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भूजल दोहन शुल्क नीति की समीक्षा करे हरियाणा सरकार : हाईकोर्ट
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याचिका में कहा गया, स्वास्थ्य संस्थानों पर उद्योगों जैसा वसूला जा रहा है भूजल दोहन शुल्क
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। हरियाणा सरकार और हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण को भूजल दोहन शुल्क नीति की समीक्षा करने का पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने यह आदेश अस्पतालों, क्लीनिकों, नर्सिंग होम और विवाह स्थल जैसे संस्थानों की ओर से दाखिल याचिका पर जारी किया गया है।
जस्टिस कुलदीप तिवारी ने व्हाइट ओक मोटेल एंड रेस्टोरेंट्स सहित 27 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया है। याचिकाओं में 10 सितंबर 2021 को जारी सरकार की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता संस्थानों को उद्योग की श्रेणी से हटाकर इन्फ्रास्ट्रक्चर की श्रेणी में रख दिया था। यह वर्गीकरण भूजल उपयोग की श्रेणी और शुल्क संरचना से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ताओं का तर्क यह था कि मौजूदा नीति भेदभावपूर्ण और तर्कहीन है, क्योंकि वे संस्थान जनसेवा से जुड़े हैं, फिर भी उन्हें औद्योगिक इकाइयों की तुलना में अधिक आर्थिक भार सहना पड़ रहा है। औद्योगिक इकाइयों को जहां 10 क्यूबिक मीटर प्रतिदिन से कम पानी की खपत पर शुल्क में छूट दी गई है, वहीं उतनी ही खपत करने वाले अस्पतालों, क्लीनिकों और बैंक्वेट हाल को ऐसी कोई राहत नहीं मिल रही है। सुनवाई के दौरान हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण की ओर से प्रस्तुत वकील ने माना कि मौजूदा नीति केंद्र सरकार के मॉडल पर आधारित है और इसकी समीक्षा की जा सकती है। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वे दो माह के भीतर नीति की समीक्षा करें और यह तय करें कि क्या औद्योगिक इकाइयों पर लागू शुल्क संरचना को इन सार्वजनिक सेवा संस्थानों पर समान रूप से लागू किया जा सकता है। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वह 2021 की अधिसूचना की वैधता या उसमें मनमानी और पक्षपात के पहलुओं पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा।
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। हरियाणा सरकार और हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण को भूजल दोहन शुल्क नीति की समीक्षा करने का पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने यह आदेश अस्पतालों, क्लीनिकों, नर्सिंग होम और विवाह स्थल जैसे संस्थानों की ओर से दाखिल याचिका पर जारी किया गया है।
जस्टिस कुलदीप तिवारी ने व्हाइट ओक मोटेल एंड रेस्टोरेंट्स सहित 27 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया है। याचिकाओं में 10 सितंबर 2021 को जारी सरकार की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता संस्थानों को उद्योग की श्रेणी से हटाकर इन्फ्रास्ट्रक्चर की श्रेणी में रख दिया था। यह वर्गीकरण भूजल उपयोग की श्रेणी और शुल्क संरचना से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ताओं का तर्क यह था कि मौजूदा नीति भेदभावपूर्ण और तर्कहीन है, क्योंकि वे संस्थान जनसेवा से जुड़े हैं, फिर भी उन्हें औद्योगिक इकाइयों की तुलना में अधिक आर्थिक भार सहना पड़ रहा है। औद्योगिक इकाइयों को जहां 10 क्यूबिक मीटर प्रतिदिन से कम पानी की खपत पर शुल्क में छूट दी गई है, वहीं उतनी ही खपत करने वाले अस्पतालों, क्लीनिकों और बैंक्वेट हाल को ऐसी कोई राहत नहीं मिल रही है। सुनवाई के दौरान हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण की ओर से प्रस्तुत वकील ने माना कि मौजूदा नीति केंद्र सरकार के मॉडल पर आधारित है और इसकी समीक्षा की जा सकती है। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वे दो माह के भीतर नीति की समीक्षा करें और यह तय करें कि क्या औद्योगिक इकाइयों पर लागू शुल्क संरचना को इन सार्वजनिक सेवा संस्थानों पर समान रूप से लागू किया जा सकता है। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वह 2021 की अधिसूचना की वैधता या उसमें मनमानी और पक्षपात के पहलुओं पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा।
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