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किशोर को दे सकारात्मक वातावरण: अनिल मलिक
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चरखी दादरी। कम आयु में बाल मन अधिक जिज्ञासु और उतावला हो जाता है। इस उम्र के बच्चों के साथ दोस्ताना और खुशनुमा व्यवहार करना चाहिए। रोहतक मंडल के बाल कल्याण अधिकारी अनिल मलिक ने केएन वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय प्रांगण में आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए ये शब्द कहे।
बाल कल्याण परिषद की ओर से विद्यालय में राज्यस्तरीय 138वें बाल मनोवैज्ञानिक परामर्श केंद्र की स्थापना की गई। इस अवसर पर मंडल अधिकारी ने कहा कि बाल्यावस्था से ही बच्चों में आसपास के वातावरण के प्रति सही समझ विकसित की जानी चाहिए। उनको बताया जाए कि जो भी हमारे साथ हर दिन 24 घंटे घटित हो रहा है, वही हमारा परिवेश है। इसमें मानव जीवन को प्रभावित करने वाले सभी तत्व सम्मिलित होते हैं। आस-पड़ोस, घर परिवार, स्कूल में विद्यार्थी, शिक्षक आदि के परिवेश का सीधा असर बाल मन पर पड़ता है। इस मन को मजबूत बनाना चाहिए, जो कि किसी हालत में घबराए नहीं और बेचैन न हो।
अनिल मलिक ने कहा कि बच्चों की शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण स्थान परिवार का होता है। इसलिए अनौपचारिक शिक्षा के साथ-साथ व्यवहारिक ज्ञान बच्चों को बाल्यावस्था से ही प्रदान करना चाहिए। बच्चों को दूसरों के स्पर्श और उनके हाव-भाव की समझ होगी तो वे आदमी के व्यवहार को जल्दी पकड़ लेंगे और अपनी सुरक्षा कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि बच्चों का मन जिज्ञासु होता है। किशोर अवस्था में हार्मोन परिवर्तन व आसपास की घटनाओं के प्रभाव का असर बच्चों में दिखाई देने लगता है। ऐसे में सही और गलत की समझ विकसित करते हुए उनका मार्गदर्शन करना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि सही समझ, शारीरिक भावनाओं पर नियंत्रण, स्वास्थ्यवर्धक, सहयोगी, प्रोत्साहनवर्धक व पुरस्कृत करने वाले वातावरण के निर्माण से बच्चों के जीवन को सही दिशा में मोड़ा जा सकता है। जिला बाल कल्याण अधिकारी वजीर सिंह दांगी ने कहा कि मनोवैज्ञानिक प्रेरणा शक्ति से बच्चों को सही राह दिखाई जा सकती है। किशोरावस्था के दौरान बच्चों के उज्जवल भविष्य की कार्य योजना समय रहते तैयार की जा सकती है। इस मौके पर स्कूल निदेशक प्रीतम फौगाट, प्राचार्य धर्मेंद्र सांगवान, रोशनी शर्मा आदि मौजूद रहे।
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बाल कल्याण परिषद की ओर से विद्यालय में राज्यस्तरीय 138वें बाल मनोवैज्ञानिक परामर्श केंद्र की स्थापना की गई। इस अवसर पर मंडल अधिकारी ने कहा कि बाल्यावस्था से ही बच्चों में आसपास के वातावरण के प्रति सही समझ विकसित की जानी चाहिए। उनको बताया जाए कि जो भी हमारे साथ हर दिन 24 घंटे घटित हो रहा है, वही हमारा परिवेश है। इसमें मानव जीवन को प्रभावित करने वाले सभी तत्व सम्मिलित होते हैं। आस-पड़ोस, घर परिवार, स्कूल में विद्यार्थी, शिक्षक आदि के परिवेश का सीधा असर बाल मन पर पड़ता है। इस मन को मजबूत बनाना चाहिए, जो कि किसी हालत में घबराए नहीं और बेचैन न हो।
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अनिल मलिक ने कहा कि बच्चों की शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण स्थान परिवार का होता है। इसलिए अनौपचारिक शिक्षा के साथ-साथ व्यवहारिक ज्ञान बच्चों को बाल्यावस्था से ही प्रदान करना चाहिए। बच्चों को दूसरों के स्पर्श और उनके हाव-भाव की समझ होगी तो वे आदमी के व्यवहार को जल्दी पकड़ लेंगे और अपनी सुरक्षा कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि बच्चों का मन जिज्ञासु होता है। किशोर अवस्था में हार्मोन परिवर्तन व आसपास की घटनाओं के प्रभाव का असर बच्चों में दिखाई देने लगता है। ऐसे में सही और गलत की समझ विकसित करते हुए उनका मार्गदर्शन करना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि सही समझ, शारीरिक भावनाओं पर नियंत्रण, स्वास्थ्यवर्धक, सहयोगी, प्रोत्साहनवर्धक व पुरस्कृत करने वाले वातावरण के निर्माण से बच्चों के जीवन को सही दिशा में मोड़ा जा सकता है। जिला बाल कल्याण अधिकारी वजीर सिंह दांगी ने कहा कि मनोवैज्ञानिक प्रेरणा शक्ति से बच्चों को सही राह दिखाई जा सकती है। किशोरावस्था के दौरान बच्चों के उज्जवल भविष्य की कार्य योजना समय रहते तैयार की जा सकती है। इस मौके पर स्कूल निदेशक प्रीतम फौगाट, प्राचार्य धर्मेंद्र सांगवान, रोशनी शर्मा आदि मौजूद रहे।