‘वेदप्रकाश अमर रहे’, ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, वेदप्रकाश तेरा नाम रहेगा...’ के नारों से गूंज गईं। सैन्य और पुलिस टुकड़ी ने मातमी धुन के साथ हवाई फायर कर शहीद को सलामी दी।
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जानकारी के अनुसार मौड़ी निवासी वेद्रपकाश (40) 22 साल पहले सेना की असम राइफल रेजीमेंट-40 में भर्ती हुए थे। सेवा काल के दौरान उनकी तैनाती अरुणाचल प्रदेश में ही रही है। उनके ताऊ का बेटा सोमबीर भी असम राइफल में ही तैनात हैं। परिजनों के अनुसार रविवार सुबह वेदप्रकाश की जहां तैनाती थी, उस पोस्ट पर स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण किया गया था। जवानों के राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देते ही पेट्रोलिंग टीम गश्त के लिए चली गई। हवलदार वेदप्रकाश भी इस पेट्रोलिंग टीम के सदस्य थे। मौसम खराब होने के कारण पहले से घात लगाए बैठे माओवादियों ने पेट्रोलिंग टीम पर फायरिंग कर दी और इसी दौरान एक गोली हवलदार वेदप्रकाश की गर्दन में लगी और वे शहीद हो गए। सोमवार दोपहर करीब तीन बजे शहीद की पार्थिव देह लेकर सैन्य टीम मौड़ी पहुंची। शहादत की सूचना मिलते ही प्रशासनिक अधिकारी भी मौड़ी पहुंचे। देर शाम वहां शहीद की अंत्येष्टि की गई। उनकी अंतिम यात्रा में लोगों का हुजूम उमड़ा। उनके बेटे आशीष (18) और अनुज (15) ने उन्हें मुखाग्नि दी।
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तीन भाइयों में थे बड़े, 1998 में हुए थे भर्ती
शहीद वेदप्रकाश तीन भाइयों में बड़े थे। उन्होंने बारहवीं तक की पढ़ाई गांव के राजकीय स्कूल से की और इसके तुरंत बाद असम राइफल रेजीमेंट 40 में भर्ती हो गए। 1998 में वो बतौर सिपाही भर्ती हुए थे और अब वो हवलदार थे। उनके दो छोटे भाई राकेश और रिंकू गांव में ही रहते हैं और उनका संयुक्त परिवार है।
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पिता बोले: मान से मेरा सिर ऊंचा कर गया बेटा
शहीद वेदप्रकाश के पिता कर्ण सिंह ने कहा कि मेरे परिवार से यह पहली शहादत है और मेरा लाल मेरा सिर मान से ऊंचा कर गया। उन्होंने कहा कि मैंने दिहाड़ी-मजदूरी कर अपने बेटों को पढ़ाया और वेदप्रकाश ने 22 साल पहले सेना में भर्ती होकर मेरी मेहनत को सार्थक कर दिया। उन्होंने कहा कि बेटे के जाने का गम तो बयां नहीं कर सकता, लेकिन बेटे के देश की मिट्टी का कर्ज चुकाने पर सीना फक्र से चौड़ा भी है।
एक माह पहले लौटे थे दो माह की छुट्टी बिताकर
शहीद वेदप्रकाश करीब एक माह पहले ही छुट्टा बिताकर वापस ड्यूटी पर लौटे थे। वो दो माह की छुट्टी आए थे। इतना ही नहीं रविवार सुबह करीब सवा नौ बजे उन्होंने फोन पर पत्नी, बेटों, मां और भाइयों से बात भी की थी। उस दौरान उन्होंने बता था कि पोस्ट पर तिरंगा फहराकर हमने मिठाई बांटी है और अब ड्यूटी पर पेट्रोलिंग के लिए जाना है। घर-परिवार की खैरियत पूछने के बाद उन्होंने फोन रख दिया था।
पत्नी बोली: पति की शहादत पर फक्र, अब छोटे बेटे को करूंगी तैयार
शहीद वेदप्रकाश की पत्नी कविता का कहना है कि उन्हें पति की शहादत पर फक्र है। उनके दो बेटे आशीष और अनुज है। उनका कहना है कि पूरा प्रयास रहेगा कि अब छोटे बेटे अनुज को तैयार कर देशसेवा के लिए सेना में भेजूं। अनुज इस समय बारहवीं कक्षा में है, जबकि बड़े बेटे आशीष की मानसिक हालत ठीक नहीं है और इस कारण उसे पढ़ाई भी बीच में छोड़नी पड़ी।

जिले से 118वीं और मौड़ी से दूसरी शहादत
दादरी जिले से हवलदार वेद्रपकाश की 118वीं शहादत है। उनसे पहले जिले के 117 जाबांज अलग-अलग युद्घों में अपना सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं। वहीं, अगर मौड़ी गांव की बात करें तो यह दूसरी शहादत है। इससे पहले कारगिल युद्ध में गांव का एक वीर शहीद हो चुका है। वेदप्रकाश से पहले जिले के गांव अचीना-बास निवासी गनर भूपेंद्र सिंह ने शहादत दी थी।

   शहीद वेदप्रकाश।  फाइल फोटो

शहीद वेदप्रकाश। फाइल फोटो- फोटो : CharkhiDadri

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