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साढ़े तीन साल से प्राइवेट केंद्रों पर निर्भर है सरकारी अल्ट्रासाउंड सेवा
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फोटो 01 अल्ट्रासाउंड के लिए निजी केंद्र में रेफर की गई महिला अपने परिजनों के साथ।
- फोटो : CharkhiDadri
चरखी दादरी। सिविल अस्पताल में पिछले साढ़े तीन साल से अल्ट्रासाउंड सुविधा बंद है। स्वास्थ्य विभाग के पास न तो नई अल्ट्रासाउंड मशीन है और न ही अल्ट्रासोनोलॉजिस्ट। विशेषज्ञ की कमी के चलते पुरानी मशीन बंद कमरे में धूल फांक रही है। सेवा बंद होने के बाद ही सरकार अल्ट्रासाउंड सेवा प्राइवेट केंद्रों पर निर्भर है। सेवा बंद होने से लेकर अब तक 12650 गर्भवती महिलाओं को अल्ट्रासाउंड के लिए निजी केंद्रों पर भेजा गया है और इसकी एवज में सरकार करीब 19 लाख से अधिक का भुगतान कर चुकी है।
संवाददाता की पड़ताल में सामने आया कि अल्ट्रासाउंड सुविधा बंद होने के चलते विभाग ने केवल गर्भवती महिलाओं के अल्ट्रासाउंड की ही वैकल्पिक व्यवस्था की हुई है। सिविल अस्पताल से पुरुष मरीजों को रोहतक पीजीआई या भिवानी सिविल अस्पताल रेफर किया जा रहा है। गर्भवती महिलाओं के लिए विभाग ने शहर के निजी केंद्रों से समझौता किया हुआ है। निजी केंद्रों पर निशुल्क अल्ट्रासाउंड करवाने के लिए पहले गर्भवती महिला को जिला अस्पताल से पर्ची बनवाकर लानी पड़ती है और अगले दिन अस्पताल में जाकर रिपोर्ट लेनी पड़ रही है। एक दिन में छह किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करना गर्भवती महिलाओं के लिए आसान नहीं है। वहीं, अब तक करीब 4500 पुरुष मरीज अल्ट्रासाउंड के लिए रोहतक पीजीआई या भिवानी रेफर किए गए हैं।
अल्ट्रासाउंड सुविधा पीएचसी और सीएचसी की बजाय केवल जिला सिविल अस्पताल में ही होती है। पिछले साढ़े तीन साल से सिविल अस्पताल के अल्ट्रासाउंड कक्ष को ताला जड़ा हुआ है। लंबे समय से जिले में अल्ट्रासोनोलॉजिस्ट का पद भी खाली है। इस समय अल्ट्रासाउंड मशीन भी वर्किंग में नहीं है। ऐसे में सिविल अस्पताल में आने वाले सभी मरीज विभाग को रेफर ही करने पड़ रहे हैं।
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अब तक यूं रेफर किए जा चुके हैं 17 हजार से अधिक मरीज
सिविल अस्पताल में प्रतिदिन करीब 25 मरीज अल्ट्रासाउंड कराने पहुंचते हैं। इनमें करीब 15 गर्भवती महिलाएं और बाकी अन्य मरीज होते हैं। एक दिन में सिविल अस्पताल से 15 गर्भवती महिलाओं को निजी केंद्रों पर भेजा जा रहा है। एक माह में अगर 20 कार्य दिवस लगाए तो इनकी संख्या 300 बनती है। साढ़े तीन साल में यह संख्या साढ़े 12 हजार का आंकड़ा पार करती है। इसी प्रकार प्रतिदिन करीब आठ अन्य मरीजों को रोहतक या पीजीआई रेफर किए जाता है और साढ़े तीन साल में इनकी संख्या साढ़े चार हजार पार है।
42 माह से बंद है सेवा, 200 से अधिक डिमांड भेज चुके 9 सीएमओ
