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एसीआर में प्रतिकूल प्रविष्टि पदोन्नति से वंचित करने का वैध आधार : हाईकोर्ट
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इंस्पेक्टर की याचिका खारिज, कहा-हम प्रशासनिक विवेक के स्थान पर अपना मत नहीं थोप सकते
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। हरियाणा पुलिस के एक अधिकारी द्वारा जूनियर्स के समान तिथि से डीएसपी पद पर पदोन्नति की मांग को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सेवा मामलों में अदालतें अपीलीय मंच की तरह कार्य नहीं कर सकतीं और न ही वे सक्षम प्राधिकारी के विवेकाधिकार के स्थान पर अपना दृष्टिकोण प्रतिस्थापित कर सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि पदोन्नति से इनकार सेवा रिकाॅर्ड, प्रतिकूल एसीआर (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) प्रविष्टियों और दंडात्मक आदेशों के आधार पर किया गया है तो उसमें न्यायिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं बनती।
याचिकाकर्ता ने अपने जूनियर्स को दी गई पदोन्नतियों को रद्द करने और स्वयं को उसी तिथि से डीएसपी पद पर पदोन्नत करने का आग्रह किया था। कोर्ट को याची ने बताया कि उसने 7 जनवरी 1962 को पंजाब पुलिस में कांस्टेबल के रूप में सेवा ज्वाइन की थी और 1 नवंबर 1966 को उन्हें हरियाणा पुलिस में आवंटित किया गया। सेवा के दौरान उन्हें पदोन्नति मिली और 1992 में इंस्पेक्टर बनाया गया। उसी वर्ष 24 जून को उनका नाम लिस्ट एफ में शामिल किया गया। याचिकाकर्ता का तर्क था कि उनके जूनियर्स को पहले ही लिस्ट एफ में शामिल कर डीएसपी पद पर पदोन्नति दे दी गई जबकि उन्हें अनुचित रूप से इस लाभ से वंचित रखा गया। सरकार की ओर से अदालत को अवगत कराया गया कि याची का दावा उनके सेवा रिकाॅर्ड के कारण अस्वीकार किया गया। रिकाॅर्ड के अनुसार वर्ष 1985-86 में उनके खिलाफ गंभीर प्रतिकूल एसीआर प्रविष्टि दर्ज थीं। 1983-84 और 1987-88 में उन्हें केवल औसत श्रेणी की गोपनीय रिपोर्ट मिली। 1981 से 1987 के बीच उन्हें कुल 13 बार दंडात्मक प्रविष्टि की सजा दी गई थी। 1987 में कदाचार के आरोप में एक वार्षिक वेतनवृद्धि रोकने का दंड भी दिया गया। इन सभी तथ्यों के आधार पर सक्षम प्राधिकारी ने उन्हें डीएसपी पद के लिए उपयुक्त नहीं माना। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि न तो साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन कर सकते हैं न ही तथ्यों के आधार पर दिए गए प्रशासनिक निष्कर्षों को पलट सकते हैं। यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी आदेश में कोई अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटि, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन या कानून की स्पष्ट गलती न हो, तो केवल यह तर्क कि कोई अन्य दृष्टिकोण संभव था, आदेश को रद्द करने का आधार नहीं बन सकता।
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। हरियाणा पुलिस के एक अधिकारी द्वारा जूनियर्स के समान तिथि से डीएसपी पद पर पदोन्नति की मांग को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सेवा मामलों में अदालतें अपीलीय मंच की तरह कार्य नहीं कर सकतीं और न ही वे सक्षम प्राधिकारी के विवेकाधिकार के स्थान पर अपना दृष्टिकोण प्रतिस्थापित कर सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि पदोन्नति से इनकार सेवा रिकाॅर्ड, प्रतिकूल एसीआर (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) प्रविष्टियों और दंडात्मक आदेशों के आधार पर किया गया है तो उसमें न्यायिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं बनती।
याचिकाकर्ता ने अपने जूनियर्स को दी गई पदोन्नतियों को रद्द करने और स्वयं को उसी तिथि से डीएसपी पद पर पदोन्नत करने का आग्रह किया था। कोर्ट को याची ने बताया कि उसने 7 जनवरी 1962 को पंजाब पुलिस में कांस्टेबल के रूप में सेवा ज्वाइन की थी और 1 नवंबर 1966 को उन्हें हरियाणा पुलिस में आवंटित किया गया। सेवा के दौरान उन्हें पदोन्नति मिली और 1992 में इंस्पेक्टर बनाया गया। उसी वर्ष 24 जून को उनका नाम लिस्ट एफ में शामिल किया गया। याचिकाकर्ता का तर्क था कि उनके जूनियर्स को पहले ही लिस्ट एफ में शामिल कर डीएसपी पद पर पदोन्नति दे दी गई जबकि उन्हें अनुचित रूप से इस लाभ से वंचित रखा गया। सरकार की ओर से अदालत को अवगत कराया गया कि याची का दावा उनके सेवा रिकाॅर्ड के कारण अस्वीकार किया गया। रिकाॅर्ड के अनुसार वर्ष 1985-86 में उनके खिलाफ गंभीर प्रतिकूल एसीआर प्रविष्टि दर्ज थीं। 1983-84 और 1987-88 में उन्हें केवल औसत श्रेणी की गोपनीय रिपोर्ट मिली। 1981 से 1987 के बीच उन्हें कुल 13 बार दंडात्मक प्रविष्टि की सजा दी गई थी। 1987 में कदाचार के आरोप में एक वार्षिक वेतनवृद्धि रोकने का दंड भी दिया गया। इन सभी तथ्यों के आधार पर सक्षम प्राधिकारी ने उन्हें डीएसपी पद के लिए उपयुक्त नहीं माना। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि न तो साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन कर सकते हैं न ही तथ्यों के आधार पर दिए गए प्रशासनिक निष्कर्षों को पलट सकते हैं। यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी आदेश में कोई अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटि, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन या कानून की स्पष्ट गलती न हो, तो केवल यह तर्क कि कोई अन्य दृष्टिकोण संभव था, आदेश को रद्द करने का आधार नहीं बन सकता।
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