पिछले 42 माह से सरकारी अल्ट्रासाउंड सेवा ठप है और तब से ही विभाग निजी केंद्रों से समझौता कर काम चला रहा है। ऐसा नहीं है कि स्थानीय अधिकारियों ने ये सेवा बहाल कराने के प्रयास न किए हो। प्रयास का आलम यह है कि सरकार के पास 9 सीएमओ अपने कार्यकाल में 200 से अधिक डिमांड भेज चुके हैं, लेकिन फिर भी विशेषज्ञ और मशीन की कमी दूर नहीं हुई है।
भागदौड़ से बचने के लिए निजी केंद्रों पर चुकाते हैं 400 रुपये
पुरुष मरीज रोहतक पीजीआई या भिवानी अस्पताल की भागदौड़ करने की बजाय 400 रुपये देकर निजी केंद्रों पर ही अल्ट्रासाउंड करवा लेते हैं। एक निजी अल्ट्रासाउंड की दैनिक ओपीडी 80 से 100 तक पहुंच जाती है।
यूं चुकाए निजी केंद्रों को 18 लाख
सूत्रों के अनुसार स्वास्थ्य विभाग का निजी केंद्रों से एक गर्भवती महिला का अल्ट्रासाउंड 150 रुपये में करने का समझौता चल रहा है। एक माह में करीब 300 गर्भवती महिलाएं सिविल अस्पताल से निजी केंद्रों पर भेजी जाती हैं और इस लिहाज से इनके अल्ट्रासाउंड के लिए सरकार प्रतिमाह 45 हजार खर्च वहन करती है। पिछले 42 माह में इस लिहाज से सरकार 18 लाख से अधिक का भुगतान कर चुकी है।
डिप्टी सीएम के आदेश भी नहीं चढ़ेे सिरे
गत फरवरी में डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने चरखी दादरी पहुंचकर अधिकारियों की बैठक ली थी। उस दौरान उन्होंने पुरानी अल्ट्रासाउंड के मौजूदा हालात की रिपोर्ट तैयार कर भेजने के आदेश दिए थे। अल्ट्रासोनोलॉजिस्ट के बिना स्वास्थ्य विभाग अल्ट्रासाउंड कक्ष का ताला नहीं खोल सकते हैं। ऐसे में विशेषज्ञ की कमी डिप्टी सीएम के आदेश सिरे चढ़ाने में आड़े आ रही है।
अधिकारी बोले
विशेषज्ञ न होने के चलते अल्ट्रासाउंड सेवा बंद है और निजी केंद्रों से टाइअप कर काम चलाया जा रहा है। गर्भवती महिलाओं को सिविल अस्पताल से निजी केंद्रों पर भेजा जा रहा है और उनके अल्ट्रासाउंड का खर्च सरकार वहन कर रही है। विशेषज्ञ की तैनाती की डिमांड हम भेज चुके हैं। यह मांग पूरी होते ही सिविल अस्पताल में सेवा बहाल करवा दी जाएगी।
-डॉ. कृष्ण सिंह, सीएमओ, चरखी दादरी
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संवाददाता की पड़ताल में सामने आया कि अल्ट्रासाउंड सुविधा बंद होने के चलते विभाग ने केवल गर्भवती महिलाओं के अल्ट्रासाउंड की ही वैकल्पिक व्यवस्था की हुई है। सिविल अस्पताल से पुरुष मरीजों को रोहतक पीजीआई या भिवानी सिविल अस्पताल रेफर किया जा रहा है। गर्भवती महिलाओं के लिए विभाग ने शहर के निजी केंद्रों से समझौता किया हुआ है। निजी केंद्रों पर निशुल्क अल्ट्रासाउंड करवाने के लिए पहले गर्भवती महिला को जिला अस्पताल से पर्ची बनवाकर लानी पड़ती है और अगले दिन अस्पताल में जाकर रिपोर्ट लेनी पड़ रही है। एक दिन में छह किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करना गर्भवती महिलाओं के लिए आसान नहीं है। वहीं, अब तक करीब 4500 पुरुष मरीज अल्ट्रासाउंड के लिए रोहतक पीजीआई या भिवानी रेफर किए गए हैं।
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अल्ट्रासाउंड सुविधा पीएचसी और सीएचसी की बजाय केवल जिला सिविल अस्पताल में ही होती है। पिछले साढ़े तीन साल से सिविल अस्पताल के अल्ट्रासाउंड कक्ष को ताला जड़ा हुआ है। लंबे समय से जिले में अल्ट्रासोनोलॉजिस्ट का पद भी खाली है। इस समय अल्ट्रासाउंड मशीन भी वर्किंग में नहीं है। ऐसे में सिविल अस्पताल में आने वाले सभी मरीज विभाग को रेफर ही करने पड़ रहे हैं।
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अब तक यूं रेफर किए जा चुके हैं 17 हजार से अधिक मरीज
सिविल अस्पताल में प्रतिदिन करीब 25 मरीज अल्ट्रासाउंड कराने पहुंचते हैं। इनमें करीब 15 गर्भवती महिलाएं और बाकी अन्य मरीज होते हैं। एक दिन में सिविल अस्पताल से 15 गर्भवती महिलाओं को निजी केंद्रों पर भेजा जा रहा है। एक माह में अगर 20 कार्य दिवस लगाए तो इनकी संख्या 300 बनती है। साढ़े तीन साल में यह संख्या साढ़े 12 हजार का आंकड़ा पार करती है। इसी प्रकार प्रतिदिन करीब आठ अन्य मरीजों को रोहतक या पीजीआई रेफर किए जाता है और साढ़े तीन साल में इनकी संख्या साढ़े चार हजार पार है।
42 माह से बंद है सेवा, 200 से अधिक डिमांड भेज चुके 9 सीएमओ
पिछले 42 माह से सरकारी अल्ट्रासाउंड सेवा ठप है और तब से ही विभाग निजी केंद्रों से समझौता कर काम चला रहा है। ऐसा नहीं है कि स्थानीय अधिकारियों ने ये सेवा बहाल कराने के प्रयास न किए हो। प्रयास का आलम यह है कि सरकार के पास 9 सीएमओ अपने कार्यकाल में 200 से अधिक डिमांड भेज चुके हैं, लेकिन फिर भी विशेषज्ञ और मशीन की कमी दूर नहीं हुई है।
भागदौड़ से बचने के लिए निजी केंद्रों पर चुकाते हैं 400 रुपये
पुरुष मरीज रोहतक पीजीआई या भिवानी अस्पताल की भागदौड़ करने की बजाय 400 रुपये देकर निजी केंद्रों पर ही अल्ट्रासाउंड करवा लेते हैं। एक निजी अल्ट्रासाउंड की दैनिक ओपीडी 80 से 100 तक पहुंच जाती है।
यूं चुकाए निजी केंद्रों को 18 लाख
सूत्रों के अनुसार स्वास्थ्य विभाग का निजी केंद्रों से एक गर्भवती महिला का अल्ट्रासाउंड 150 रुपये में करने का समझौता चल रहा है। एक माह में करीब 300 गर्भवती महिलाएं सिविल अस्पताल से निजी केंद्रों पर भेजी जाती हैं और इस लिहाज से इनके अल्ट्रासाउंड के लिए सरकार प्रतिमाह 45 हजार खर्च वहन करती है। पिछले 42 माह में इस लिहाज से सरकार 18 लाख से अधिक का भुगतान कर चुकी है।
डिप्टी सीएम के आदेश भी नहीं चढ़ेे सिरे
गत फरवरी में डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने चरखी दादरी पहुंचकर अधिकारियों की बैठक ली थी। उस दौरान उन्होंने पुरानी अल्ट्रासाउंड के मौजूदा हालात की रिपोर्ट तैयार कर भेजने के आदेश दिए थे। अल्ट्रासोनोलॉजिस्ट के बिना स्वास्थ्य विभाग अल्ट्रासाउंड कक्ष का ताला नहीं खोल सकते हैं। ऐसे में विशेषज्ञ की कमी डिप्टी सीएम के आदेश सिरे चढ़ाने में आड़े आ रही है।
अधिकारी बोले
विशेषज्ञ न होने के चलते अल्ट्रासाउंड सेवा बंद है और निजी केंद्रों से टाइअप कर काम चलाया जा रहा है। गर्भवती महिलाओं को सिविल अस्पताल से निजी केंद्रों पर भेजा जा रहा है और उनके अल्ट्रासाउंड का खर्च सरकार वहन कर रही है। विशेषज्ञ की तैनाती की डिमांड हम भेज चुके हैं। यह मांग पूरी होते ही सिविल अस्पताल में सेवा बहाल करवा दी जाएगी।
-डॉ. कृष्ण सिंह, सीएमओ, चरखी दादरी